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अंधविश्वास पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: कहा-डायन बताकर हत्या जैसी कुप्रथाएं रहीं तो नहीं टिकेगा लोकतंत्र; सजा बरकरार
Thu, 13 Aug 2026 08:34 PM IST
राकेश कुमार
पीटीआई, नई दिल्ली।
पीटीआई, नई दिल्ली।
Published by: राकेश कुमार
Updated Thu, 13 Aug 2026 08:34 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने डायन बताकर महिला की हत्या के एक मामले में बालकू ओराम की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी। शीर्ष अदालत ने कहा कि अंधविश्वास के आगे कानून और सांविधानिक मूल्यों को कमजोर नहीं पड़ने दिया जा सकता। क्या है पूरा मामला और सर्वोच्च अदालत ने क्या-क्या कहा? जानिए...
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने डायन बताकर महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा पर चिंता जताई है। शीर्ष अदालत ने कहा कि अगर डायन बताने जैसी कुप्रथाएं कानून के शासन और सांविधानिक नैतिकता के सिद्धांतों से बचती रहेंगी, तो लोकतंत्र कायम नहीं रह सकता।
क्या है पूरा मामला?
शीर्ष अदालत ने ओडिशा के 1998 के एक मामले में एक व्यक्ति की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा बरकरार रखी। आरोपी बालकू ओराम ने एक अन्य आरोपी के साथ मिलकर एक महिला को उसके घर से घसीटकर बाहर निकाला था। महिला पर डायन होने का आरोप लगाया गया था। इसके बाद उसके साथ मारपीट की गई। इस हमले में महिला की मौत हो गई थी।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि इस मामले के तथ्य ने अदालत की अंतरात्मा को झकझोर दिया। महिला की बेटी ने अपनी मां की बेहद बेरहमी से हत्या होते हुए अपनी आंखों से देखा था।
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डायन बताकर महिलाओं को बनाया जा रहा आसान निशाना?
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एनवी अंजेरिया की पीठ ने कहा कि भारतीय संविधान ऐसे समाज की कल्पना करता है, जो समानता, भाईचारे और वैज्ञानिक सोच पर आधारित हो। महिलाओं के लिए अपमानजनक किसी भी प्रथा को खत्म किया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि इसके बावजूद समाज के कुछ हिस्सों में डायन बताकर महिलाओं को निशाना बनाने की प्रथा अब भी जारी है।
पीठ ने यह भी कहा कि डायन बताकर की जाने वाली हिंसा सिर्फ हत्या तक सीमित नहीं है। इसमें महिलाओं को प्रताड़ित करना, पीटना, यौन हिंसा करना और समाज से अलग कर देना भी शामिल है।
सुप्रीम कोर्ट की पांच बड़ी बातें
अभियोजन के अनुसार, फरवरी 1998 में सुंदरगढ़ जिले के एक गांव में एक लड़की की मौत हुई थी। उसके परिवार के एक सदस्य ने आरोप लगाया कि लड़की की मौत महिला की ओर से की गई डायन प्रथा के कारण हुई। इसके बाद बालकू ओराम और एक अन्य आरोपी महिला को उसके घर से घसीटकर बाहर ले गए। दोनों ने उसके साथ मारपीट की। इस हमले में महिला की मौत हो गई। घटना महिला की बेटी ने देखी थी।
बेटी की शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज की गई। निचली अदालत ने बालकू ओराम और दूसरे आरोपी को हत्या सहित कई अपराधों में दोषी ठहराया। दोनों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई। ओडिशा हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद बालकू ओराम ने सितंबर 2022 के हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने उसकी अपील खारिज कर दी और उम्रकैद की सजा बरकरार रखी।
यह भी पढ़ें: शिवसेना विवाद: सुप्रीम कोर्ट में सिब्बल बोले- दलबदल के पाप को बढ़ावा नहीं दे सकते; 18 अगस्त को फिर सुनवाई
क्या सिर्फ बेटी की गवाही से दोष साबित हो सकता है?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी मामले में एक ही प्रत्यक्षदर्शी है, तब भी उसकी गवाही के आधार पर दोषी ठहराया जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि गवाही भरोसेमंद हो। शीर्ष अदालत ने साफ-साफ कहा कि गवाहों की संख्या नहीं, उनकी गवाही की गुणवत्ता महत्वपूर्ण होती है।
पीठ ने यह भी कहा कि महिला की बेटी ने हमले के तरीके और इस्तेमाल किए गए हथियारों के बारे में जो बताया, वह लगातार एक जैसा रहा। उसकी गवाही भरोसेमंद थी और आरोपी को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त थी। अदालत ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति का करीबी रिश्तेदार होना उसे अपने आप ‘हितबद्ध गवाह’ नहीं बना देता। करीबी रिश्तेदार किसी घटना का स्वाभाविक गवाह भी हो सकता है।
अंधविश्वास के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का क्या संदेश?
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि डायन बताकर महिलाओं के खिलाफ हिंसा के पीछे पूर्वाग्रह, अंधविश्वास और अतार्किक डर काम करता है। कई बार किसी महिला को ऐसे काम के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है, जो उसने किया ही नहीं। वह भीड़ की दुश्मनी का शिकार बन जाती है। अदालत ने डॉ. बीआर आंबेडकर के विचार का भी उल्लेख किया। पीठ ने कहा कि न्यायपूर्ण समाज वही है, जहां सम्मान और तिरस्कार का अंतर खत्म होकर करुणा पर आधारित समाज बने।
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क्या है पूरा मामला?
शीर्ष अदालत ने ओडिशा के 1998 के एक मामले में एक व्यक्ति की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा बरकरार रखी। आरोपी बालकू ओराम ने एक अन्य आरोपी के साथ मिलकर एक महिला को उसके घर से घसीटकर बाहर निकाला था। महिला पर डायन होने का आरोप लगाया गया था। इसके बाद उसके साथ मारपीट की गई। इस हमले में महिला की मौत हो गई थी।
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सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि इस मामले के तथ्य ने अदालत की अंतरात्मा को झकझोर दिया। महिला की बेटी ने अपनी मां की बेहद बेरहमी से हत्या होते हुए अपनी आंखों से देखा था।
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डायन बताकर महिलाओं को बनाया जा रहा आसान निशाना?
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एनवी अंजेरिया की पीठ ने कहा कि भारतीय संविधान ऐसे समाज की कल्पना करता है, जो समानता, भाईचारे और वैज्ञानिक सोच पर आधारित हो। महिलाओं के लिए अपमानजनक किसी भी प्रथा को खत्म किया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि इसके बावजूद समाज के कुछ हिस्सों में डायन बताकर महिलाओं को निशाना बनाने की प्रथा अब भी जारी है।
पीठ ने यह भी कहा कि डायन बताकर की जाने वाली हिंसा सिर्फ हत्या तक सीमित नहीं है। इसमें महिलाओं को प्रताड़ित करना, पीटना, यौन हिंसा करना और समाज से अलग कर देना भी शामिल है।
सुप्रीम कोर्ट की पांच बड़ी बातें
- ऐसी कुप्रथाएं कानून के शासन से बचती रहेंगी तो संवैधानिक लोकतंत्र टिक नहीं सकता।
- अंधविश्वास और डर के कारण कमजोर महिलाओं को सामूहिक विरोध और हिंसा का सामना करना पड़ता है।
- सामूहिक तर्कहीनता के खिलाफ तर्क ही सबसे मजबूत बचाव है।
- अंधविश्वास और अतार्किक सोच पर न्याय की जीत होनी चाहिए।
- किसी मामले में गवाहों की संख्या नहीं, बल्कि उनकी गवाही कितनी भरोसेमंद है, यह महत्वपूर्ण है।
अभियोजन के अनुसार, फरवरी 1998 में सुंदरगढ़ जिले के एक गांव में एक लड़की की मौत हुई थी। उसके परिवार के एक सदस्य ने आरोप लगाया कि लड़की की मौत महिला की ओर से की गई डायन प्रथा के कारण हुई। इसके बाद बालकू ओराम और एक अन्य आरोपी महिला को उसके घर से घसीटकर बाहर ले गए। दोनों ने उसके साथ मारपीट की। इस हमले में महिला की मौत हो गई। घटना महिला की बेटी ने देखी थी।
बेटी की शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज की गई। निचली अदालत ने बालकू ओराम और दूसरे आरोपी को हत्या सहित कई अपराधों में दोषी ठहराया। दोनों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई। ओडिशा हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद बालकू ओराम ने सितंबर 2022 के हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने उसकी अपील खारिज कर दी और उम्रकैद की सजा बरकरार रखी।
यह भी पढ़ें: शिवसेना विवाद: सुप्रीम कोर्ट में सिब्बल बोले- दलबदल के पाप को बढ़ावा नहीं दे सकते; 18 अगस्त को फिर सुनवाई
क्या सिर्फ बेटी की गवाही से दोष साबित हो सकता है?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी मामले में एक ही प्रत्यक्षदर्शी है, तब भी उसकी गवाही के आधार पर दोषी ठहराया जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि गवाही भरोसेमंद हो। शीर्ष अदालत ने साफ-साफ कहा कि गवाहों की संख्या नहीं, उनकी गवाही की गुणवत्ता महत्वपूर्ण होती है।
पीठ ने यह भी कहा कि महिला की बेटी ने हमले के तरीके और इस्तेमाल किए गए हथियारों के बारे में जो बताया, वह लगातार एक जैसा रहा। उसकी गवाही भरोसेमंद थी और आरोपी को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त थी। अदालत ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति का करीबी रिश्तेदार होना उसे अपने आप ‘हितबद्ध गवाह’ नहीं बना देता। करीबी रिश्तेदार किसी घटना का स्वाभाविक गवाह भी हो सकता है।
अंधविश्वास के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का क्या संदेश?
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि डायन बताकर महिलाओं के खिलाफ हिंसा के पीछे पूर्वाग्रह, अंधविश्वास और अतार्किक डर काम करता है। कई बार किसी महिला को ऐसे काम के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है, जो उसने किया ही नहीं। वह भीड़ की दुश्मनी का शिकार बन जाती है। अदालत ने डॉ. बीआर आंबेडकर के विचार का भी उल्लेख किया। पीठ ने कहा कि न्यायपूर्ण समाज वही है, जहां सम्मान और तिरस्कार का अंतर खत्म होकर करुणा पर आधारित समाज बने।