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Supreme Court: 'स्कूलों में मुफ्त मिले सैनेटरी पैड', सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश; नहीं तो मान्यता होगी रद्द
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: लव गौर
Updated Fri, 30 Jan 2026 02:48 PM IST
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सार
Supreme Court: स्कूली बच्चियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों को स्कूलों के अंदर मुफ्त सैनेटरी पैड रखने के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार संविधान में दिए गए जीवन के मौलिक अधिकार का हिस्सा है।
स्कूली छात्राओं पर सुप्रीम कोर्ट का निर्देश
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे यह सुनिश्चित करें कि प्राइवेट और सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाली छात्राओं को मुफ्त में बायोडिग्रेडेबल सैनेटरी पैड दिए जाएं। शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में कहा कि मेंस्ट्रुअल हेल्थ यानी मासिक धर्म स्वास्थ्य के अधिकार के तहत संविधान में दिए गए जीवन के मौलिक अधिकार का हिस्सा है।
स्कूली बच्चियों के स्वास्थ्य से जुड़े आदेश पर अदालत ने कहा है कि अगर सरकारें स्कूली छात्राओं को टॉयलेट और मुफ्त सैनेटरी पैड देने में फेल होती हैं, तो उन्हें भी जवाबदेह ठहराया जाएगा। वरिष्ठ न्यायाधीश जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं के लिए सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में केंद्र सरकार की मासिक धर्म स्वच्छता नीति को पूरे देश में लागू करने पर यह आदेश दिया है।
प्राइवेट स्कूलों को 'सुप्रीम' चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अगर प्राइवेट स्कूल लड़कियों और लड़कों के लिए अलग-अलग शौचालय और सैनेटरी पैड देने में फेल होते हैं, तो उनकी मान्यता रद्द कर दी जाएगी। कोर्ट ने कहा, 'मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है। अगर प्राइवेट स्कूल ये सुविधाएं देने में विफल रहते हैं, तो उनकी मान्यता रद्द कर दी जाएगी।'
अलग-अलग शौचालय सुनिश्चित करने के निर्देश
इसी के साथ अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से सभी स्कूलों में दिव्यांगों के लिए अनुकूल शौचालय उपलब्ध कराने के लिए भी कहा है। वहीं सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को स्कूलों में महिला और पुरुष छात्रों के लिए अलग-अलग शौचालय सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।
ये भी पढ़ें: UGC Bill Row: सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी रेगुलेशन 2026 पर उठाए चार सवाल, जाति-आधारित भेदभाव पर स्पष्टीकरण मांगा
बता दें कि शीर्ष अदालत ने 10 दिसंबर, 2024 को जया ठाकुर की ओर से दायर एक जनहित याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रखा, जिसमें कक्षा 6 से 12 तक की किशोर छात्राओं के लिए सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में केंद्र सरकार की 'स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए मासिक धर्म स्वच्छता नीति' को पूरे भारत में लागू करने की मांग की गई।
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स्कूली बच्चियों के स्वास्थ्य से जुड़े आदेश पर अदालत ने कहा है कि अगर सरकारें स्कूली छात्राओं को टॉयलेट और मुफ्त सैनेटरी पैड देने में फेल होती हैं, तो उन्हें भी जवाबदेह ठहराया जाएगा। वरिष्ठ न्यायाधीश जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं के लिए सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में केंद्र सरकार की मासिक धर्म स्वच्छता नीति को पूरे देश में लागू करने पर यह आदेश दिया है।
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प्राइवेट स्कूलों को 'सुप्रीम' चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अगर प्राइवेट स्कूल लड़कियों और लड़कों के लिए अलग-अलग शौचालय और सैनेटरी पैड देने में फेल होते हैं, तो उनकी मान्यता रद्द कर दी जाएगी। कोर्ट ने कहा, 'मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है। अगर प्राइवेट स्कूल ये सुविधाएं देने में विफल रहते हैं, तो उनकी मान्यता रद्द कर दी जाएगी।'
अलग-अलग शौचालय सुनिश्चित करने के निर्देश
इसी के साथ अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से सभी स्कूलों में दिव्यांगों के लिए अनुकूल शौचालय उपलब्ध कराने के लिए भी कहा है। वहीं सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को स्कूलों में महिला और पुरुष छात्रों के लिए अलग-अलग शौचालय सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।
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बता दें कि शीर्ष अदालत ने 10 दिसंबर, 2024 को जया ठाकुर की ओर से दायर एक जनहित याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रखा, जिसमें कक्षा 6 से 12 तक की किशोर छात्राओं के लिए सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में केंद्र सरकार की 'स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए मासिक धर्म स्वच्छता नीति' को पूरे भारत में लागू करने की मांग की गई।
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