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TMC: टीएमसी पर दावा पेश करने के बजाय नई पार्टी में क्यों शामिल हुए बागी सांसद? जानिए इसके पीछे की रणनीति

आईएएनएस, कोलकाता Published by: नितिन गौतम Updated Mon, 15 Jun 2026 01:45 PM IST
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सार

टीएमसी के बागी सांसदों ने रविवार को लोकसभा स्पीकर से मुलाकात की और एनसीपीआई पार्टी में विलय का एलान कर दिया। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि संख्याबल होने के बावजूद बागी सांसदों ने टीएमसी पार्टी पर दावा क्यों पेश नहीं किया? 

TMC rebels mp why joining ncpi instead claim on trinamool congress know why
लोकसभा स्पीकर से मिलते टीएमसी के बागी सांसद - फोटो : पीटीआई
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विस्तार

लोकसभा में बहुमत होने के बावजूद तृणमूल कांग्रेस पर दावा पेश करने के बजाय, बागी सांसदों ने त्रिपुरा स्थित 'नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' (एनसीपीआई) में शामिल होने का फैसला किया है। यह पार्टी राजनीतिक रूप से लगभग निष्क्रिय मानी जाती है। राजनीतिक जानकारों और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि बागी सांसदों की इस रणनीति बदलने के पीछे दो प्रमुख कारण रहे। 


टीएमसी के संविधान के चलते बदलनी पड़ी रणनीति
  • राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, पहला कारण पार्टी के संविधान का स्वरूप है, जिसे पार्टी ने भारत निर्वाचन आयोग को सौंपा था। 
  • तृणमूल कांग्रेस के संविधान के अनुसार, पार्टी के भीतर निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था की पहचान पहले राज्य कार्यकारी समिति (स्टेट एग्जीक्यूटिव कमेटी) के रूप में की गई थी। हालांकि, बाद में संविधान में संशोधन के बाद राष्ट्रीय कार्यसमिति को पार्टी की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था का दर्जा दिया गया। यह समिति काफी हद तक पार्टी अध्यक्ष, विशेष रूप से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, के इर्द-गिर्द केंद्रित मानी जाती है। 
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  • पार्टी के संविधान के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस में संगठनात्मक पदाधिकारियों का प्रभाव चुने हुए जनप्रतिनिधियों, यानी सांसदों और विधायकों, की तुलना में अधिक माना जाता है। कार्यसमिति और संगठन के पदाधिकारी ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के खेमे के माने जाते हैं। इसलिए बागी सांसदों को टीएमसी पर नियंत्रण हासिल करने में मुश्किल होती।
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  • इसी वजह से संभवतः बागी सांसदों की ये कोशिशें नाकाम रहीं, जिनके जरिए वे लोकसभा में तृणमूल की संसदीय पार्टी पर कब्जा करना चाहते थे और बाद में पार्टी के चुनाव चिह्न तथा फंड पर दावा जताना चाहते थे। 
भाजपा पर उठे सवाल
सीपीआई (एम) के राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ अधिवक्ता विकास रंजन भट्टाचार्य का मानना है कि इस पूरी योजना के पीछे भारतीय जनता पार्टी का हाथ है। उनके मुताबिक, नई दिल्ली में वरिष्ठ भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर बागी सांसदों की कई बैठकों से यह संकेत मिलता है। भट्टाचार्य ने कहा, 'भाजपा का मुख्य उद्देश्य संसद में महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए बागी तृणमूल कांग्रेस सांसदों का समर्थन हासिल करना है। इसलिए पार्टी ने कोई जोखिम नहीं उठाया और लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस की संसदीय पार्टी पर कब्जा करने की कोशिश जारी रखने के बजाय, बागी सांसदों को किसी नई पार्टी में शामिल कराने की रणनीति अपनाई।'

विधायकों की तरह बागी सांसदों ने अलग गुट क्यों नहीं बनाया?
सवाल यह है कि जब पश्चिम बंगाल विधानसभा में पार्टी के 80 में से 60 विधायकों के समर्थन से बहुमत वाला नया गुट बनाने की कोशिश सफल रही, तो बागी सांसदों ने लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस की संसदीय पार्टी के भीतर ऐसा ही बहुमत वाला गुट बनाने की कोशिश क्यों नहीं जारी रखी? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा में विधायकों के बागी गुट के बहुमत में आने के बाद ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी ने जो रणनीति अपनाई, उसी के कारण बागी सांसद लोकसभा में वैसी रणनीति नहीं अपना सके।

राजनीतिक जानकारों ने बताया, 'विधायकों का बागी गुट बनने के तुरंत बाद ममता बनर्जी ने पार्टी की सभी पुरानी आंतरिक कमेटियों और तृणमूल कांग्रेस से जुड़े जन-संगठनों की आंतरिक कमेटियों को भंग करने की घोषणा की। इसके बाद उन्होंने उन पार्टी नेताओं के साथ नई आंतरिक कमेटियां बनाने की घोषणा की, जो उनके और उनके भतीजे के प्रति वफादार बने रहे। इस तरह लोकसभा में अपनी संसदीय टीम और पश्चिम बंगाल विधानसभा में अपनी विधायी टीम पर नियंत्रण खोने के बावजूद ममता बनर्जी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति पर अपना नियंत्रण बनाए हुए हैं।'
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