Supreme Court: कूनो में चीतों की मौतों पर कोर्ट ने जताई चिंता, केंद्र से राजस्थान भेजने पर विचार करने को कहा
शीर्ष अदालत केंद्र सरकार की ओर से दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें केंद्र ने कोर्ट से यह निर्देश देने की मांग की थी कि राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के लिए अब विशेषज्ञ समिति से दिशा-निर्देश और सलाह लेने की जरूरत नहीं है। इस विशेषज्ञ समिति का गठन सुप्रीम कोर्ट के 28 जनवरी 2020 के आदेश पर किया गया था।
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सुप्रीम कोर्ट ने दक्षिण अफ्रीका और नामीबिया से मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान (केएनपी) लाए गए तीन चीतों की मौत पर गुरुवार को चिंता जताई। इन चीतों की मौत दो महीने से भी कम समय के दौरान हुई थी। कोर्ट ने केंद्र से कहा कि वह राजनीति से ऊपर उठकर उन्हें राजस्थान में स्थानांतरित करने पर विचार करे। जस्टिस बीआर गवई और न्यायमूर्ति संजय करोल की पीठ ने केंद्र से कहा कि विशेषज्ञों की रिपोर्ट और रिपोर्ट्स से ऐसा प्रतीत होता है कि केएनपी बड़ी संख्या में चीतों के लिए पर्याप्त स्थान नहीं है। केंद्र सरकार उन्हें अन्य अभयारण्यों में स्थानांतरित करने पर विचार कर सकती है।
पीठ ने कही यह बात
पीठ ने कहा कि आप राजस्थान में उपयुक्त स्थान की तलाश क्यों नहीं करते? केवल इसलिए कि राजस्थान में विपक्षी दल का शासन है, इसका मतलब यह नहीं है कि आप इस पर विचार नहीं करेंगे। केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि उन्हें अन्य अभयारण्यों में स्थानांतरित करने सहित सभी संभावित पहलुओं की समीक्षा की जा रही है।
इन चीतों की गई जान
दरअसल, ‘साशा’ नाम की साढ़े चार साल की मादा चीते की किडनी की बीमारी के कारण 27 मार्च को मौत हो गई थी। उसे करीब छह महीने पहले ही नामीबिया से लाकर मध्य प्रदेश के केएनपी में रखा गया था। इसके अलावा 23 अप्रैल को दक्षिण अफ्रीका से लाये गए ‘उदय’ नाम के चीते की मौत हो गई थी और मादा चीता ‘दक्षा’ की नौ मई को मौत हो गई थी।
ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद हागी सुनवाई
पीठ ने कहा कि हमें पता चला कि किडनी से संबंधित बीमारी के कारण मरने वाली मादा चीता भारत लाए जाने से पहले इस समस्या से पीड़ित थी। सवाल यह है कि यदि मादा चीता बीमार थी तो उसे भारत लाने की मंजूरी कैसे दी गई। पीठ ने कहा कि आप विदेश से चीते ला रहे हैं, यह अच्छी बात है, लेकिन उन्हें सुरक्षित रखने की भी जरूरत है। उन्हें उपयुक्त आवास देने की आवश्यकता है, आप कूनो से अधिक उपयुक्त आवास की तलाश क्यों नहीं करते। पीठ ने मामले को ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया।
केंद्र ने दी यह दलील
केंद्र ने कोर्ट से कहा कि कोर्ट की ओर से नियुक्त समिति के सदस्यों सहित किसी भी अधिकारी को भारत में चीता प्रबंधन का कोई अनुभव नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि चीते 1947-48 में देश से विलुप्त हो गए थे। केंद्र ने कहा कि अफ्रीकी देशों के साथ यात्राओं, अध्ययन पर्यटन, क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से केंद्र और राज्य सरकारों ने बड़ी संख्या में वन अधिकारियों और पशु चिकित्सकों को प्रशिक्षित किया है। ऐसे में उनके पास चीतों सहित अफ्रीकी वन्यजीव प्रजातियों के साथ काम करने का अनुभव है। इनमें से कुछ अधिकारी और पशु चिकित्सक भारत में प्रोजेक्ट चीता के कार्यान्वयन में सक्रिय रूप से शामिल हैं।
केंद्र की याचिका पर हुई सुनवाई
शीर्ष अदालत केंद्र सरकार की ओर से दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें केंद्र ने कोर्ट से यह निर्देश देने की मांग की थी कि राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के लिए अब विशेषज्ञ समिति से दिशा-निर्देश और सलाह लेने की जरूरत नहीं है। इस विशेषज्ञ समिति का गठन सुप्रीम कोर्ट के 28 जनवरी 2020 के आदेश पर किया गया था।