NCERT Row: 'हर देश अपने नजरिए से इतिहास लिखता है', पूर्व निदेशक बोले- शिक्षा विचारधारा से दूर क्यों नहीं?
एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक जेएस राजपूत ने इतिहास लेखन और शिक्षा में विचारधारा के प्रभाव पर अपनी बात रखी। उन्होंने अपने कार्यकाल के अनुभव बताते हुए किताबों की समीक्षा, गलतियां सुधारने और लेखकों से जुड़े विवादों का भी जिक्र किया। इतिहास लिखने का सही नजरिया क्या होना चाहिए? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
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विस्तार
एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक जेएस राजपूत ने कहा कि दुनिया में अलग-अलग देश अपने नजरिए से इतिहास को देखते और लिखते हैं। उन्होंने चीन और जापान का उदाहरण देते हुए कहा कि दोनों देशों के इतिहास में एक-दूसरे को लेकर अलग दृष्टिकोण होना स्वाभाविक है। हालांकि, उनके मुताबिक एनसीईआरटी को किसी विचारधारा से प्रभावित होने के बजाय संस्था के प्रति पूरी तरह समर्पित होकर काम करना चाहिए।
राजपूत को मंत्री ने क्या सलाह दी थी?
जेएस राजपूत ने अपने कार्यकाल का अनुभव साझा करते हुए बताया कि पद संभालने के समय एक मंत्री ने उनसे कहा था कि व्यक्ति आते-जाते रहते हैं, लेकिन संस्था बनी रहती है। मंत्री ने उन्हें सलाह दी थी कि राजनीतिक स्तर से मिलने वाली किसी सिफारिश को तभी स्वीकार किया जाए, जब वह संस्था के हित में हो। राजपूत के मुताबिक, इस सलाह ने उन्हें काम के दौरान दबाव का सामना करने में काफी मदद की। उन्होंने कहा कि मंत्री की ओर से उन्हें किसी व्यक्ति या किसी खास काम को लेकर निर्देश नहीं दिए गए थे।
एनसीईआरटी में प्रकाशित हर शब्द की जिम्मेदारी किसकी होती है?
राजपूत ने बताया कि सरकार बदलने के बाद नए मंत्री ने उनसे पूछा था कि उन्हें निर्देश कौन देता था। उन्होंने जवाब दिया कि उन्हें कोई निर्देश नहीं देता था और एनसीईआरटी में प्रकाशित होने वाले हर शब्द की जिम्मेदारी उनकी थी। उन्होंने कहा कि एनसीईआरटी को भी इसी आदर्श को अपनाने की कोशिश करनी चाहिए। उनके मुताबिक, संस्था की विश्वसनीयता और काम की गुणवत्ता के लिए उसकी स्वतंत्र कार्यप्रणाली महत्वपूर्ण है।
NCERT की किताबें कैसे तैयार होती हैं?
जेएस राजपूत ने बताया कि किताबों के लिए लेखकों को आमंत्रित किया जाता है और उनके तैयार किए गए लेखन पर प्रोफेसर विचार करते हैं। जरूरत पड़ने पर बाहर के विशेषज्ञों को भी प्रक्रिया में शामिल किया जा सकता है। इसके बाद सामग्री कई चरणों से गुजरती है। विभाग प्रमुख इसकी समीक्षा करते हैं और विशेषज्ञ भी इसे देखते हैं। कई बार सामग्री निदेशक के पास भी पहुंचती है। राजपूत के मुताबिक, उनका काम यह देखना था कि सामग्री को संबंधित लोगों ने देखा है, जरूरी बातें शामिल की गई हैं और ड्राफ्ट से लेकर सुधार तथा समीक्षा तक की प्रक्रिया पूरी हुई है।
एक किसान की तस्वीर से जुड़ी गलती कैसे सुधारी गई?
राजपूत ने एक पुराने अनुभव का जिक्र करते हुए बताया कि उन्हें हाथ से लिखी एक चिट्ठी मिली थी। इसमें एनसीईआरटी की तीसरी कक्षा की किताब में एक तस्वीर के गलत शीर्षक की ओर ध्यान दिलाया गया था। उन्होंने किताब मंगाकर देखी तो उसमें खेत में हल लिए एक किसान की तस्वीर थी। तस्वीर के नीचे लिखा था कि किसान खेत में हल जोत रहा है, जिसे शिकायतकर्ता ने गलत बताया था। राजपूत ने कहा कि उन्होंने तुरंत उस व्यक्ति को धन्यवाद देते हुए जवाब लिखा और उन्हें कुछ किताबें भी भेजीं। इसके बाद संबंधित गलती को सुधारने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
क्या NCERT को छात्रों और शिक्षकों से भी सुझाव मिलते हैं?
राजपूत ने कहा कि एनसीईआरटी स्कूलों, शिक्षकों और छात्रों समेत अलग-अलग लोगों से सुझाव लेती है। किताबों में गलतियां सामने आना असामान्य नहीं है और उन्हें अगले संस्करण में ठीक किया जाता है। उन्होंने इस प्रक्रिया को संस्था के काम का हिस्सा बताया और कहा कि सुझावों को गंभीरता से लेने से किताबों की गुणवत्ता बेहतर की जा सकती है।
भाजपा से जुड़े सवाल पर लेखकों ने क्या कहा?
राजपूत ने बताया कि एक समय उन्होंने कुछ लेखकों से संपर्क किया और उनसे पुरानी इतिहास की किताबों को दोबारा देखने तथा जरूरी बदलाव करने का अनुरोध किया। उनके मुताबिक, कुछ लेखकों ने उनके साथ काम करने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि वे भाजपा के साथ काम नहीं करते। राजपूत ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि वे भाजपा के सदस्य नहीं हैं और उनका उद्देश्य किताबों को बेहतर बनाना है। उन्होंने बताया कि इसके बावजूद दो लोगों ने काम करने से मना कर दिया, जिसके बाद उन्हें अन्य लोगों की मदद लेनी पड़ी।
इतिहास लेखन में किन पहलुओं पर ध्यान देने की बात कही?
राजपूत ने कहा कि शिक्षा को विचारधारा से प्रभावित नहीं होना चाहिए। उन्होंने बताया कि इस विषय पर उन्होंने खुशवंत सिंह समेत कई लोगों से भी चर्चा की थी। उनके मुताबिक, उन्हें बताया गया कि कुछ इतिहासकारों ने इतिहास को पर्शियन इतिहासकारों के नजरिए से लिखा, जबकि यहां उपलब्ध दूसरी जानकारियों को नजरअंदाज किया गया। राजपूत के अनुसार, इतिहास लेखन में अलग-अलग स्रोतों और दृष्टिकोणों को समझना जरूरी है।