Supreme Court: 120 साल पुराने मंदिर विवाद में सुलह की पहल, जानें अदालत ने एसके कौल को क्यों बनाया मध्यस्थ?
सुप्रीम कोर्ट ने कांचीपुरम के श्री देवराजस्वामी मंदिर में पूजा-पद्धति को लेकर 120 साल पुराने विवाद के समाधान के लिए पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल को मध्यस्थ नियुक्त किया है। थेंगलाई और वडकलई संप्रदायों के बीच चल रहे इस मामले में अदालत ने सुलह का रास्ता चुना है। आइए अब इस पूरे मामले को विस्तार से जानते है।
विस्तार
तमिलनाडु के कांचीपुरम स्थित ऐतिहासिक श्री देवराजस्वामी मंदिर में पूजा-पद्धति को लेकर चल रहे 120 साल पुराने विवाद में अब सुलह की उम्मीद जगी है। सर्वोच्च अदालत ने दोनों पक्षों की सहमति से पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल को मुख्य मध्यस्थ नियुक्त किया है। अदालत का उद्देश्य है कि लंबे समय से चल रहे इस धार्मिक विवाद का सौहार्दपूर्ण समाधान निकले और मंदिर में रोजमर्रा की पूजा शांति से हो सके।
मामला क्या है और अदालत क्यों पहुंचा?
यह विवाद श्रीवैष्णव समुदाय के दो संप्रदायों थेंगलाई और वडकलई के बीच मंदिर के गर्भगृह में मंत्रोच्चार और पूजा-अनुष्ठान को लेकर है। परंपरागत रूप से थेंगलाई संप्रदाय यहां अनुष्ठान करता रहा है। वडकलई पक्ष का कहना है कि उन्हें भी संप्रदाय के रूप में मान्यता होने के बावजूद पूजा में भाग लेने से रोका जा रहा है। मद्रास हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी, जिसके खिलाफ अपील पर शीर्ष अदालत सुनवाई कर रही थी।
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मध्यस्थता का फैसला कैसे हुआ?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की पीठ ने दोनों पक्षों की सहमति दर्ज करते हुए मध्यस्थता का रास्ता चुना। अदालत ने कहा कि पूर्व न्यायाधीश एसके कौल, जो मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश भी रह चुके हैं, इस विवाद को सुलझाने के लिए उपयुक्त हैं। उन्हें तमिल और संस्कृत के जानकार, मंदिर की परंपराओं और इतिहास से परिचित दो अन्य व्यक्तियों को साथ जोड़ने की छूट भी दी गई है। मामले की अगली सुनवाई 13 मार्च तय की गई है।
हाईकोर्ट का फैसला और कानूनी तर्क
- दिसंबर में मद्रास हाईकोर्ट की खंडपीठ ने थेंगलाई समुदाय के अधियापक मिरासी अधिकारों को बरकरार रखा।
- कोर्ट ने माना कि मंदिर में पूजा और मंत्रोच्चार की मौजूदा परंपरा लंबे समय से चली आ रही है।
- हाईकोर्ट ने कहा कि वडकलई समुदाय को अलग मंत्र और प्रबंधम पढ़ने की अनुमति देने से पहले से स्थापित न्यायिक आदेशों का उल्लंघन होगा।
- अदालत के अनुसार, इससे मंदिर परिसर में सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने की आशंका है।
- वडकलई पक्ष ने फैसले को चुनौती देते हुए कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ है।
- उनका तर्क था कि सभी मान्यता प्राप्त धार्मिक संप्रदायों को पूजा में भाग लेने का समान अधिकार होना चाहिए।
- वडकलई पक्ष ने यह भी दलील दी कि 1971 के तमिलनाडु हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती (संशोधन) अधिनियम के बाद वंशानुगत धार्मिक अधिकार कानूनी रूप से समाप्त हो चुके हैं।
परंपरा बनाम समावेशन की बहस
प्रतिवादियों की ओर से कहा गया कि थेंगलाई संप्रदाय द्वारा मंत्रोच्चार की परंपरा 300 वर्षों से अधिक पुरानी है और मंदिर की पहचान से जुड़ी है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत का ध्यान कोविड काल के उस अस्थायी इंतजाम की ओर दिलाया, जब दोनों संप्रदायों को सीमित समय के लिए अपने-अपने मंत्र पढ़ने की अनुमति मिली थी। हालांकि बाद में मंदिर प्रशासन ने इसे बंद कर दिया। वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने ‘भाईचारे’ के संवैधानिक मूल्य को रेखांकित करते हुए सुलह को मुकदमेबाजी से बेहतर बताया।
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मध्यस्थता से यह तय होने की उम्मीद है कि परंपरा और समान अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बने। अदालत ने संकेत दिया है कि यदि सुलह से समाधान निकलता है तो मंदिर की पूजा-पद्धति को लेकर दशकों से चला आ रहा टकराव समाप्त हो सकता है। दोनों पक्षों की सहमति और अदालत की निगरानी में यह प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
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