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Supreme Court: 'देश की संप्रभुता सर्वोपरि है, व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं', ड्रग्स मामले में कोर्ट की टिप्पणी
पीटीआई, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Tue, 02 Jun 2026 08:08 PM IST
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सार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि देश की संप्रभुता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता में टकराव हो, तो राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी जाएगी, खासकर नशीले पदार्थों से जुड़े मामलों में। कोर्ट ने जेल से कथित ड्रग तस्करी नेटवर्क चलाने के आरोपी को जमानत देने वाला पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। पढ़िए रिपोर्ट-
सुप्रीम कोर्ट (फाइल)
- फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि अगर देश की संप्रभुता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच टकराव होता है, तो देश की संप्रभुता को प्राथमिकता मिलेगी, खासकर नशीले पदार्थों से जुड़े मामलों में।
हाईकोर्ट का आदेश रद्द
कोर्ट ने यह टिप्पणी उस समय की, जब उसने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक व्यक्ति को जमानत दी गई थी। उस व्यक्ति पर आरोप था कि वह जेल के अंदर से मोबाइल फोन के जरिये नशीले पदार्थों तस्करी का नेटवर्क चला रहा था।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि अगर देश की संप्रभुता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच कोई टकराव होता है, तो निश्चित रूप से देश की संप्रभुता को ही प्राथमिकता मिलेगी, खासकर जब नशीले पदार्थों की आपूर्ति के रूप में देश के खिलाफ एक तरह का युद्ध चल रहा हो। यह देश की अर्थव्यवस्था और लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।
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दोषी पाए जाने पर 20 साल अधिकतम सजा
शीर्ष कोर्ट ने कहा कि इस मामले में आरोपी पर पहले भी इसी तरह के अपराधों के आरोप लगे हैं, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि वह जमानत पर बाहर रहते हुए ऐसा अपराध नहीं करेगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी अब तक एक साल सात महीने जेल में रह चुका है। दोषी पाए जाने पर उसे अधिकतम 20 साल की सजा हो सकती है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि उसने इतनी लंबी कैद झेली है कि उसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत राहत दी जाए।
ये भी पढ़ें: 'जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग', पाकिस्तान-यूरोपीय संघ के संयुक्त बयान पर भारत की दो टूक
कोर्ट ने कहा कि कई बार लंबे समय तक जेल में रहने पर जमानत दी जाती है, लेकिन यह नियम हर मामले में समान रूप से लागू नहीं होता। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि लंबी कैद क्या होती है, इसका कोई निश्चित कानूनी मानक अब तक तय नहीं किया गया है।
हाईकोर्ट का आदेश रद्द
कोर्ट ने यह टिप्पणी उस समय की, जब उसने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक व्यक्ति को जमानत दी गई थी। उस व्यक्ति पर आरोप था कि वह जेल के अंदर से मोबाइल फोन के जरिये नशीले पदार्थों तस्करी का नेटवर्क चला रहा था।
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जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि अगर देश की संप्रभुता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच कोई टकराव होता है, तो निश्चित रूप से देश की संप्रभुता को ही प्राथमिकता मिलेगी, खासकर जब नशीले पदार्थों की आपूर्ति के रूप में देश के खिलाफ एक तरह का युद्ध चल रहा हो। यह देश की अर्थव्यवस्था और लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।
दोषी पाए जाने पर 20 साल अधिकतम सजा
शीर्ष कोर्ट ने कहा कि इस मामले में आरोपी पर पहले भी इसी तरह के अपराधों के आरोप लगे हैं, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि वह जमानत पर बाहर रहते हुए ऐसा अपराध नहीं करेगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी अब तक एक साल सात महीने जेल में रह चुका है। दोषी पाए जाने पर उसे अधिकतम 20 साल की सजा हो सकती है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि उसने इतनी लंबी कैद झेली है कि उसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत राहत दी जाए।
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कोर्ट ने कहा कि कई बार लंबे समय तक जेल में रहने पर जमानत दी जाती है, लेकिन यह नियम हर मामले में समान रूप से लागू नहीं होता। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि लंबी कैद क्या होती है, इसका कोई निश्चित कानूनी मानक अब तक तय नहीं किया गया है।