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Abortion Case: एम्स की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सरकार से कहा- गर्भपात के नियमों में अब बदलाव की जरूरत

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Riya Dubey Updated Thu, 30 Apr 2026 11:11 AM IST
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सार

सुप्रीम कोर्ट ने 15 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता के 30 हफ्ते के गर्भपात मामले में एम्स की क्यूरेटिव पिटीशन पर कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने केंद्र सरकार से कानून में बदलाव पर विचार करने को कहा, ताकि दुष्कर्म पीड़िताओं को 20 हफ्ते के बाद भी गर्भपात की अनुमति मिल सके।

Supreme Court pregnancy termination Case Updates AIIMS  curative plea in 15-year-old girl issue hindi news
सुप्रीम कोर्ट सख्त - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कड़ा रुख दिखाया। 15 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता के 30 हफ्ते की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति पर सुनवाई हुई। इस फैसले को चुनौती देने वाली एम्स की क्यूरेटिव पिटीशन पर अदालत ने आपत्ति जताई। अदालत ने केंद्र सरकार से यह भी कहा कि कानून में संशोधन कर दुष्कर्म पीड़िताओं को 20 हफ्ते से अधिक समय के बाद भी गर्भपात की अनुमति देने पर विचार किया जाए।

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कानून को समय के साथ बदलना चाहिए

कोर्ट ने साफ कहा कि जब गर्भधारण दुष्कर्म के कारण हुआ हो, तो समय सीमा नहीं होनी चाहिए और कानून को समय के साथ बदलना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि यह बाल दुष्कर्म का मामला है और अगर गर्भपात की अनुमति नहीं दी गई तो पीड़िता को जीवनभर मानसिक आघात झेलना पड़ेगा।

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कोर्ट ने क्या दिए निर्देश?

अदालत ने कहा कि अगर मां को स्थायी शारीरिक नुकसान नहीं होता है तो गर्भपात किया जाना चाहिए। साथ ही एम्स को निर्देश दिया गया कि वह पीड़िता के माता-पिता को इस मुद्दे पर उचित परामर्श दे, क्योंकि अंतिम निर्णय पीड़िता और उसके परिवार का होना चाहिए।


सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि देश में पहले से ही कई बच्चे गोद लेने के लिए हैं, कई बच्चे सड़कों पर बेसहारा हैं और इस पर माफिया भी सक्रिय हैं। यह 15 साल की बच्ची का अनचाहा गर्भ है। उसे पढ़ाई करनी चाहिए, लेकिन हम उसे मां बनने के लिए मजबूर कर रहे हैं। सोचिए उसने कितना दर्द और अपमान सहा है।

एम्स ने क्या दलील दी?

वहीं, AIIMS की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने दलील दी कि इस अवस्था में गर्भपात संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि 30 हफ्ते में भ्रूण एक जीवित शिशु के रूप में विकसित हो चुका है, जिसमें गंभीर विकृतियां हो सकती हैं। साथ ही नाबालिग मां को जीवनभर स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती हैं और भविष्य में वह मां नहीं बन पाएगी। उन्होंने सुझाव दिया कि बच्चे को जन्म के बाद गोद दिया जा सकता है।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि गर्भपात का निर्णय पीड़िता और उसके माता-पिता की इच्छा पर निर्भर करेगा और एम्स की भूमिका उन्हें सूचित निर्णय लेने में मदद करने की होनी चाहिए।

कोर्ट ने मीडिया से क्या आग्रह किया?

मुख्य न्यायाधीश ने मीडिया से इस मामले की रिपोर्टिंग करते समय संवेदनशीलता बरतने और सुनवाई से संबंधित हर बात (अदालत में हुई पूरी बातचीत) को रिकॉर्ड न करने का आग्रह किया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या सुनाया था फैसला?

सुप्रीम कोर्ट ने 24 अप्रैल को फैसला सुनाते हुए कहा था किसी भी महिला, विशेषकर नाबालिग, को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भावस्था के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग को सात महीने से अधिक की गर्भावस्था को मेडिकल तरीके से खत्म करने की अनुमति दे दी थी। अदालत ने कहा था कि इस मामले में गर्भ अनचाहा है। साथ ही, उसने पहले दो बार आत्महत्या का प्रयास किया है, ऐसे में गर्भावस्था जारी रखना उसके हित में नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?

  • जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा था कि गर्भवती महिला की पसंद सर्वोपरि है, न कि जन्म लेने वाले बच्चे की। अदालत ने कहा कि जबरन गर्भावस्था को जारी रखने से नाबालिग के मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक स्थिति और समग्र विकास पर गहरा असर पड़ सकता है।
  • पीठ ने कहा था कि महिला की प्रजनन संबंधी स्वायत्तता को सर्वोच्च महत्व दिया जाना चाहिए। यदि किसी महिला को अनचाहे गर्भ को जारी रखने के लिए मजबूर किया जाता है, तो यह उसके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होगा।
  • अदालत ने कहा था, 'अपने शरीर से जुड़े फैसले लेने का अधिकार, खासकर प्रजनन से संबंधित मामले, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता का अभिन्न हिस्सा है। इस अधिकार को गलत प्रतिबंध लगाकर कमजोर नहीं किया जा सकता, खासकर नाबालिगों और अनचाहे गर्भ के मामलों में।
  • सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि कोई भी अदालत किसी भी महिला को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भवस्था के लिए मजबूर नहीं कर सकती और खासकर नाबालिग को तो बिल्कुल नहीं।
  • सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि किसी भी महिला, खासकर नाबालिग, को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भवस्था के लिए बाध्य करना न सिर्फ उसकी आजादी की अनदेखी होगी, बल्कि इससे उसे गंभीर मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक आघात भी पहुंच सकता है।

 

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