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Supreme Court: 'क्या गैर-भक्त भी धार्मिक परंपराओं को चुनौती दे सकते हैं?' सबरीमाला पर अदालत ने उठाया बड़ा सवाल
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: Himanshu Singh Chandel
Updated Wed, 08 Apr 2026 06:04 PM IST
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सार
सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मामले में बड़ा सवाल उठाया है कि क्या गैर-भक्त मंदिर की परंपराओं को चुनौती दे सकते हैं। नौ जजों की संविधान पीठ इस मामले में धार्मिक स्वतंत्रता और पीआईएल के दायरे पर सुनवाई कर रही है। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की वैधता पर भी सवाल उठाए हैं और कहा है कि पीआईएल का दुरुपयोग रोकना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
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विस्तार
सबरीमाला मंदिर को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर बड़ा सवाल उठा है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि क्या भगवान अयप्पा के भक्त नहीं होने वाले लोग मंदिर की परंपराओं को चुनौती दे सकते हैं। यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता और आस्था से जुड़ा है, जिस पर देश की सबसे बड़ी अदालत अब गहराई से विचार कर रही है। इस सवाल ने एक बार फिर सबरीमाला विवाद को चर्चा में ला दिया है।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश और भेदभाव से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही है। इसी दौरान कोर्ट ने यह अहम सवाल उठाया कि अगर कोई व्यक्ति उस धर्म या परंपरा से जुड़ा ही नहीं है, तो क्या वह उस परंपरा के खिलाफ याचिका दाखिल कर सकता है। कोर्ट ने खास तौर पर सबरीमाला मंदिर के मामले का जिक्र करते हुए यह सवाल केंद्र के सामने रखा।
क्या गैर-भक्त भी धार्मिक परंपराओं को चुनौती दे सकते हैं?
सुनवाई के दौरान जस्टिस बी वी नागरत्ना ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा कि इस मामले में याचिकाकर्ता कौन हैं। जब यह बताया गया कि याचिका इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन ने दायर की थी, तो कोर्ट ने सवाल उठाया कि ये लोग मंदिर के भक्त नहीं हैं। ऐसे में क्या गैर-भक्तों की याचिका पर सुनवाई होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी का उस परंपरा से सीधा संबंध नहीं है, तो याचिका की वैधता पर सवाल उठता है।
ये भी पढ़ें- Cabinet Decisions: जयपुर मेट्रो फेज-2 से लेकर खाद सब्सिडी तक, कैबिनेट ने इन पांच बड़े फैसलों को दी मंजूरी
सरकार ने क्या रखा अपना पक्ष?
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में कहा कि आज के समय में कोई भी व्यक्ति सीधे अदालत तक पहुंच सकता है। ई-फाइलिंग और कानूनी सहायता के जरिए हर व्यक्ति को न्याय मिल सकता है। ऐसे में पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन यानी पीआईएल का गलत इस्तेमाल भी हो रहा है। उन्होंने कहा कि कई बार ऐसे मामलों में छिपे हुए एजेंडे भी होते हैं, इसलिए अदालत को सावधानी बरतनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने पीआईएल पर क्या कहा?
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत पहले से ही पीआईएल को लेकर सतर्क है। कोर्ट हर याचिका की गहराई से जांच करता है और केवल उन्हीं मामलों में नोटिस जारी करता है, जिनमें ठोस आधार होता है। उन्होंने यह भी कहा कि समय के साथ अदालत ने अपने मानक और सख्त किए हैं, ताकि गलत या बेबुनियाद याचिकाओं को रोका जा सके।
सबरीमाला विवाद का क्या है पूरा इतिहास?
2018 में सुप्रीम कोर्ट ने 4-1 के फैसले में 10 से 50 साल की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर लगी रोक को हटा दिया था। कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताया था। इसके बाद 2019 में इस मामले को बड़ी पीठ के पास भेज दिया गया, ताकि धार्मिक स्वतंत्रता और परंपराओं की सीमा को तय किया जा सके। अब नौ जजों की पीठ इस पूरे मामले पर अंतिम फैसला देने की दिशा में सुनवाई कर रही है।
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दरअसल, सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश और भेदभाव से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही है। इसी दौरान कोर्ट ने यह अहम सवाल उठाया कि अगर कोई व्यक्ति उस धर्म या परंपरा से जुड़ा ही नहीं है, तो क्या वह उस परंपरा के खिलाफ याचिका दाखिल कर सकता है। कोर्ट ने खास तौर पर सबरीमाला मंदिर के मामले का जिक्र करते हुए यह सवाल केंद्र के सामने रखा।
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क्या गैर-भक्त भी धार्मिक परंपराओं को चुनौती दे सकते हैं?
सुनवाई के दौरान जस्टिस बी वी नागरत्ना ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा कि इस मामले में याचिकाकर्ता कौन हैं। जब यह बताया गया कि याचिका इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन ने दायर की थी, तो कोर्ट ने सवाल उठाया कि ये लोग मंदिर के भक्त नहीं हैं। ऐसे में क्या गैर-भक्तों की याचिका पर सुनवाई होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी का उस परंपरा से सीधा संबंध नहीं है, तो याचिका की वैधता पर सवाल उठता है।
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सरकार ने क्या रखा अपना पक्ष?
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में कहा कि आज के समय में कोई भी व्यक्ति सीधे अदालत तक पहुंच सकता है। ई-फाइलिंग और कानूनी सहायता के जरिए हर व्यक्ति को न्याय मिल सकता है। ऐसे में पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन यानी पीआईएल का गलत इस्तेमाल भी हो रहा है। उन्होंने कहा कि कई बार ऐसे मामलों में छिपे हुए एजेंडे भी होते हैं, इसलिए अदालत को सावधानी बरतनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने पीआईएल पर क्या कहा?
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत पहले से ही पीआईएल को लेकर सतर्क है। कोर्ट हर याचिका की गहराई से जांच करता है और केवल उन्हीं मामलों में नोटिस जारी करता है, जिनमें ठोस आधार होता है। उन्होंने यह भी कहा कि समय के साथ अदालत ने अपने मानक और सख्त किए हैं, ताकि गलत या बेबुनियाद याचिकाओं को रोका जा सके।
सबरीमाला विवाद का क्या है पूरा इतिहास?
2018 में सुप्रीम कोर्ट ने 4-1 के फैसले में 10 से 50 साल की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर लगी रोक को हटा दिया था। कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताया था। इसके बाद 2019 में इस मामले को बड़ी पीठ के पास भेज दिया गया, ताकि धार्मिक स्वतंत्रता और परंपराओं की सीमा को तय किया जा सके। अब नौ जजों की पीठ इस पूरे मामले पर अंतिम फैसला देने की दिशा में सुनवाई कर रही है।
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