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SC: 'बिना पक्षकार बनाए आरोप नहीं लगाया जा सकता', वनतारा से सभी हाथियों की वापसी वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट
Thu, 14 Aug 2025 02:53 PM IST
हिमांशु चंदेल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु चंदेल
Updated Thu, 14 Aug 2025 02:53 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात के वनतारा सेंटर में कैद हाथियों की वापसी को लेकर दायर याचिका को बेहद अस्पष्ट बताया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने वनतारा को पक्षकार नहीं बनाया है, जो जरूरी है।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : एएनआई
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात के वनतारा वाइल्डलाइफ रेस्क्यू और रिहैबिलिटेशन सेंटर में रखे गए कैद हाथियों की वापसी को लेकर दायर याचिका को “बेहद अस्पष्ट” करार दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि बिना पक्षकार बनाए किसी संस्था पर आरोप नहीं लगाए जा सकते। यह मामला अब 25 अगस्त को फिर से सुना जाएगा।
गुरुवार को जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस पी.बी. वरले की बेंच ने याचिकाकर्ता सी.आर. जया सुकीन से कहा कि वे वनतारा को इस याचिका में पक्षकार बनाएं। अदालत ने कहा कि आप ऐसे पक्ष पर आरोप लगा रहे हैं जो यहां मौजूद नहीं है, और जिसे आपने प्रतिवादी भी नहीं बनाया है। बेंच ने साफ किया कि पहले सही कानूनी प्रक्रिया अपनाएं, फिर मामले पर विचार किया जाएगा।
याचिका की मांग
याचिका में मांग की गई है कि एक मॉनिटरिंग कमेटी बनाई जाए, जो वनतारा में रखे गए कैद हाथियों को उनके असली मालिकों को वापस दिलाए और वहां मौजूद सभी जंगली जानवरों व पक्षियों को जंगल में छोड़े। याचिकाकर्ता का आरोप है कि इन जानवरों और पक्षियों में कुछ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लुप्तप्राय प्रजातियां हैं, जिन्हें गुजरात में वनतारा में लाने के लिए अवैध तरीके अपनाए गए।
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ये भी पढ़ें- बिहार SIR पर सुप्रीम कोर्ट का चुनाव आयोग से सवाल, पूछा- 2003 में पुनरीक्षण में कौन से दस्तावेज लिए गए थे?
आरोप और विवाद
याचिका में कहा गया है कि राज्यों के प्रशासन ने कानून और नियमों का पालन नहीं किया। कुछ अधिकारियों को धमकाया गया और कुछ को कथित रूप से समझौते के लिए मजबूर किया गया। याचिकाकर्ता का आरोप है कि हाथियों को मंदिरों और उनके मालिकों से जबरन ले जाया गया। साथ ही, वनतारा में लाए गए कई विदेशी जानवरों और पक्षियों को “वाइल्डलाइफ रेस्क्यू” के नाम पर तस्करी करके लाया गया।
सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही
यह मामला पहले चीफ जस्टिस बी.आर. गवई के समक्ष तत्काल सुनवाई के लिए पेश किया गया था। अब इस याचिका को इसी तरह की एक और याचिका के साथ टैग कर दिया गया है। कोर्ट ने साफ किया कि जब तक वनतारा को इस केस में पक्षकार नहीं बनाया जाता, तब तक मामले में ठोस सुनवाई नहीं हो सकती।
ये भी पढ़ें- निमिषा प्रिया मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, वकील ने बताया- अभी कोई खतरा नहीं, बातचीत जारी
आगे की सुनवाई और महत्व
अब यह मामला 25 अगस्त को फिर से सुना जाएगा। यह केस इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि इसमें जंगली जानवरों और लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण, अवैध कैद और वन्यजीव कानून के पालन जैसे संवेदनशील मुद्दे जुड़े हैं। सुप्रीम कोर्ट के रुख से साफ है कि बिना ठोस सबूत और सही कानूनी प्रक्रिया के ऐसे गंभीर आरोपों पर सुनवाई आगे न बढ़े।
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गुरुवार को जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस पी.बी. वरले की बेंच ने याचिकाकर्ता सी.आर. जया सुकीन से कहा कि वे वनतारा को इस याचिका में पक्षकार बनाएं। अदालत ने कहा कि आप ऐसे पक्ष पर आरोप लगा रहे हैं जो यहां मौजूद नहीं है, और जिसे आपने प्रतिवादी भी नहीं बनाया है। बेंच ने साफ किया कि पहले सही कानूनी प्रक्रिया अपनाएं, फिर मामले पर विचार किया जाएगा।
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याचिका की मांग
याचिका में मांग की गई है कि एक मॉनिटरिंग कमेटी बनाई जाए, जो वनतारा में रखे गए कैद हाथियों को उनके असली मालिकों को वापस दिलाए और वहां मौजूद सभी जंगली जानवरों व पक्षियों को जंगल में छोड़े। याचिकाकर्ता का आरोप है कि इन जानवरों और पक्षियों में कुछ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लुप्तप्राय प्रजातियां हैं, जिन्हें गुजरात में वनतारा में लाने के लिए अवैध तरीके अपनाए गए।
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आरोप और विवाद
याचिका में कहा गया है कि राज्यों के प्रशासन ने कानून और नियमों का पालन नहीं किया। कुछ अधिकारियों को धमकाया गया और कुछ को कथित रूप से समझौते के लिए मजबूर किया गया। याचिकाकर्ता का आरोप है कि हाथियों को मंदिरों और उनके मालिकों से जबरन ले जाया गया। साथ ही, वनतारा में लाए गए कई विदेशी जानवरों और पक्षियों को “वाइल्डलाइफ रेस्क्यू” के नाम पर तस्करी करके लाया गया।
सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही
यह मामला पहले चीफ जस्टिस बी.आर. गवई के समक्ष तत्काल सुनवाई के लिए पेश किया गया था। अब इस याचिका को इसी तरह की एक और याचिका के साथ टैग कर दिया गया है। कोर्ट ने साफ किया कि जब तक वनतारा को इस केस में पक्षकार नहीं बनाया जाता, तब तक मामले में ठोस सुनवाई नहीं हो सकती।
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आगे की सुनवाई और महत्व
अब यह मामला 25 अगस्त को फिर से सुना जाएगा। यह केस इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि इसमें जंगली जानवरों और लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण, अवैध कैद और वन्यजीव कानून के पालन जैसे संवेदनशील मुद्दे जुड़े हैं। सुप्रीम कोर्ट के रुख से साफ है कि बिना ठोस सबूत और सही कानूनी प्रक्रिया के ऐसे गंभीर आरोपों पर सुनवाई आगे न बढ़े।