TMC के 20 बागियों पर फैसला कब?: लोकसभा स्पीकर के फैसले में देरी, अब सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में ममता गुट
तृणमूल कांग्रेस 20 बागी लोकसभा सांसदों की अयोग्यता के मामले में जल्द सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकती है। सूत्रों के अनुसार, अगले सात से 10 दिनों में याचिकाएं दाखिल होने की संभावना है। क्या स्पीकर के फैसले में देरी अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचेगी? क्या बागी सांसदों का विलय प्रावधान उन्हें अयोग्यता से बचा पाएगा? आइए, जानते हैं...
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तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) जल्द ही उन 20 बागी लोकसभा सांसदों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकती है, जिन्होंने पार्टी छोड़कर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) के साथ जुड़ने का एलान किया है। सूत्रों के मुताबिक, इन सांसदों की अयोग्यता को लेकर अगले सात से 10 दिनों में याचिकाएं दाखिल की जा सकती हैं। यह कदम लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से अयोग्यता याचिकाओं पर जल्द फैसला लेने की मांग के बाद सामने आया है।
क्या स्पीकर के फैसले में देरी के बाद सुप्रीम कोर्ट जाएगी TMC?
टीएमसी के लोकसभा नेता अभिषेक बनर्जी ने बुधवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर 20 सांसदों के खिलाफ दाखिल अलग-अलग अयोग्यता याचिकाओं पर जल्द फैसला लेने की मांग की थी। उन्होंने कहा था कि अगर स्पीकर कानून और न्यायिक निर्देशों में निर्धारित समय के भीतर फैसला नहीं लेते हैं, तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट का रुख कर हस्तक्षेप की मांग करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
कब से चल रहा है 20 सांसदों की अयोग्यता का मामला?
टीएमसी ने जून में पहली बार यह मामला लोकसभा अध्यक्ष के सामने उठाया था और 20 सांसदों को अयोग्य ठहराने की मांग करते हुए अलग-अलग याचिकाएं दाखिल की थीं। इसके बाद 20 जुलाई से शुरू हुए मानसून सत्र के दौरान भी अभिषेक बनर्जी ने यह मुद्दा स्पीकर के सामने उठाया और उन्हें एक पत्र सौंपने को कहा गया। यह पत्र 26 जुलाई तक जमा कर दिया गया था। इसके बाद अभिषेक बनर्जी के साथ टीएमसी के वरिष्ठ सांसद सौगत रॉय, कीर्ति आजाद और प्रतिमा मंडल ने भी स्पीकर से इस मामले में आगे की कार्रवाई को लेकर संपर्क किया। हालांकि, गुरुवार को मानसून सत्र समाप्त होने तक इस पर कोई फैसला नहीं हुआ।
क्यों बागी हुए TMC के 20 सांसद?
20 सांसद पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी की हार के बाद पार्टी के खिलाफ हो गए थे। इसके बाद उन्होंने NCPI में विलय का एलान किया और भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को समर्थन देने की बात कही। इस बागी समूह में सुदीप बंद्योपाध्याय, काकोली घोष दस्तीदार, शताब्दी रॉय और मिताली बाग जैसे वरिष्ठ नेता शामिल हैं। इन सभी सांसदों ने मूल रूप से टीएमसी के चुनाव चिह्न पर लोकसभा का चुनाव जीता था।
क्या दो-तिहाई सांसदों का आंकड़ा बागियों को बचा सकता है?
बागी सांसदों ने दलबदल विरोधी कानून के तहत मिलने वाले विलय के प्रावधान का सहारा लिया है। उनका कहना है कि वे लोकसभा में टीएमसी के 28 सांसदों की संख्या के दो-तिहाई से अधिक हैं। संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत किसी राजनीतिक दल के दो-तिहाई सदस्य किसी दूसरे दल में विलय के लिए सहमत होते हैं, तो अयोग्यता से छूट का प्रावधान है। हालांकि, टीएमसी ने इस कदम की वैधता को चुनौती दी है। पार्टी का कहना है कि केवल किसी दूसरे दल में विलय की घोषणा कर सांसद अयोग्यता से बच नहीं सकते। दसवीं अनुसूची की शर्तें पूरी हुई हैं या नहीं, इस पर फैसला लोकसभा अध्यक्ष को करना है।
क्या अयोग्यता पर फैसला करने का अधिकार स्पीकर के पास है?
दसवीं अनुसूची के तहत दलबदल के आधार पर किसी सदस्य की अयोग्यता तय करने का अधिकार लोकसभा अध्यक्ष के पास है। सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि यह स्पष्ट किया है कि इस मामले में स्पीकर न्यायिक या ट्रिब्यूनल जैसी भूमिका निभाते हैं और उनका फैसला न्यायिक समीक्षा के दायरे में आता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि स्पीकर पहली बार में अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला करने वाले उचित संवैधानिक प्राधिकारी हैं, लेकिन उन्हें निष्पक्ष, स्वतंत्र और न्यायसंगत तरीके से कार्रवाई करनी चाहिए।
क्या सुप्रीम कोर्ट ने अयोग्यता याचिकाओं के लिए समयसीमा तय की है?
2023 के महाराष्ट्र राजनीतिक संकट मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि स्पीकर को अयोग्यता याचिकाओं पर उचित समय के भीतर फैसला करना चाहिए और उनका फैसला न्यायिक समीक्षा के अधीन रहेगा। इसके बाद एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पीकर को तीन महीने के भीतर अयोग्यता की कार्यवाही पूरी करने का निर्देश दिया था। ऐसे में मानसून सत्र समाप्त होने तक 20 सांसदों की अयोग्यता याचिकाओं पर कोई फैसला नहीं होने के बाद टीएमसी के सुप्रीम कोर्ट जाने की संभावना बढ़ गई है।