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UGC New Rule 2026 Row: Brijbhushan furious over UGC bill, warns government of massive agitation!
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UGC New Rule 2026 Row: UGC बिल पर बिफरे बृजभूषण, सरकार को दिया बड़े आंदोलन की चेतावनी!
वीडियो डेस्क, अमर उजाला डॉट कॉम Published by: भास्कर तिवारी Updated Thu, 29 Jan 2026 06:45 AM IST
यूजीसी के नए नियमों के विरुद्ध कैसरगंज से भाजपा के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह द्वारा बुधवार को मोर्चा खोलना न केवल शैक्षणिक नीति को लेकर उठते सवालों को उजागर करता है, बल्कि सत्तारूढ़ दल के भीतर मौजूद असहमति की आवाज़ को भी सामने लाता है। बृजभूषण शरण सिंह ने इस मुद्दे पर खुलकर अपनी नाराज़गी जाहिर करते हुए कहा कि नए यूजीसी नियम उच्च शिक्षा के विकेंद्रीकरण की मूल भावना के खिलाफ हैं और इससे राज्यों तथा स्थानीय विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता प्रभावित होगी। उनका तर्क है कि शिक्षा जैसे संवेदनशील और विविधताओं से भरे क्षेत्र में एकरूप नियम थोपना व्यवहारिक नहीं है, क्योंकि देश के अलग-अलग हिस्सों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक परिस्थितियाँ अलग-अलग हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि नए नियमों से ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों के विश्वविद्यालयों को सबसे अधिक नुकसान होगा, जो पहले से ही संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। बृजभूषण शरण सिंह के अनुसार, केंद्र सरकार को नीति बनाते समय ज़मीनी हकीकत और शिक्षकों-छात्रों की राय को प्राथमिकता देनी चाहिए थी, लेकिन यूजीसी के नए नियमों में यह संवेदनशीलता दिखाई नहीं देती। उनका यह भी मानना है कि अत्यधिक केंद्रीकरण से न केवल अकादमिक स्वतंत्रता सीमित होगी, बल्कि नवाचार और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप पाठ्यक्रम विकसित करने की क्षमता भी कमजोर पड़ेगी।
भाजपा के पूर्व सांसद द्वारा इस तरह सार्वजनिक रूप से विरोध दर्ज कराना राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह दर्शाता है कि शिक्षा नीति जैसे मुद्दों पर पार्टी लाइन से हटकर भी विचार रखने की गुंजाइश है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि यूजीसी के नए नियमों पर पुनर्विचार किया जाए और राज्यों, विश्वविद्यालयों, शिक्षकों तथा विशेषज्ञों से व्यापक संवाद के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाए। बृजभूषण शरण सिंह का कहना है कि शिक्षा केवल प्रशासनिक आदेशों से नहीं, बल्कि सहभागिता, सहमति और विश्वास के माध्यम से मजबूत होती है। कुल मिलाकर, यूजीसी के नए नियमों के विरुद्ध उनका मोर्चा खोलना इस बात का संकेत है कि उच्च शिक्षा को लेकर देश में एक व्यापक और गंभीर बहस की आवश्यकता है, ताकि सुधारों के नाम पर ऐसी नीतियाँ न बनें जो शिक्षा की आत्मा और संघीय ढांचे दोनों को कमजोर कर दें।
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