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Supreme Court: क्या घरदामाद बनाकर भांजी के पति को दी जा सकती है संपत्ति? सुप्रीम कोर्ट ने दिया बड़ा फैसला
Thu, 09 Jul 2026 05:03 PM IST
निर्मल कांत
आईएएनएस, नई दिल्ली।
आईएएनएस, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Thu, 09 Jul 2026 05:03 PM IST
सार
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल घरदामाद बनाने का दावा करने से किसी व्यक्ति को संपत्ति में उत्तराधिकार का अधिकार नहीं मिल सकता। इसके लिए संबंधित परंपरा का कानूनी रूप से साबित होना जरूरी है। कोर्ट ने झारखंड के उरांव समुदाय से जुड़े मामले में निचली अदालतों के फैसले रद्द कर दिए। पढ़िए रिपोर्ट-
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि अगर किसी व्यक्ति का ससुराल पक्ष का चाचा अपनी भांजी के पति को 'घरदामाद' बनाकर गोद लेने का दावा करता है, तो उसे पहले यह साबित करना होगा कि ऐसा रिवाज वास्तव में मौजूद है। केवल दावा करने से संपत्ति में उत्तराधिकार का अधिकार नहीं मिल सकता। कोर्ट ने झारखंड के उरांव जनजातीय समुदाय से जुड़े एक संपत्ति विवाद में तीनों निचली अदालतों के फैसले रद्द कर दिए।
वादी के पक्ष में क्यों गया सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
क्या घरदामाद को मिल सकता है ससुर की संपत्ति में अधिकार?
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सबूतों से यह जरूर साबित हुआ कि घरदामाद को अपने ससुर की संपत्ति में अधिकार मिल सकता है। लेकिन ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो कि यही रिवाज ससुराल पक्ष के चाचा की संपत्ति पर भी लागू होता है।
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ये भी पढ़ें: 'माइलेज पर मामूली असर, इंजन पर नहीं', ई20 पेट्रोल को लेकर गडकरी ने क्या-क्या दावे किए?
'साबित करना दावा करने वाले व्यक्ति की जिम्मेदारी'
कोर्ट ने कहा, जो व्यक्ति किसी परंपरा का दावा करता है, उसी पर उसे साबित करने की जिम्मेदारी होती है। केवल यह कहना कि दावे के विपरीत बात स्पष्ट रूप से नहीं कही गई है, इसे पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि जो व्यक्ति किसी रिवाज का सहारा लेता है, उसे सिर्फ उस रिवाज के अस्तित्व को ही नहीं, बल्कि यह भी साबित करना होगा कि वह खुद भी उसी रिवाज के अधीन है। फैसले में कहा गया, जो व्यक्ति किसी परंपरा का दावा करता है, उसे उसे साबित करना होगा। साथ ही यह भी साबित करना होगा कि वह वास्तव में उसी परंपरा से शासित है।
मामला क्या था?
यह विवाद उरांव परिवार की पैतृक संपत्ति को लेकर था। प्रतिवादियों का कहना था कि पुनई उरांव को संतानहीन लेदुरा उरांव ने घरदामाद के रूप में स्वीकार किया था। इसलिए उसे संपत्ति में उत्तराधिकार का अधिकार मिलना चाहिए। वादी ने इस दावे को चुनौती देते हुए कहा कि ऐसी कोई परंपरा मौजूद ही नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि निचली अदालतों ने बिना किसी ठोस सबूत के ऐसी परंपरा को मान लिया था। अदालत ने झारखंड हाईकोर्ट की भी आलोचना की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने इस मामले में अहम कानूनी सवाल तो तय किया, लेकिन उस पर फैसला नहीं दिया।
पीठ ने कहा, आमतौर पर जब कानून का कोई अहम सवाल तय कर लिया जाता है, तो दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर उस पर फैसला देना जरूरी होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी सबूतों और उरांव समुदाय की परंपराओं का एक साथ अध्ययन करने के बाद कहा कि केवल यही परंपरा साबित हुई कि घरदामाद को अपने ससुर की संपत्ति में अधिकार मिल सकता है। इसके अलावा, प्रतिवादियों की ओर से जिन दूसरी परंपराओं का दावा किया गया, वे साबित नहीं हो सकीं।
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वादी के पक्ष में क्यों गया सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
- जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने बेजला उरांव की अपील स्वीकार कर ली।
- कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादी यह साबित नहीं कर सके कि ऐसा कोई रिवाज मौजूद है। इसलिए वादी के पक्ष में फैसला दिया गया।
- शीर्ष कोर्ट ने कहा कि किसी भी परंपरा या रिवाज को साबित करने की जिम्मेदारी उसी पक्ष की होती है, जो उसका दावा करता है।
- कोर्ट ने यह दावा भी खारिज कर दिया कि लेदुरा उरांव अपनी भांजी के पति पुनई उरांव को घरदामाद बनाकर गोद ले सकते हैं और इस आधार पर उसे अपनी संपत्ति का उत्तराधिकारी बना सकते हैं।
- पीठ ने कहा, यह कहीं भी साबित नहीं हुआ कि प्रचलित परंपरा के तहत कोई व्यक्ति अपनी भांजी के पति को घरदामाद के रूप में गोद ले सकता है।
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क्या घरदामाद को मिल सकता है ससुर की संपत्ति में अधिकार?
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सबूतों से यह जरूर साबित हुआ कि घरदामाद को अपने ससुर की संपत्ति में अधिकार मिल सकता है। लेकिन ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो कि यही रिवाज ससुराल पक्ष के चाचा की संपत्ति पर भी लागू होता है।
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'साबित करना दावा करने वाले व्यक्ति की जिम्मेदारी'
कोर्ट ने कहा, जो व्यक्ति किसी परंपरा का दावा करता है, उसी पर उसे साबित करने की जिम्मेदारी होती है। केवल यह कहना कि दावे के विपरीत बात स्पष्ट रूप से नहीं कही गई है, इसे पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि जो व्यक्ति किसी रिवाज का सहारा लेता है, उसे सिर्फ उस रिवाज के अस्तित्व को ही नहीं, बल्कि यह भी साबित करना होगा कि वह खुद भी उसी रिवाज के अधीन है। फैसले में कहा गया, जो व्यक्ति किसी परंपरा का दावा करता है, उसे उसे साबित करना होगा। साथ ही यह भी साबित करना होगा कि वह वास्तव में उसी परंपरा से शासित है।
मामला क्या था?
यह विवाद उरांव परिवार की पैतृक संपत्ति को लेकर था। प्रतिवादियों का कहना था कि पुनई उरांव को संतानहीन लेदुरा उरांव ने घरदामाद के रूप में स्वीकार किया था। इसलिए उसे संपत्ति में उत्तराधिकार का अधिकार मिलना चाहिए। वादी ने इस दावे को चुनौती देते हुए कहा कि ऐसी कोई परंपरा मौजूद ही नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि निचली अदालतों ने बिना किसी ठोस सबूत के ऐसी परंपरा को मान लिया था। अदालत ने झारखंड हाईकोर्ट की भी आलोचना की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने इस मामले में अहम कानूनी सवाल तो तय किया, लेकिन उस पर फैसला नहीं दिया।
पीठ ने कहा, आमतौर पर जब कानून का कोई अहम सवाल तय कर लिया जाता है, तो दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर उस पर फैसला देना जरूरी होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी सबूतों और उरांव समुदाय की परंपराओं का एक साथ अध्ययन करने के बाद कहा कि केवल यही परंपरा साबित हुई कि घरदामाद को अपने ससुर की संपत्ति में अधिकार मिल सकता है। इसके अलावा, प्रतिवादियों की ओर से जिन दूसरी परंपराओं का दावा किया गया, वे साबित नहीं हो सकीं।