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West Bengal: चुनावी हार के बाद टीएमसी में बढ़ी बेचैनी, सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने उठाया 'अराजकता' का मुद्दा

पीटीआई, कोलकाता Published by: अमन तिवारी Updated Tue, 26 May 2026 05:21 PM IST
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सार

बंगाल चुनाव में हार के बाद टीएमसी में बगावत तेज है। सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने पार्टी में भ्रष्टाचार और अराजकता पर सवाल उठाए। वहीं, पद से हटाई गईं काकोली घोष दस्तीदार ने नाराजगी जताते हुए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की बैठक में हिस्सा लेकर सबको चौंका दिया है। पढ़ें पूरी खबर...

TMC Political Crisis Internal Rift Sukhendu Sekhar Roy West Bengal Elections election defeat
सुखेंदु शेखर रॉय - फोटो : ANI
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विस्तार

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर हलचल तेज हो गई है। पार्टी के वरिष्ठ राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने अब अपनी ही पार्टी की कार्यप्रणाली और दिशा पर गंभीर सवाल उठाए हैं। सुखेंदु शेखर रॉय से पहले सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने भी सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी जाहिर की थी। इन घटनाओं से संकेत मिल रहे हैं कि चुनावी हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष गहराता जा रहा है।


सुखेंदु शेखर रॉय ने क्या कहा?
सुखेंदु शेखर रॉय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर कुछ ऐतिहासिक संदर्भों का जिक्र करते हुए एक पोस्ट लिखा हैं। उन्होंने लिखा, 44 ईसा पूर्व में, रोमन सम्राट जूलियस सीजर की 'आइडेस ऑफ मार्च' के दिन सीनेट में चाकू मारकर हत्या कर दी गई थी। रोमन कैलेंडर के अनुसार, 'आइडेस' का अर्थ आमतौर पर मार्च, मई, जुलाई और अक्टूबर महीने की 15 तारीख होता था। लेकिन 'आइडेस ऑफ मई' से पहले ही, पश्चिम बंगाल के लोगों ने उस असहनीय अराजक स्थिति का अंत कर दिया। उनकी इस पोस्ट ने राजनीतिक गलियारों में बड़ी चर्चा छेड़ दी है।
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इससे पहले 19 मई को भी उन्होंने 'एक्स' पर लिखा था, लोकतंत्र लोगों की इच्छा पर आधारित होता है। गणराज्य तब पतन की ओर अग्रसर होते हैं, जब अपव्ययी लोग फलते-फूलते हैं और बुद्धिमानों को परिषद से निष्कासित कर दिया जाता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वतंत्र चिंतन और उसका अभ्यास अनिवार्य है। कोई भी इस बात से इनकार नहीं कर सकता; वरना, यह व्यवस्था विनाश की ओर बढ़ जाती है।

पार्टी की मौजूदा स्थिति से चिंतित हैं सुखेंदु
हालांकि रॉय ने सार्वजनिक रूप से इन दोनों में से किसी भी पोस्ट पर विस्तार से कोई टिप्पणी नहीं की है, लेकिन उनके करीबी लोगों का कहना है, वह पार्टी की मौजूदा स्थिति से काफी चिंतित हैं। वह निजी बातचीत में यह सवाल उठा रहे हैं कि जो पार्टी 2024 के लोकसभा चुनाव में 29 सीटें जीतकर मजबूत स्थिति में थी, वह इतने कम समय में इतनी नीचे कैसे गिर गई। उनका मानना है कि पार्टी आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना के दौरान जनता की भावनाओं को समझने में नाकाम रही। उस समय सड़कों पर उतरे लोगों के गुस्से ने जो राजनीतिक संकेत दिए थे, पार्टी उन्हें पकड़ नहीं पाई। इसके अलावा, उन्होंने पार्टी के भीतर भ्रष्टाचार के संस्थागतकरण यानी भ्रष्टाचार के जड़ें जमाने पर भी गहरी चिंता जताई है।

सुखेंदु शेखर रॉय है टीएमसी के दिग्गज नेता
बता दें कि, सुखेंदु शेखर रॉय टीएमसी के कोई साधारण नेता नहीं हैं। वह कांग्रेस की पृष्ठभूमि से आते हैं और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के करीबी रहे हैं। वह संवैधानिक मामलों और संसदीय प्रक्रियाओं के बड़े जानकार माने जाते हैं। यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने पार्टी लाइन से अलग हटकर बात की है। अगस्त 2024 में आरजी कर विरोध प्रदर्शनों के दौरान भी उन्होंने फ्रांसीसी क्रांति का जिक्र करते हुए सरकार की परोक्ष रूप से आलोचना की थी। उन्होंने जांच पर सवाल उठाते हुए धरना भी दिया था।

ये भी पढ़ें: लगातार हार के बाद बदली रणनीति: कांग्रेस अब दलित वोटरों पर करेगी फोकस, राहुल बोले- पुरानी गलतियां करेंगे दूर

पार्टी के भीतर आंतरिक कलह के संकेत
पार्टी में कलह का एक और उदाहरण काकोली घोष दस्तीदार हैं। उन्हें संसदीय दल के मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) के पद से हटाकर उनकी जगह कल्याण बनर्जी को नियुक्त कर दिया गया। इससे नाराज होकर काकोली ने सोशल मीडिया पर लिखा कि 40 साल की वफादारी का उन्हें आज यह इनाम मिला है। इसके बाद उन्होंने बारासात के संगठनात्मक जिला अध्यक्ष पद से भी इस्तीफा दे दिया और हाल ही में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की प्रशासनिक बैठक में शामिल हुईं। इन सभी घटनाओं से साफ है कि हार के बाद टीएमसी के भीतर मतभेद और बेचैनी लगातार बढ़ रही है।
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