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क्लिनिकल ट्रायल में गरीबों का इस्तेमाल!: कोर्ट ने NGO से मांगी विस्तृत रिपोर्ट; हैरान कर देगा पूरा मामला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अमन तिवारी
Updated Tue, 21 Apr 2026 07:20 PM IST
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सार
सुप्रीम कोर्ट ने क्लिनिकल ट्रायल नियमों में कमियों को लेकर एनजीओ की याचिका पर विस्तृत दस्तावेज मांगे हैं। याचिका में आरोप है कि गरीबों को ट्रायल में गिनी पिग की तरह इस्तेमाल किया जाता है और उन्हें पर्याप्त मुआवजा भी नहीं दिया जाता। मामले की अगली सुनवाई 27 अप्रैल को होगी।
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक एनजीओ को निर्देश दिया कि वह 2024 के क्लीनिकल ट्रायल नियमों में मौजूद कथित कमियों का पूरा ब्यौरा पेश करे। ये नियम देश में वैक्सीन और नई दवाओं के क्लीनिकल ट्रायल की मंजूरी प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए बनाए गए थे। जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है।
क्या है मामला?
यह मामला एनजीओ 'स्वास्थ्य अधिकार मंच' ने साल 2012 में एक जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से उठाया था। याचिका में आरोप लगाया गया है कि बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियां पूरे देश में बड़े पैमाने पर क्लीनिकल ट्रायल कर रही हैं। याचिका के अनुसार, सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम न होने की वजह से गरीब नागरिकों का इस्तेमाल गिनी पिग (प्रयोग के लिए इस्तेमाल होने वाले जीव) की तरह किया जा रहा है। उन्हें इन परीक्षणों के बदले सही मुआवजा भी नहीं मिल रहा है।
क्या बोले वकील?
एनजीओ की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील संजय पारिख ने कोर्ट को बताया कि क्लीनिकल ट्रायल के लिए लोगों को शामिल करने की प्रक्रिया सही नहीं है। उन्होंने दावा किया कि इन ट्रायल्स के दौरान अब तक लगभग 8,000 लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें से कई पीड़ितों के परिवारों को अब तक पर्याप्त मुआवजा नहीं मिला है। वकील ने कहा कि वह 2024 के नए नियमों को चुनौती नहीं दे रहे हैं, लेकिन उनमें कई ऐसी कमियां हैं जिन्हें दूर करने की जरूरत है।
ये भी पढ़ें: Kerala: केरल के त्रिशूर में पटाखा निर्माण फैक्टरी में विस्फोट, 12 लोगों की मौत; पीएम मोदी ने जताया दुख
अगली सुनवाई 27 अप्रैल होगी
इस पर कोर्ट ने वकील और अन्य पक्षों से अब तक उठाए गए कदमों और नियमों की कमियों पर एक संयुक्त दस्तावेज जमा करने को कहा है। इस मामले की अगली सुनवाई 27 अप्रैल को होगी। इससे पहले कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि दवाओं और वैक्सीन के क्लीनिकल ट्रायल अक्सर गरीब देशों में किए जाते हैं। कोर्ट ने साफ किया था कि भारत में होने वाले ट्रायल देश के लोगों की मदद के लिए होने चाहिए। इन्हें सिर्फ विदेशी कंपनियों के फायदे के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
क्या है सरकार का पक्ष?
केंद्र सरकार ने कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि नए नियमों को 2019 में तैयार किया गया था और 2024 में लागू किया गया। सरकार का कहना है कि इन नियमों का मकसद मंजूरी की प्रक्रिया को बेहतर बनाना और मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। सरकार ने यह भी दलील दी कि नए नियम आने के बाद अब यह याचिका बेअसर हो गई है। हालांकि, कोर्ट ने पहले कहा था कि 2013 के नियम लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए काफी नहीं थे, जिसके बाद नए नियम लाए गए।
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क्या है मामला?
यह मामला एनजीओ 'स्वास्थ्य अधिकार मंच' ने साल 2012 में एक जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से उठाया था। याचिका में आरोप लगाया गया है कि बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियां पूरे देश में बड़े पैमाने पर क्लीनिकल ट्रायल कर रही हैं। याचिका के अनुसार, सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम न होने की वजह से गरीब नागरिकों का इस्तेमाल गिनी पिग (प्रयोग के लिए इस्तेमाल होने वाले जीव) की तरह किया जा रहा है। उन्हें इन परीक्षणों के बदले सही मुआवजा भी नहीं मिल रहा है।
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क्या बोले वकील?
एनजीओ की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील संजय पारिख ने कोर्ट को बताया कि क्लीनिकल ट्रायल के लिए लोगों को शामिल करने की प्रक्रिया सही नहीं है। उन्होंने दावा किया कि इन ट्रायल्स के दौरान अब तक लगभग 8,000 लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें से कई पीड़ितों के परिवारों को अब तक पर्याप्त मुआवजा नहीं मिला है। वकील ने कहा कि वह 2024 के नए नियमों को चुनौती नहीं दे रहे हैं, लेकिन उनमें कई ऐसी कमियां हैं जिन्हें दूर करने की जरूरत है।
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अगली सुनवाई 27 अप्रैल होगी
इस पर कोर्ट ने वकील और अन्य पक्षों से अब तक उठाए गए कदमों और नियमों की कमियों पर एक संयुक्त दस्तावेज जमा करने को कहा है। इस मामले की अगली सुनवाई 27 अप्रैल को होगी। इससे पहले कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि दवाओं और वैक्सीन के क्लीनिकल ट्रायल अक्सर गरीब देशों में किए जाते हैं। कोर्ट ने साफ किया था कि भारत में होने वाले ट्रायल देश के लोगों की मदद के लिए होने चाहिए। इन्हें सिर्फ विदेशी कंपनियों के फायदे के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
क्या है सरकार का पक्ष?
केंद्र सरकार ने कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि नए नियमों को 2019 में तैयार किया गया था और 2024 में लागू किया गया। सरकार का कहना है कि इन नियमों का मकसद मंजूरी की प्रक्रिया को बेहतर बनाना और मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। सरकार ने यह भी दलील दी कि नए नियम आने के बाद अब यह याचिका बेअसर हो गई है। हालांकि, कोर्ट ने पहले कहा था कि 2013 के नियम लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए काफी नहीं थे, जिसके बाद नए नियम लाए गए।
बंधुआ मजदूरी और बच्चों की तस्करी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से मांगा जवाब
एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बंधुआ मजदूरों और खासकर बच्चों की तस्करी के मामले में केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। अदालत ने श्रम मंत्रालय के सचिव को निर्देश दिया है कि वे तीन हफ्ते के भीतर एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करें। इसमें सरकार को बताना होगा कि इस गंभीर समस्या को रोकने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस मुद्दे पर गहरी चिंता जताई। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील एचएस फूलका ने बताया कि विभिन्न राज्यों से करीब 11,000 बच्चों को बचाया गया, लेकिन उनमें से केवल 971 बच्चों को ही तुरंत आर्थिक सहायता मिल सकी। कोर्ट ने कहा कि बचाए गए बच्चों को मदद देने में सबसे ज्यादा दिक्कत तब आती है, जब उन्हें एक राज्य से दूसरे राज्य ले जाकर मजदूरी कराई जाती है। इससे पहले नवंबर 2024 में कोर्ट ने मंत्रालय को सभी राज्यों के साथ बैठक कर एक ठोस योजना बनाने का निर्देश दिया था। इसमें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भी शामिल करने की बात कही गई थी। कोर्ट का मकसद तस्करी रोकने और रिहाई के बाद आर्थिक मदद की प्रक्रिया को सरल बनाना है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 19 मई को होगी।
एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बंधुआ मजदूरों और खासकर बच्चों की तस्करी के मामले में केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। अदालत ने श्रम मंत्रालय के सचिव को निर्देश दिया है कि वे तीन हफ्ते के भीतर एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करें। इसमें सरकार को बताना होगा कि इस गंभीर समस्या को रोकने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस मुद्दे पर गहरी चिंता जताई। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील एचएस फूलका ने बताया कि विभिन्न राज्यों से करीब 11,000 बच्चों को बचाया गया, लेकिन उनमें से केवल 971 बच्चों को ही तुरंत आर्थिक सहायता मिल सकी। कोर्ट ने कहा कि बचाए गए बच्चों को मदद देने में सबसे ज्यादा दिक्कत तब आती है, जब उन्हें एक राज्य से दूसरे राज्य ले जाकर मजदूरी कराई जाती है। इससे पहले नवंबर 2024 में कोर्ट ने मंत्रालय को सभी राज्यों के साथ बैठक कर एक ठोस योजना बनाने का निर्देश दिया था। इसमें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भी शामिल करने की बात कही गई थी। कोर्ट का मकसद तस्करी रोकने और रिहाई के बाद आर्थिक मदद की प्रक्रिया को सरल बनाना है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 19 मई को होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने दिव्यांग कैदियों के लिए बनाई कमेटी, 4 महीने में मांगी विस्तृत रिपोर्ट
वहीं एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि जेलों में बंद दिव्यांग कैदियों के अधिकारों को मानवीय और अधिकार-आधारित दृष्टिकोण से लागू किया जाना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जेल में रहने के दौरान भी संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) के तहत मिलने वाले मौलिक अधिकार कम नहीं होने चाहिए। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने यह आदेश देश भर की जेलों में दिव्यांग कैदियों की स्थिति पर दायर एक याचिका पर दिया। कोर्ट ने इस मुद्दे को सुलझाने की जिम्मेदारी जस्टिस एस रविंद्र भट की अध्यक्षता वाली हाई-पावर्ड कमेटी को सौंपी है।
अदालत ने कमेटी को निर्देश दिया कि वह दिव्यांग कैदियों की जरूरतों के हिसाब से सहायक उपकरण और मोबिलिटी एड्स (चलने-फिरने में मददगार साधन) उपलब्ध कराने के लिए एक कार्ययोजना तैयार करे। कोर्ट ने केंद्र और सभी राज्यों के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभागों को कमेटी के साथ जुड़ने और 6 हफ्ते में हलफनामा दाखिल करने को कहा है। कमेटी को 4 महीने के भीतर अपनी प्रगति रिपोर्ट पेश करनी होगी। मामले की अगली सुनवाई 1 सितंबर को तय की गई है।
वहीं एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि जेलों में बंद दिव्यांग कैदियों के अधिकारों को मानवीय और अधिकार-आधारित दृष्टिकोण से लागू किया जाना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जेल में रहने के दौरान भी संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) के तहत मिलने वाले मौलिक अधिकार कम नहीं होने चाहिए। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने यह आदेश देश भर की जेलों में दिव्यांग कैदियों की स्थिति पर दायर एक याचिका पर दिया। कोर्ट ने इस मुद्दे को सुलझाने की जिम्मेदारी जस्टिस एस रविंद्र भट की अध्यक्षता वाली हाई-पावर्ड कमेटी को सौंपी है।
अदालत ने कमेटी को निर्देश दिया कि वह दिव्यांग कैदियों की जरूरतों के हिसाब से सहायक उपकरण और मोबिलिटी एड्स (चलने-फिरने में मददगार साधन) उपलब्ध कराने के लिए एक कार्ययोजना तैयार करे। कोर्ट ने केंद्र और सभी राज्यों के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभागों को कमेटी के साथ जुड़ने और 6 हफ्ते में हलफनामा दाखिल करने को कहा है। कमेटी को 4 महीने के भीतर अपनी प्रगति रिपोर्ट पेश करनी होगी। मामले की अगली सुनवाई 1 सितंबर को तय की गई है।
पितृत्व विवाद में जूझ रही बच्ची की देखभाल करे सरकार : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने पितृत्व विवाद में जूझ रही बच्ची के भविष्य को लेकर चिंता व्यक्त की है। शीर्ष अदालत ने दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि वह बच्ची की भलाई का निर्धारण करे और न्यूनतम जीवन स्तर बनाए रखने के लिए आवश्यक बुनियादी वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित करे।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली एक महिला की याचिका पर यह फैसला दिया। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि उसकी बेटी भरण-पोषण की हकदार नहीं है। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले में कोई त्रुटि नहीं है। हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता के भरण-पोषण के मामले को सुनवाई कोर्ट में नए सिरे से निर्णय के लिए वापस भेजकर सही किया है। हालांकि, पीठ ने माना कि कानून के अनुसार संशोधित राशि दिए जाने पर भी बच्ची की मुश्किलें बनी रहेंगी।
सर्वोच्च न्यायालय ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा कि भले ही कानूनी रूप से वह व्यक्ति भरण-पोषण देने के लिए बाध्य नहीं है, लेकिन बच्ची का भविष्य अधर में नहीं छोड़ा जा सकता। कोर्ट ने दिल्ली सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग के सचिव को निर्देश दिया कि वे एक अनुभवी अधिकारी को नियुक्त करें जो बच्ची के घर जाकर उसकी स्थिति का जायजा ले। सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि बच्ची के पास जीवन स्तर बनाए रखने के लिए बुनियादी वस्तुएं और सुविधाएं उपलब्ध हों। साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जहां भी बच्ची की स्थिति में कमी पाई जाए, विभाग की तरफ से वहां तत्काल सुधारात्मक कदम उठाए जाएं, ताकि बच्ची का कल्याण सुनिश्चित हो सके।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली एक महिला की याचिका पर यह फैसला दिया। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि उसकी बेटी भरण-पोषण की हकदार नहीं है। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले में कोई त्रुटि नहीं है। हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता के भरण-पोषण के मामले को सुनवाई कोर्ट में नए सिरे से निर्णय के लिए वापस भेजकर सही किया है। हालांकि, पीठ ने माना कि कानून के अनुसार संशोधित राशि दिए जाने पर भी बच्ची की मुश्किलें बनी रहेंगी।
सर्वोच्च न्यायालय ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा कि भले ही कानूनी रूप से वह व्यक्ति भरण-पोषण देने के लिए बाध्य नहीं है, लेकिन बच्ची का भविष्य अधर में नहीं छोड़ा जा सकता। कोर्ट ने दिल्ली सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग के सचिव को निर्देश दिया कि वे एक अनुभवी अधिकारी को नियुक्त करें जो बच्ची के घर जाकर उसकी स्थिति का जायजा ले। सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि बच्ची के पास जीवन स्तर बनाए रखने के लिए बुनियादी वस्तुएं और सुविधाएं उपलब्ध हों। साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जहां भी बच्ची की स्थिति में कमी पाई जाए, विभाग की तरफ से वहां तत्काल सुधारात्मक कदम उठाए जाएं, ताकि बच्ची का कल्याण सुनिश्चित हो सके।

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