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Supreme Court: 1882 के कानून की धारा को चुनौती देने वाली याचिका खारिज, याचिकाकर्ताओं को विधि आयोग की सलाह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: Nirmal Kant
Updated Thu, 12 Mar 2026 07:26 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : पीटीआई (फाइल)
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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को दो याचिकाकर्ताओं से कहा कि वे विधि आयोग के पास जाएं। इन याचिकाकर्ताओं ने 1882 के कानून के एक प्रावधान को चुनौती दी थी, जिसमें मुस्लिम कानून के तहत किए गए तोहफों (उपहार) को पंजीकरण से मुक्त रखा गया है।
मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के लिए उचित यह होगा कि वे विधि आयोग जैसे विशेषज्ञ निकाय के पास जाएं। विधि आयोग को मौजूदा कानूनों में उचित संशोधन की सिफारिश करने या नए कानून बनाने की जिम्मेदारी दी गई है।
याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि याचिका ने संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 की धारा 129 और मुस्लिम व्यक्तिगत कानून (शरिया) आवेदन अधिनियम, 1937 की धारा 2 की सांविधानिक वैधता को चुनौती दी है, विशेष रूप से 'तोहफा' शब्द को लेकर।
वकील ने कहा कि मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के तहत किए गए तोहफों को स्टाम्प शुल्क से मुक्त किया गया है, जबकि गैर-मुसलमानों को यह छूट नहीं दी गई। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली भी शामिल थे। उन्होंने कहा कि यदि सार्वजनिक खजाने को कोई नुकसान होता है, तो संसद ही इसके लिए सक्षम मंच है। पीठ ने कहा कि संसद हमेशा कानून में संशोधन कर सकती है और नया कानून ला सकती है।
सीजेआई ने पूछा कि याचिकाकर्ताओं ने संसद के किसी सदस्य के पास यह मुद्दा क्यों नहीं उठाया कि कानून में कथित भेदभाव का तत्व मौजूद है। वकील ने कहा कि संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम और पंजीकरण अधिनियम के बीच संबंध है। उन्होंने कहा कि तोहफे की अवधारणा को लेकर व्यक्तिगत कानून और मौलिक अधिकारों के बीच टकराव पर निर्णय इस अदालत को करना है। पीठ ने कहा कि यह कानून 1882 का है। अचानक 2026 में आपको याद आता है कि यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है और जब आपको यह याद आता है, तब आपने उन लोगों को सूचित करना भी उचित नहीं समझा जो इसे ठीक कर सकते थे। सीजेआई ने कहा कि 'सबसे उचित मंच' विधि आयोग होगा।
ये भी पढ़ें: CEC के पद से हटाए जा सकेंगे ज्ञानेश कुमार?: 200 से अधिक सांसदों ने नोटिस पर किए हस्ताक्षर, क्या है नियम
पीठ ने कहा, हमारे विचार में याचिकाकर्ताओं के लिए उचित तरीका यह होगा कि वे विधि आयोग जैसे विशेषज्ञ निकाय के पास जाएं, जिसे मौजूदा कानूनों में संशोधन की सिफारिश करने और समय-समय पर नए कानून बनाने की जिम्मेदारी दी गई है। पीठ ने कहा कि वर्तमान में ऐसे विशेषज्ञ निकाय होने के कारण इस समय याचिका पर विचार करने का कोई कारण नहीं है। पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया, लेकिन याचिकाकर्ताओं को विधि आयोग के पास जाने की अनुमति दी।
सुप्रीम कोर्ट ने 1985 की पीआईएल का निपटारा किया
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में वायु प्रदूषण से जुड़ी 1985 की जनहित याचिका (पीआईएल) का निपटारा किया। शीर्ष कोर्ट ने हाई कोर्ट की रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में वायु प्रदूषण से जुड़े मामलों पर स्वतः संज्ञान मामला दर्ज करे।
पीआईएल 1985 में पर्यावरणविद् एमसी मेहता की ओर से दायर की थी। इस याचिका पर दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण के स्तर को रोकने, नियंत्रित करने और प्रबंधित करने के लिए कई अहम आदेश और निर्देश दिए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट की पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली शामिल थे।
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र का बयान: समलैंगिक पुरुष और वेश्याओं को रक्तदान से रोकने वाले नियम नहीं बदलेंगे
केंद्र ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि विशेषज्ञों ने उन नियमों में बदलाव करने के खिलाफ राय दी है, जो लिंग परिवर्तन वाले व्यक्ति, समलैंगिक पुरुष और वेश्याओं को रक्तदान करने से रोकते हैं। केंद्र ने मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची व न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ को बताया कि पिछले साल मई में कोर्ट के निर्देश के बाद विशेषज्ञों ने इस मामले पर फिर से विचार किया।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा, पुनर्विचारित राय यह है कि अगर इस रोक में ढील दी गई तो दूसरों के लिए हानिकारक होगा। सुप्रीम कोर्ट में 2017 के उन नियमों को चुनौती दी गई थी, जो लिंग परिवर्तन वाले व्यक्ति, पुरुष जो पुरुषों के साथ यौन संबंध रखते हैं और महिला वेश्याओं को रक्तदाता बनने से रोकते हैं। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील जया कोठारी ने कहा कि ये भेदभावपूर्ण नियम लिंग परिवर्तन वाले व्यक्ति के रक्तदान पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा देते हैं।
मुख्य न्यायाधीश ने पूछा, हमें ऐसा निर्देश क्यों देना चाहिए, कोई एक अच्छा कारण बताइए। पीठ ने कहा कि लाखों गरीब लोग रक्त बैंक की सुविधा का उपयोग करते हैं और वे निजी अस्पतालों का खर्च नहीं उठा सकते। सीजेआई ने पूछा, अगर संक्रमण का केवल एक प्रतिशत भी खतरा हो, तो उन्हें क्यों प्रभावित होना चाहिए? याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि किसी भी व्यक्ति से रक्त लेने पर उसका परीक्षण किया जाता है, जिसमें एचआईवी परीक्षण भी शामिल है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि रक्तदान और स्वीकार करना दोनों ही स्वैच्छिक हैं।
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मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के लिए उचित यह होगा कि वे विधि आयोग जैसे विशेषज्ञ निकाय के पास जाएं। विधि आयोग को मौजूदा कानूनों में उचित संशोधन की सिफारिश करने या नए कानून बनाने की जिम्मेदारी दी गई है।
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याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि याचिका ने संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 की धारा 129 और मुस्लिम व्यक्तिगत कानून (शरिया) आवेदन अधिनियम, 1937 की धारा 2 की सांविधानिक वैधता को चुनौती दी है, विशेष रूप से 'तोहफा' शब्द को लेकर।
वकील ने कहा कि मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के तहत किए गए तोहफों को स्टाम्प शुल्क से मुक्त किया गया है, जबकि गैर-मुसलमानों को यह छूट नहीं दी गई। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली भी शामिल थे। उन्होंने कहा कि यदि सार्वजनिक खजाने को कोई नुकसान होता है, तो संसद ही इसके लिए सक्षम मंच है। पीठ ने कहा कि संसद हमेशा कानून में संशोधन कर सकती है और नया कानून ला सकती है।
सीजेआई ने पूछा कि याचिकाकर्ताओं ने संसद के किसी सदस्य के पास यह मुद्दा क्यों नहीं उठाया कि कानून में कथित भेदभाव का तत्व मौजूद है। वकील ने कहा कि संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम और पंजीकरण अधिनियम के बीच संबंध है। उन्होंने कहा कि तोहफे की अवधारणा को लेकर व्यक्तिगत कानून और मौलिक अधिकारों के बीच टकराव पर निर्णय इस अदालत को करना है। पीठ ने कहा कि यह कानून 1882 का है। अचानक 2026 में आपको याद आता है कि यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है और जब आपको यह याद आता है, तब आपने उन लोगों को सूचित करना भी उचित नहीं समझा जो इसे ठीक कर सकते थे। सीजेआई ने कहा कि 'सबसे उचित मंच' विधि आयोग होगा।
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पीठ ने कहा, हमारे विचार में याचिकाकर्ताओं के लिए उचित तरीका यह होगा कि वे विधि आयोग जैसे विशेषज्ञ निकाय के पास जाएं, जिसे मौजूदा कानूनों में संशोधन की सिफारिश करने और समय-समय पर नए कानून बनाने की जिम्मेदारी दी गई है। पीठ ने कहा कि वर्तमान में ऐसे विशेषज्ञ निकाय होने के कारण इस समय याचिका पर विचार करने का कोई कारण नहीं है। पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया, लेकिन याचिकाकर्ताओं को विधि आयोग के पास जाने की अनुमति दी।
सुप्रीम कोर्ट ने 1985 की पीआईएल का निपटारा किया
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में वायु प्रदूषण से जुड़ी 1985 की जनहित याचिका (पीआईएल) का निपटारा किया। शीर्ष कोर्ट ने हाई कोर्ट की रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में वायु प्रदूषण से जुड़े मामलों पर स्वतः संज्ञान मामला दर्ज करे।
पीआईएल 1985 में पर्यावरणविद् एमसी मेहता की ओर से दायर की थी। इस याचिका पर दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण के स्तर को रोकने, नियंत्रित करने और प्रबंधित करने के लिए कई अहम आदेश और निर्देश दिए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट की पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली शामिल थे।
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र का बयान: समलैंगिक पुरुष और वेश्याओं को रक्तदान से रोकने वाले नियम नहीं बदलेंगे
केंद्र ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि विशेषज्ञों ने उन नियमों में बदलाव करने के खिलाफ राय दी है, जो लिंग परिवर्तन वाले व्यक्ति, समलैंगिक पुरुष और वेश्याओं को रक्तदान करने से रोकते हैं। केंद्र ने मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची व न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ को बताया कि पिछले साल मई में कोर्ट के निर्देश के बाद विशेषज्ञों ने इस मामले पर फिर से विचार किया।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा, पुनर्विचारित राय यह है कि अगर इस रोक में ढील दी गई तो दूसरों के लिए हानिकारक होगा। सुप्रीम कोर्ट में 2017 के उन नियमों को चुनौती दी गई थी, जो लिंग परिवर्तन वाले व्यक्ति, पुरुष जो पुरुषों के साथ यौन संबंध रखते हैं और महिला वेश्याओं को रक्तदाता बनने से रोकते हैं। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील जया कोठारी ने कहा कि ये भेदभावपूर्ण नियम लिंग परिवर्तन वाले व्यक्ति के रक्तदान पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा देते हैं।
मुख्य न्यायाधीश ने पूछा, हमें ऐसा निर्देश क्यों देना चाहिए, कोई एक अच्छा कारण बताइए। पीठ ने कहा कि लाखों गरीब लोग रक्त बैंक की सुविधा का उपयोग करते हैं और वे निजी अस्पतालों का खर्च नहीं उठा सकते। सीजेआई ने पूछा, अगर संक्रमण का केवल एक प्रतिशत भी खतरा हो, तो उन्हें क्यों प्रभावित होना चाहिए? याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि किसी भी व्यक्ति से रक्त लेने पर उसका परीक्षण किया जाता है, जिसमें एचआईवी परीक्षण भी शामिल है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि रक्तदान और स्वीकार करना दोनों ही स्वैच्छिक हैं।
40 साल पुराना एमसी मेहता केस बंद, शीर्ष कोर्ट में वायु प्रदूषण पर नए सिरे से सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण से जुड़े 40 वर्ष पुराने जनहित याचिका मामले एमसी मेहता बनाम भारत सरकार को औपचारिक तौर पर बंद कर दिया। इसके स्थान पर अदालत ने वायु प्रदूषण से जुड़े मुद्दों की सुनवाई के लिए नया स्वतःसंज्ञान मामला दर्ज करने का निर्देश दिया है। इसका शीर्षक एनसीआर वायु प्रदूषण का मुद्दा होगा। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने यह आदेश वरिष्ठ अधिवक्ता एवं न्याय मित्र अपराजिता सिंह व एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी सहित अन्य पक्षों की दलीलें सुनने के बाद दिया। 1985 में जनहित याचिका पर्यावरण कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता एमसी मेहता की ओर से दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के मुद्दे को उठाने के लिए दायर की गई थी। प्रारंभिक शिकायत का समाधान होने के बावजूद अदालत ने मामले को लंबित रखा और समय-समय पर प्रदूषण से जुड़े नए मुद्दों पर सुनवाई के लिए इसमें अंतरिम आवेदन दाखिल किए जाते रहे।
अंतरिम आवेदन अलग-अलग रिट याचिका के रूप में होंगे दर्ज
शीर्ष कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि लंबित सभी अंतरिम आवेदनों को अलग-अलग रिट याचिकाओं के रूप में पंजीकृत कर उन्हें अलग-अलग श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि वाहनों से होने वाला प्रदूषण, वायु गुणवत्ता प्रबंधन, बिजली संयंत्र, औद्योगिक प्रदूषण और कचरा प्रबंधन जैसे मुद्दों को अलग-अलग श्रेणियों में रखकर सुना जाएगा। दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान की सरकारों को निर्देश दिया गया कि वे समय रहते अपने अनुपालन रिपोर्ट और हलफनामे दाखिल करें, ताकि मामलों की प्रभावी सुनवाई हो सके।
गलत संदेश देता है 1985 का केस अब तक लंबित दिखना
सीजेआई सूर्यकांत ने हाल ही में सुनवाई के दौरान कहा, 1985 का मामला अब तक लंबित दिखना गलत संदेश देता है, क्योंकि वर्तमान में जिन समस्याओं पर अदालत विचार कर रही है वे बाद के वर्षों में उत्पन्न हुई हैं। इसलिए मामले को औपचारिक रूप से समाप्त कर नई कार्यवाही शुरू करने का सुझाव दिया गया, जिस पर सभी पक्ष सहमत हो गए। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अब इस मामले में कोई नया अंतरिम आवेदन या विविध याचिका स्वीकार नहीं की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण से जुड़े 40 वर्ष पुराने जनहित याचिका मामले एमसी मेहता बनाम भारत सरकार को औपचारिक तौर पर बंद कर दिया। इसके स्थान पर अदालत ने वायु प्रदूषण से जुड़े मुद्दों की सुनवाई के लिए नया स्वतःसंज्ञान मामला दर्ज करने का निर्देश दिया है। इसका शीर्षक एनसीआर वायु प्रदूषण का मुद्दा होगा। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने यह आदेश वरिष्ठ अधिवक्ता एवं न्याय मित्र अपराजिता सिंह व एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी सहित अन्य पक्षों की दलीलें सुनने के बाद दिया। 1985 में जनहित याचिका पर्यावरण कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता एमसी मेहता की ओर से दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के मुद्दे को उठाने के लिए दायर की गई थी। प्रारंभिक शिकायत का समाधान होने के बावजूद अदालत ने मामले को लंबित रखा और समय-समय पर प्रदूषण से जुड़े नए मुद्दों पर सुनवाई के लिए इसमें अंतरिम आवेदन दाखिल किए जाते रहे।
अंतरिम आवेदन अलग-अलग रिट याचिका के रूप में होंगे दर्ज
शीर्ष कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि लंबित सभी अंतरिम आवेदनों को अलग-अलग रिट याचिकाओं के रूप में पंजीकृत कर उन्हें अलग-अलग श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि वाहनों से होने वाला प्रदूषण, वायु गुणवत्ता प्रबंधन, बिजली संयंत्र, औद्योगिक प्रदूषण और कचरा प्रबंधन जैसे मुद्दों को अलग-अलग श्रेणियों में रखकर सुना जाएगा। दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान की सरकारों को निर्देश दिया गया कि वे समय रहते अपने अनुपालन रिपोर्ट और हलफनामे दाखिल करें, ताकि मामलों की प्रभावी सुनवाई हो सके।
गलत संदेश देता है 1985 का केस अब तक लंबित दिखना
सीजेआई सूर्यकांत ने हाल ही में सुनवाई के दौरान कहा, 1985 का मामला अब तक लंबित दिखना गलत संदेश देता है, क्योंकि वर्तमान में जिन समस्याओं पर अदालत विचार कर रही है वे बाद के वर्षों में उत्पन्न हुई हैं। इसलिए मामले को औपचारिक रूप से समाप्त कर नई कार्यवाही शुरू करने का सुझाव दिया गया, जिस पर सभी पक्ष सहमत हो गए। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अब इस मामले में कोई नया अंतरिम आवेदन या विविध याचिका स्वीकार नहीं की जाएगी।
पूर्व सीजेआई को बचाने के लिए एक करोड़ रुपये का शुल्क मांगने संबंधी वकील की याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सीजेआई को ‘बचाने’ के लिए एक करोड़ रुपये का शुल्क मांगने संबंधी एक वकील की याचिका गुरुवार को खारिज कर दी। वकील ने याचिका में केंद्र को यह निर्देश देने की मांग की थी कि उसे 2018 में तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा को ‘बचाने’ के लिए दायर छह मामलों के लिए शुल्क और खर्च के रूप में एक करोड़ रुपये का भुगतान किया जाए। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने कहा, लखनऊ में वकालत कर रहे अशोक पांडेय की याचिका पूरी तरह से गलत धारणा पर आधारित है। अशोक पांडेय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के आदेश को चुनौती दी है। हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। याचिकाकर्ता ने कहा कि उन मामलों में मुकदमेबाजी के लिए उसे 2 लाख रुपये का खर्च आया था और उसने इसके लिए अपनी बेटी से पैसे लिए थे। सुनवाई के दौरान सीजेआई ने याचिकाकर्ता से पूछा, जजों के खिलाफ तरह-तरह के आरोप लगाने के बाद अब आप उनके लिए ‘माननीय’ शब्द का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं? याचिकाकर्ता ने जनवरी 2018 में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चार वरिष्ठतम जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस का हवाला दिया। उन्होंने कहा, जज सीजेआई के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं कर सकते और यह नियमों के खिलाफ था।
सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सीजेआई को ‘बचाने’ के लिए एक करोड़ रुपये का शुल्क मांगने संबंधी एक वकील की याचिका गुरुवार को खारिज कर दी। वकील ने याचिका में केंद्र को यह निर्देश देने की मांग की थी कि उसे 2018 में तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा को ‘बचाने’ के लिए दायर छह मामलों के लिए शुल्क और खर्च के रूप में एक करोड़ रुपये का भुगतान किया जाए। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने कहा, लखनऊ में वकालत कर रहे अशोक पांडेय की याचिका पूरी तरह से गलत धारणा पर आधारित है। अशोक पांडेय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के आदेश को चुनौती दी है। हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। याचिकाकर्ता ने कहा कि उन मामलों में मुकदमेबाजी के लिए उसे 2 लाख रुपये का खर्च आया था और उसने इसके लिए अपनी बेटी से पैसे लिए थे। सुनवाई के दौरान सीजेआई ने याचिकाकर्ता से पूछा, जजों के खिलाफ तरह-तरह के आरोप लगाने के बाद अब आप उनके लिए ‘माननीय’ शब्द का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं? याचिकाकर्ता ने जनवरी 2018 में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चार वरिष्ठतम जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस का हवाला दिया। उन्होंने कहा, जज सीजेआई के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं कर सकते और यह नियमों के खिलाफ था।
बीफ खाने व व्हाट्सएप संदेश पर एफआईआर, सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश पुलिस को दिया नोटिस
सुप्रीम कोर्ट उस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हो गया, जिसमें एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई है। उस पर आरोप है कि उसने व्हाट्सएप पर यह संदेश साझा किया था कि एक अच्छा हिंदू होने के लिए गोमांस खाना जरूरी है। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने बुद्ध प्रकाश बौद्ध की याचिका पर मध्य प्रदेश पुलिस और अन्य को नोटिस जारी किया है। बौद्ध ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसने उनके खिलाफ एफआईआर रद्द करने की उनकी याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि एफआईआर में लगाए गए आरोपों से पहली नजर में लगाए गए अपराधों के तत्व पता चलते हैं। हाईकोर्ट ने कहा था कि मौजूदा मामले में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने या मनमुटाव को बढ़ावा देने वाली सामग्री के प्रकाशन या प्रसार के आरोप शामिल हैं। एफआईआर में लगाए गए आरोपों को अगर सच माना जाए तो पहली नजर में अपराध के तत्व साफ नजर आते हैं।
सुप्रीम कोर्ट उस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हो गया, जिसमें एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई है। उस पर आरोप है कि उसने व्हाट्सएप पर यह संदेश साझा किया था कि एक अच्छा हिंदू होने के लिए गोमांस खाना जरूरी है। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने बुद्ध प्रकाश बौद्ध की याचिका पर मध्य प्रदेश पुलिस और अन्य को नोटिस जारी किया है। बौद्ध ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसने उनके खिलाफ एफआईआर रद्द करने की उनकी याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि एफआईआर में लगाए गए आरोपों से पहली नजर में लगाए गए अपराधों के तत्व पता चलते हैं। हाईकोर्ट ने कहा था कि मौजूदा मामले में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने या मनमुटाव को बढ़ावा देने वाली सामग्री के प्रकाशन या प्रसार के आरोप शामिल हैं। एफआईआर में लगाए गए आरोपों को अगर सच माना जाए तो पहली नजर में अपराध के तत्व साफ नजर आते हैं।
नेताजी की जब मृत्यु की पुष्टि नहीं तो अस्थियों का क्या सबूत : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के रिश्ते के एक पोते की उस याचिका पर सुनवाई से इन्कार कर दिया, जिसमें टोक्यो के रेंकोजी मंदिर से बोस की अस्थियों को भारत वापस लाने का निर्देश देने की मांग की गई थी। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता आशीष राय के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, मैं परिवार के उन सदस्यों की ओर से पेश हो रहा हूं जो अस्थियों को सम्मानजनक ढंग से प्रवाह करना चाहते हैं। इस पर सीजेआई ने पूछा कि यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कितनी बार आएगा। पिछले साल ही सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका खारिज कर दी थी। इस पर सिंघवी ने कहा कि यह वह मुद्दा नहीं है जो पहले अदालत के समक्ष आया था। शीर्ष अदालत ने पहले जिस मामले पर विचार किया था, वह बोस की मृत्यु हुई है या नहीं, इस बारे में था। इस पर पीठ ने कहा, जब तक उनकी मृत्यु की पुष्टि नहीं हो जाती, तब तक अस्थियां नहीं हो सकतीं। सीजेआई ने कहा, सबसे पहले, अस्थियां कहां हैं? इसका क्या सबूत है? बोस हमारे राष्ट्र के महानतम नेताओं में से एक थे, और हम सभी उनके बलिदान को नमन करते हैं। सिंघवी ने कहा कि यह दर्ज है कि भारत के प्रत्येक राष्ट्राध्यक्ष ने जापान के रेनकोजी मंदिर में मत्था टेका है।
बेटी चाहती है अस्थियां देश में आएं, तो उन्हें आगे आना होगा : सीजेआई
पीठ ने कहा, सबसे पहले, हम यह जानना चाहेंगे कि कितने परिवार के सदस्य इसका समर्थन कर रहे हैं। सिंघवी ने कहा कि बोस की एकमात्र उत्तराधिकारी उनकी 84 वर्षीय बेटी हैं, और याचिकाकर्ता उनके पोते हैं। पीठ ने कहा, वह (बेटी) हमारे समक्ष उपस्थित नहीं हैं। यदि उत्तराधिकारी अस्थियों को देश में लाना चाहती हैं, तो उन्हें अदालत के समक्ष उपस्थित होना होगा। n सिंघवी ने कहा कि बेटी ऑनलाइन अदालत में उपस्थित हैं। इस पर पीठ ने कहा, हम उनकी भावनाओं का सम्मान करते हैं, और हम यह सुनिश्चित करेंगे कि उनकी भावनाओं को कानूनी कार्रवाई में बदला जाए। लेकिन उन्हें आगे आना होगा। पीठ ने जब याचिका पर विचार करने की अनिच्छा व्यक्त की तो सिंघवी ने इसे वापस लेने की अनुमति मांगी।
सुप्रीम कोर्ट ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के रिश्ते के एक पोते की उस याचिका पर सुनवाई से इन्कार कर दिया, जिसमें टोक्यो के रेंकोजी मंदिर से बोस की अस्थियों को भारत वापस लाने का निर्देश देने की मांग की गई थी। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता आशीष राय के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, मैं परिवार के उन सदस्यों की ओर से पेश हो रहा हूं जो अस्थियों को सम्मानजनक ढंग से प्रवाह करना चाहते हैं। इस पर सीजेआई ने पूछा कि यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कितनी बार आएगा। पिछले साल ही सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका खारिज कर दी थी। इस पर सिंघवी ने कहा कि यह वह मुद्दा नहीं है जो पहले अदालत के समक्ष आया था। शीर्ष अदालत ने पहले जिस मामले पर विचार किया था, वह बोस की मृत्यु हुई है या नहीं, इस बारे में था। इस पर पीठ ने कहा, जब तक उनकी मृत्यु की पुष्टि नहीं हो जाती, तब तक अस्थियां नहीं हो सकतीं। सीजेआई ने कहा, सबसे पहले, अस्थियां कहां हैं? इसका क्या सबूत है? बोस हमारे राष्ट्र के महानतम नेताओं में से एक थे, और हम सभी उनके बलिदान को नमन करते हैं। सिंघवी ने कहा कि यह दर्ज है कि भारत के प्रत्येक राष्ट्राध्यक्ष ने जापान के रेनकोजी मंदिर में मत्था टेका है।
बेटी चाहती है अस्थियां देश में आएं, तो उन्हें आगे आना होगा : सीजेआई
पीठ ने कहा, सबसे पहले, हम यह जानना चाहेंगे कि कितने परिवार के सदस्य इसका समर्थन कर रहे हैं। सिंघवी ने कहा कि बोस की एकमात्र उत्तराधिकारी उनकी 84 वर्षीय बेटी हैं, और याचिकाकर्ता उनके पोते हैं। पीठ ने कहा, वह (बेटी) हमारे समक्ष उपस्थित नहीं हैं। यदि उत्तराधिकारी अस्थियों को देश में लाना चाहती हैं, तो उन्हें अदालत के समक्ष उपस्थित होना होगा। n सिंघवी ने कहा कि बेटी ऑनलाइन अदालत में उपस्थित हैं। इस पर पीठ ने कहा, हम उनकी भावनाओं का सम्मान करते हैं, और हम यह सुनिश्चित करेंगे कि उनकी भावनाओं को कानूनी कार्रवाई में बदला जाए। लेकिन उन्हें आगे आना होगा। पीठ ने जब याचिका पर विचार करने की अनिच्छा व्यक्त की तो सिंघवी ने इसे वापस लेने की अनुमति मांगी।
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