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Supreme Court: ISRO से जुड़े दिहाड़ी मजदूरों को स्थायी करने का 'सुप्रीम' आदेश; कहा- 9 सितंबर 2010 से हो लागू
अमर उजाला ब्यूरो
Published by: अमन तिवारी
Updated Thu, 30 Apr 2026 06:00 AM IST
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सार
सुप्रीम कोर्ट ने इसरो के एलपीएससी में काम कर रहे दिहाड़ी मजदूरों को बड़ी राहत देते हुए उनकी सेवाएं नियमित करने का आदेश दिया है। अदालत ने अधिकारियों की लापरवाही पर सवाल उठाते हुए चार सप्ताह में प्रक्रिया पूरी करने को कहा।
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने इसरो से जुड़े लिक्विड प्रोपल्शन सिस्टम्स सेंटर (एलपीएससी) में काम कर रहे दिहाड़ी मजदूरों को बड़ी राहत देते हुए उनकी सेवाओं को नियमित करने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि संबंधित अधिकारियों ने पहले दिए गए न्यायिक निर्देशों का पालन नहीं किया और मजदूरों को स्थायी दर्जा देने में लापरवाही बरती।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। यह याचिका उन दिहाड़ी मजदूरों ने दाखिल की थी, जो 1991 से 1997 के बीच महेंद्रगिरि स्थित एलपीएससी में सामग्री लोडिंग, अनलोडिंग और स्थानांतरण जैसे कामों में लगे थे। मजदूरों ने 'गैंग लेबरर्स (स्पोराडिक कार्य योजना), 2012' को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें अस्थायी आधार पर ही काम जारी रखने की व्यवस्था थी। मद्रास हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2012 की यह योजना केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट), हाईकोर्ट और खुद सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेशों के विपरीत है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि इन आदेशों का पूरी तरह पालन नहीं किया गया, जबकि ये अंतिम रूप ले चुके थे।
चार सप्ताह के भीतर प्रक्रिया पूरी करने को कहा
अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि सभी याचिकाकर्ताओं को 9 सितंबर 2010 से प्रभावी रूप से स्थायी दर्जा दिया जाए। साथ ही संबंधित अधिकारियों को चार सप्ताह के भीतर यह प्रक्रिया पूरी करने को कहा गया। पीठ ने यह भी कहा कि यह फैसला उन सभी कर्मचारियों पर लागू होगा, जो इसी योजना के तहत समान स्थिति में काम कर रहे हैं।
राज्य अपने कर्मचारियों के साथ मनमाना व्यवहार नहीं कर सकता: अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य एक आदर्श नियोक्ता के रूप में अपने कर्मचारियों के साथ मनमाना व्यवहार नहीं कर सकता।
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जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। यह याचिका उन दिहाड़ी मजदूरों ने दाखिल की थी, जो 1991 से 1997 के बीच महेंद्रगिरि स्थित एलपीएससी में सामग्री लोडिंग, अनलोडिंग और स्थानांतरण जैसे कामों में लगे थे। मजदूरों ने 'गैंग लेबरर्स (स्पोराडिक कार्य योजना), 2012' को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें अस्थायी आधार पर ही काम जारी रखने की व्यवस्था थी। मद्रास हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2012 की यह योजना केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट), हाईकोर्ट और खुद सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेशों के विपरीत है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि इन आदेशों का पूरी तरह पालन नहीं किया गया, जबकि ये अंतिम रूप ले चुके थे।
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चार सप्ताह के भीतर प्रक्रिया पूरी करने को कहा
अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि सभी याचिकाकर्ताओं को 9 सितंबर 2010 से प्रभावी रूप से स्थायी दर्जा दिया जाए। साथ ही संबंधित अधिकारियों को चार सप्ताह के भीतर यह प्रक्रिया पूरी करने को कहा गया। पीठ ने यह भी कहा कि यह फैसला उन सभी कर्मचारियों पर लागू होगा, जो इसी योजना के तहत समान स्थिति में काम कर रहे हैं।
राज्य अपने कर्मचारियों के साथ मनमाना व्यवहार नहीं कर सकता: अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य एक आदर्श नियोक्ता के रूप में अपने कर्मचारियों के साथ मनमाना व्यवहार नहीं कर सकता।
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