फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   supreme-court-senior-citizens-tribunal-can-evict-children-from-senior-citizens-property

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया अधिकार: कहा- बुजुर्गों की संपत्ति पर ट्रिब्यूनल को फैसले का हक; दिया क्या आदेश?

Wed, 19 Aug 2026 04:04 PM IST
Devesh Tripathi पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली Published by: Devesh Tripathi Updated Wed, 19 Aug 2026 04:04 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों को लेकर अहम कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। अदालत के अनुसार, संबंधित ट्रिब्यूनल जरूरत पड़ने पर बुजुर्ग की संपत्ति से बच्चों को बाहर करने का निर्देश दे सकता है। यह अधिकार वरिष्ठ नागरिक की देखभाल, सुरक्षा और सम्मान बनाए रखने से जुड़ा है। मामले में लखनऊ की संपत्ति को लेकर बेटे और बहू के खिलाफ जारी बेदखली आदेश को शीर्ष अदालत ने सही माना।

विज्ञापन
supreme-court-senior-citizens-tribunal-can-evict-children-from-senior-citizens-property
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर दोहराया कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत गठित ट्रिब्यूनल को वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति से उसके बच्चों को निकालने का आदेश देने का अधिकार है। अदालत के मुताबिक, वरिष्ठ नागरिक के भरण-पोषण, सुरक्षा और सम्मान को सुनिश्चित करने के लिए जरूरत पड़ने पर ऐसा आदेश दिया जा सकता है।
विज्ञापन


न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने कहा, "हमें यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि अधिनियम के तहत गठित ट्रिब्यूनल के पास वरिष्ठ नागरिक के भरण-पोषण या सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए उसे संपत्ति से निकालने का आदेश देने की शक्ति है।" अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके जरिए ट्रिब्यूनल के उस फैसले को पलट दिया गया था, जिसमें अपीलकर्ता की संपत्ति से उसके बेटे और बहू को निकालने का आदेश दिया गया था।
विज्ञापन


क्या है पूरा मामला?
यह मामला लखनऊ के विकास नगर स्थित एक आवासीय मकान के मालिक रवि कांत गुप्ता की अपील से जुड़ा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुप्ता के बेटे और बहू को घर से निकालने के आदेश को रद्द कर दिया था। मामला तब सामने आया जब गुप्ता की 81 वर्षीय मां को कथित तौर पर घर छोड़कर वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके बाद गुप्ता ने 5 जून 2022 को 2007 के अधिनियम के तहत अपने बेटे को संपत्ति से निकालने के लिए जिलाधिकारी के समक्ष आवेदन किया।
विज्ञापन
विज्ञापन


15 नवंबर 2022 को उपमंडल मजिस्ट्रेट ने अपने आदेश में पाया कि संपत्ति गुप्ता की स्वयं अर्जित संपत्ति थी। आदेश में यह भी दर्ज किया गया कि उनके बेटे ने अपनी दादी को घर में रहने की अनुमति नहीं दी और परेशानी पैदा की। इसके बाद एसडीएम ने बेटे को घर से निकालने का आदेश दिया।

जिलाधिकारी ने भी बरकरार रखा आदेश
जिलाधिकारी ने 9 अगस्त 2023 को एसडीएम के आदेश को बरकरार रखा। उन्होंने बेटे और उसकी पत्नी को संपत्ति का कब्जा गुप्ता को सौंपने का निर्देश दिया। इसके बाद बेटे और उसकी पत्नी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में इन आदेशों को चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा था कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम के तहत अधिकारियों को किसी व्यक्ति को संपत्ति से निकालने का आदेश देने का अधिकार नहीं है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने एसडीएम और जिलाधिकारी के आदेशों को रद्द कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने पलटा हाईकोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के निष्कासन आदेश में हस्तक्षेप करके गलती की। अदालत ने कहा कि यह स्थापित कानूनी स्थिति है कि वरिष्ठ नागरिक के कल्याण और सुरक्षा के लिए ट्रिब्यूनल को संपत्ति से निष्कासन का आदेश देने का अधिकार है।

ट्रिब्यूनल के अधिकारों पर क्या कहा?
अदालत ने कहा, "अधिनियम की धारा 7 के तहत ट्रिब्यूनल गठित किए गए हैं और धारा 8 के तहत उन्हें दीवानी अदालत की शक्तियों के साथ संक्षिप्त प्रक्रिया के तहत जांच करने का अधिकार है। अधिनियम की धारा 27 स्पष्ट रूप से दीवानी अदालतों के अधिकार क्षेत्र को रोकती है। यह स्थापित कानूनी सिद्धांत है कि जब कोई अधिनियम किसी संस्था को अधिकार क्षेत्र प्रदान करता है तो वह उसके इस्तेमाल के लिए जरूरी सभी कार्य करने या जरूरी साधनों का इस्तेमाल करने की शक्ति भी प्रदान करता है।"

अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 की अपनी व्याख्या और अनुच्छेद 41 का भी उल्लेख किया। पीठ के अनुसार, ये प्रावधान ऐसी सामाजिक व्यवस्था की कल्पना करते हैं, जो कमजोर वर्गों की रक्षा करे और हर व्यक्ति को जीवनभर सम्मान के साथ जीने में सक्षम बनाए।

बाद के मामलों में भी दोहराया यही रुख
सुप्रीम कोर्ट ने 2025 के संतौला देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य और कमलकांत मिश्रा बनाम अतिरिक्त कलेक्टर एवं अन्य मामलों में भी इसी रुख को दोहराया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने रवि कांत गुप्ता की अपील मंजूर कर ली और उनके बेटे तथा उसकी पत्नी को संपत्ति से निकालने के ट्रिब्यूनल के आदेश को बरकरार रखा।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed