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Supreme Court on UGC New Rules: The story behind the UGC Rules is related to the Rohit Vemula-Payal Tadvi case
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Supreme Court on UGC New Rules: रोहित वेमुला- पायल तड़वी केस से जुड़ी है UGC Rules के पीछे की कहानी!
अमर उजाला डिजिटल डॉट कॉम Published by: आदर्श Updated Fri, 30 Jan 2026 02:48 PM IST
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यह खबर सिर्फ यूजीसी के नए नियमों की नहीं है। यह उस लंबी, दर्दनाक प्रक्रिया की कहानी है, जिसमें देश के कुछ सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों के भीतर छिपे जातिगत तनाव, छात्रों की मानसिक टूटन और संस्थागत प्रतिक्रिया की सीमाएं बार-बार सामने आईं। ‘समता विनियम 2026’ अचानक नहीं आए। इनके पीछे वर्षों का मंथन है, अदालतों की टिप्पणियां हैं, सामाजिक दबाव है और दो ऐसी घटनाएं हैं, जिन्होंने नीति-निर्माताओं को यह सोचने पर मजबूर किया कि क्या मौजूदा नियम वाकई पर्याप्त हैं।
इन दो घटनाओं के नाम हैं- रोहित वेमुला और डॉ. पायल तड़वी।
केस स्टडी 1: रोहित वेमुला: कैंपस विवाद से राष्ट्रीय बहस तक
17 जनवरी 2016 को हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में शोध छात्र रोहित वेमुला ने आत्महत्या कर ली। यह घटना एक व्यक्तिगत त्रासदी से आगे बढ़कर राष्ट्रीय बहस बन गई। सवाल उठे कि क्या विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव और संस्थागत फैसले छात्रों की मानसिक स्थिति पर गहरा असर डालते हैं।
रोहित वेमुला छात्र राजनीति में सक्रिय थे और अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन से जुड़े थे। 2015 में कैंपस में एक विवाद हुआ, जिसमें आरोप लगा कि रोहित और उनके कुछ साथियों ने एबीवीपी के एक सदस्य के साथ मारपीट की। इस मामले के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने अनुशासनात्मक कार्रवाई की और रोहित सहित कुछ छात्रों को हॉस्टल से बाहर कर दिया गया।
इस फैसले के बाद रोहित और उनके साथियों को कैंपस सुविधाओं से काफी हद तक अलग कर दिया गया। समर्थकों का कहना था कि यह कार्रवाई असंतुलित और मानसिक रूप से दबाव बनाने वाली थी, जबकि विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे अनुशासन से जुड़ा मामला बताया।
रोहित की आत्महत्या के बाद विपक्षी दलों और कई छात्र संगठनों ने आरोप लगाया कि राजनीतिक दबाव और जातिगत भेदभाव ने इस त्रासदी में भूमिका निभाई।
2019 में तेलंगाना पुलिस ने इस मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की। रिपोर्ट में दावा किया गया कि रोहित अनुसूचित जाति वर्ग से नहीं थे और उनकी जाति को लेकर दस्तावेजों में अनियमितता पाई गई। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि वे व्यक्तिगत और शैक्षणिक तनाव में थे।
इस क्लोजर रिपोर्ट को लेकर रोहित के परिवार ने कड़ा विरोध किया। परिवार का कहना था कि जांच का फोकस उनके बेटे की मौत के कारणों से हटकर उसकी जाति पर चला गया, जबकि असल मुद्दा संस्थागत व्यवहार और मानसिक दबाव का था।
इस पूरे प्रकरण ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या कैंपस में लिए गए प्रशासनिक फैसलों और सामाजिक माहौल का छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर पर्याप्त आकलन किया जाता है।
केस स्टडी 2: डॉ. पायल तड़वी: मेडिकल संस्थानों में भेदभाव के आरोप
22 मई 2019 को मुंबई के बीवाईएल नायर अस्पताल के हॉस्टल में 26 वर्षीय पीजी छात्रा डॉ. पायल तड़वी ने आत्महत्या कर ली। पायल अनुसूचित जनजाति समुदाय से थीं और पहली पीढ़ी की डॉक्टर थीं।
पायल के परिवार ने आरोप लगाया कि तीन वरिष्ठ डॉक्टर हेमा आहूजा, भक्ति मेहर और अंकिता खंडेलवाल उन्हें लगातार जातिसूचक टिप्पणियों और मानसिक उत्पीड़न का सामना करवा रही थीं। परिवार का कहना था कि काम के दबाव के साथ-साथ कथित भेदभाव ने पायल को मानसिक रूप से तोड़ दिया।
पुलिस जांच में एक सुसाइड नोट मिलने की बात सामने आई, जिसमें इन तीन डॉक्टरों के नामों का उल्लेख बताया गया। इसके बाद रैगिंग और अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण कानून के तहत मामला दर्ज किया गया। तीनों डॉक्टरों को गिरफ्तार किया गया और अस्पताल प्रशासन ने उन्हें निलंबित किया।
यह मामला सिर्फ एक व्यक्तिगत केस नहीं रहा। इसने मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में काम के माहौल, पदानुक्रम (हायरार्की) और संभावित भेदभाव को लेकर देशभर में बहस को जन्म दिया।
रोहित वेमुला और पायल तड़वी दोनों मामलों में एक समान पहलू सामने आया: छात्रों और प्रशिक्षु डॉक्टरों के मानसिक स्वास्थ्य, संस्थागत फैसलों और कथित भेदभाव के बीच जटिल संबंध।
इन घटनाओं के बाद कई रिपोर्ट्स, याचिकाएं और विशेषज्ञ समितियों की चर्चाएं सामने आईं, जिनमें यह कहा गया कि 2012 के यूजीसी नियम केवल सीमित दायरे में शिकायतों को कवर करते हैं। समय के साथ यह महसूस किया गया कि भेदभाव केवल अनुसूचित जाति और जनजाति तक सीमित नहीं है, बल्कि पिछड़ा वर्ग के छात्र भी इसी तरह की समस्याओं का सामना कर सकते हैं।
इसी पृष्ठभूमि में यूजीसी ने नियमों की समीक्षा शुरू की और ‘समता विनियम 2026’ का मसौदा तैयार किया। उद्देश्य था शिकायत तंत्र को व्यापक बनाना, परिभाषाओं को अपडेट करना और कैंपस में समानता से जुड़े मामलों को अधिक संरचित तरीके से संबोधित करना।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इन नए नियमों पर अस्थायी रोक लगाते हुए कहा कि भेदभाव की परिभाषा और भाषा को और स्पष्ट तथा संतुलित करने की जरूरत है। अदालत ने यह भी कहा कि यह देखा जाना चाहिए कि नए नियम संविधान के समानता के अधिकार के अनुरूप हैं या नहीं। फिलहाल 2012 के पुराने नियम लागू रहेंगे।
रोहित वेमुला और डॉ. पायल तड़वी के मामले अलग-अलग संस्थानों से जुड़े थे, लेकिन दोनों ने यह दिखाया कि उच्च शिक्षा संस्थानों में सामाजिक, प्रशासनिक और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे कितने जटिल हो सकते हैं।
‘समता विनियम 2026’ इन्हीं जटिलताओं की पृष्ठभूमि में सामने आए। इन नियमों पर बहस जारी है, अदालत की निगरानी में प्रक्रिया आगे बढ़ रही है.
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