सुप्रीम कोर्ट में SIR पर सुनवाई: चुनाव आयोग की दलील- यह नागरिकता की जांच नहीं, मतदाता सूची सुधार की प्रक्रिया
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। इस दौरान चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि मतदाताओं की नागरिकता की जांच केवल चुनावी उद्देश्य से की जा रही है, न कि किसी को डिपोर्ट करने के लिए। आयोग ने इसे ‘लिबरल, सॉफ्ट-टच’ प्रक्रिया बताया, जिसमें पुलिस की कोई भूमिका नहीं है।
विस्तार
देश के अलग-अलग राज्यों में चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहण पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। इसी बीच अब इस मामले में चुनाव आयोग (ईसीआई) ने सर्वोच्च न्यायालय में अपनी दलील दी है। आयोग ने साफ किया है कि मतदाताओं की नागरिकता की जांच सिर्फ चुनावी उद्देश्य से की जा रही है, न कि किसी गैर-नागरिक को देश से बाहर निकालने (डिपोर्ट) के लिए। यह मामला मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्या कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष चल रहा है।
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कोर्ट को बताया कि एसआईआर प्रक्रिया कोई कठोर या पुलिस-जांच जैसी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक ‘लिबरल, सॉफ्ट-टच’ तरीका है। उन्होंने कहा कि इसमें पुलिस की कोई भूमिका नहीं है। यह प्रक्रिया बिहार में हो चुकी है और कुछ अन्य राज्यों में जारी है। उन्होंने बताया कि इसका उद्देश्य केवल सही और वैध मतदाताओं को सूची में शामिल करना है।
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SIR और नागरिकता जांच मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई
- चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि मतदाताओं की नागरिकता की जांच केवल चुनावी उद्देश्य से की जा रही है, इसका मकसद किसी को देश से बाहर निकालना नहीं है।
- आयोग ने कहा कि विशेष गहण पुनरीक्षण (एसआईआर) कोई सख्त या पुलिस-जांच जैसी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक लिबरल और सरल तरीका है।
- आयोग ने स्पष्ट किया कि मौजूदा एसआईआर प्रक्रिया में पुलिस शामिल नहीं है, पूरी जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है।
- 2002 और पिछली मतदाता सूचियों में नाम होना मजबूत सबूत माना जा रहा है और ऐसे मामलों में विशेष सावधानी बरती जा रही है।
- आयोग ने कहा कि 1995 के लाल बाबू हुसैन मामले की परिस्थितियां अलग थीं, इसलिए उस फैसले को सीधे मौजूदा एसआईआर पर लागू नहीं किया जा सकता।
- चुनाव आयोग के अनुसार, वोट का अधिकार सिर्फ उम्र से नहीं जुड़ा है, बल्कि नागरिकता, पंजीकरण और कानून के तहत पात्रता भी जरूरी है।
- आयोग ने कहा कि उसे केवल मतदाता पंजीकरण के लिए नागरिकता जांचने का अधिकार है, न कि किसी अन्य कानूनी कार्रवाई के लिए।
- आयोग ने दलील दी कि एसआईआर का उद्देश्य किसी को जानबूझकर मताधिकार से वंचित करना नहीं, बल्कि सही मतदाता सूची तैयार करना है।
- आयोग ने राजनीतिक दलों से कहा कि वे एसआईआर का विरोध करने के बजाय लोगों को नाम दर्ज कराने में मदद करें।
- कोर्ट ने कहा कि लोकतंत्र के लिए मतदाता सहभागिता बढ़ाना राजनीतिक दलों की बड़ी जिम्मेदारी है और इस दिशा में सभी को साथ मिलकर काम करना चाहिए।
‘लाल बाबू हुसैन’ फैसले पर क्या कहा आयोग ने?
बता दें कि याचिकाकर्ताओं ने 1995 के लाल बाबू हुसैन केस का हवाला दिया था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में है तो उसे नागरिक माना जाएगा और नागरिकता पर सवाल उठाने वाले पर सबूत देने की जिम्मेदारी होगी। इस पर द्विवेदी ने कहा कि लाल बाबू केस की परिस्थितियां अलग थीं। उस मामले में पहले ही एसआईआर हो चुका था।
उन्होंने बताया कि जांच पुलिस द्वारा की गई थी। पुलिस की कोई रिपोर्ट रिकॉर्ड पर नहीं थी। द्विवेदी ने आगे कहा कि इसके ठीक उलट मौजूदा मामले में एसआईआर खुद चुनाव आयोग कर रहा है। इस दौरान पुराने मतदाता सूची (खासकर 2002 की सूची) को पर्याप्त प्रमाणिक महत्व दिया जा रहा है।
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इसके साथ ही एसआईआर नोटिफिकेशन के निर्देश संख्या 3 का हवाला देते हुए द्विवेदी ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति का नाम पिछली मतदाता सूची में है, तो उसे नागरिक मानने की दिशा में पर्याप्त महत्व दिया जाएगा। नोटिस जारी करने से पहले इस तथ्य को ध्यान में रखा जाएगा। चुनाव आयोग ने यह भी बताया कि जून 2025 तक के सभी मतदाताओं को एन्यूमरेशन फॉर्म भेजे गए।
वोट का अधिकार और संविधान का अनुच्छेद 326
पीठ के सवाल पर कि क्या नागरिकता तय हुए बिना किसी व्यक्ति का वोटिंग अधिकार छीना जा सकता है, द्विवेदी ने कहा कि इसका जवाब संविधान के अनुच्छेद 326 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 16 में है। उन्होंने समझाया कि वयस्क मताधिकार के तीन आधार हैं, पहला व्यक्ति भारतीय नागरिक हो, उसकी उम्र कम से कम 18 साल हो और वह कानून के तहत अयोग्य न हो और मतदाता के रूप में पंजीकृत हो। इसलिए सिर्फ उम्र ही नहीं, बल्कि नागरिकता और पंजीकरण भी जरूरी शर्तें हैं।
नागरिकता तय करने का अधिकार किसका?
इसके साथ ही एडीआर की ओर से प्रशांत भूषण ने कहा कि याचिकाकर्ता यह नहीं कह रहे कि गैर-नागरिकों को वोट देने दिया जाए, बल्कि सवाल यह है कि नागरिकता तय करने का अधिकार किसे है। इस पर द्विवेदी ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग को सिर्फ मतदाता के रूप में पंजीकरण के उद्देश्य से नागरिकता जांचने का अधिकार है। ईसीआई न तो किसी को डिपोर्ट कर सकता है, न ही उसके भारत में रहने की वैधता तय कर सकता है। सीजेआई ने भी कहा कि अगर कोई खुद को नागरिक बताकर वोट देना चाहता है, तो आयोग को उसकी जांच करने का अधिकार है।
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