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Explainer: मूल से अलग तृणमूल बनाने की कहानी, जिसे छोड़ ममता ने TMC बनाई, अब उसी में विलय की क्यों मिली नसीहत
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Mon, 08 Jun 2026 03:24 PM IST
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सार
पश्चिम बंगाल में इस साल हुए विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को जबरदस्त हार मिली। इसके बाद से लगातार ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले इस दल से नेताओं के खफा होने और यहां तक अलग होने की खबरें आ रही हैं। हालांकि, अगर इतिहास के कुछ पन्ने पलटे जाएं तो सामने आता है कि एक दौर में खुद टीएमसी का गठन कुछ इसी तरह से हुआ था। वह दौर था 1998 का, जब ममता बनर्जी ने खुद कांग्रेस में विभाजन कर अपना अलग दल टीएमसी बनाया था। यानी करीब 28 साल बाद इतिहास कुछ हद तक खुद को दोहराता दिख रहा है।
ममता बनर्जी का कांग्रेस और टीएमसी का सफर।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पश्चिम बंगाल में 4 मई को आए चुनाव नतीजों के बाद से ही तृणमूल कांग्रेस में उथल-पुथल जारी है। एक के बाद एक कई विधायक या तो बागी हो चुके हैं या पार्टी छोड़ने का मन बना रहे हैं। दूसरी ओर ऐसी ही कुछ स्थिति टीएमसी के केंद्रीय काडर में भी देखी जा रही है, जहां सांसदों के बीच मुश्किल समय में पार्टी के साथ खड़े रहने और दल को छोड़ने को लेकर ऊहापोह की स्थिति है। टीएमसी की इस कमजोरी का असर अब विपक्ष पर भी पड़ता दिख रहा है। इस बीच शिवसेना (यूबीटी) के नेता संजय राउत ने कहा है कि अगर विपक्षी दलों को आपस में एकता बनाए रखनी है तो कांग्रेस से टूटकर अलग हुए सभी दलों को वापस उसमें मिल जाना चाहिए। राउत ने इस दौरान खास तौर पर टीएमसी और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा-एसपी) का नाम भी लिया। इसके अलावा खुद कांग्रेस ने भी ममता को अपने मूल में लौटने की सलाह दी है।
आज से करीब 28 साल पहले ममता बनर्जी कांग्रेस की कद्दावर नेता हुआ करती थीं। पार्टी में उनकी हनक का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1984 में कांग्रेस के टिकट पर जब उन्होंने चुनाव जीता तो वह उस वक्त की सबसे युवा सांसद थीं। इतना ही नहीं अगले कुछ वर्षों में उन्हें मंत्री पद तक सौंपे गए। ममता ने आगे चलकर कांग्रेस से अलग बंगाल पर केंद्रित राजनीति करने का फैसला किया और अपनी मूल पार्टी कांग्रेस छोड़कर 1 जनवरी 1998 को अलग तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) बनाई। अब ममता को कमजोर हो चुकी पार्टी को वापस कांग्रेस के साथ मिलने की सलाह मिल रही है।
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आज से करीब 28 साल पहले ममता बनर्जी कांग्रेस की कद्दावर नेता हुआ करती थीं। पार्टी में उनकी हनक का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1984 में कांग्रेस के टिकट पर जब उन्होंने चुनाव जीता तो वह उस वक्त की सबसे युवा सांसद थीं। इतना ही नहीं अगले कुछ वर्षों में उन्हें मंत्री पद तक सौंपे गए। ममता ने आगे चलकर कांग्रेस से अलग बंगाल पर केंद्रित राजनीति करने का फैसला किया और अपनी मूल पार्टी कांग्रेस छोड़कर 1 जनवरी 1998 को अलग तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) बनाई। अब ममता को कमजोर हो चुकी पार्टी को वापस कांग्रेस के साथ मिलने की सलाह मिल रही है।
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ऐसे में यह जानना अहम है कि तृणमूल कांग्रेस के गठन से पहले ममता बनर्जी का कांग्रेस में कैसा इतिहास रहा था? आखिर क्यों ममता ने कांग्रेस से बगावत कर पश्चिम बंगाल के लिए अपनी अलग तृणमूल कांग्रेस बनाने का फैसला लिया? टीएमसी के गठन के बावजूद ममता को बंगाल में सत्ता हासिल करने में 2011 तक का समय कैसे लगा? बंगाल में शासन का ममता और उनकी पार्टी का क्या इतिहास रहा? आखिर अब ऐसा क्या हुआ है, जो ममता बनर्जी की पार्टी को दूसरे विपक्षी दलों से कांग्रेस में विलय की सलाह मिलने लगी है? आइये जानते हैं...
ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर की शुरुआत कांग्रेस से ही हुई। उनकी पहली बार पहचान छात्र राजनीति के दौर में ही हो गई थी। इसके बाद उन्होंने 1997 तक कांग्रेस में कई अहम राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय पदों पर काम किया।
ये भी पढ़ें: Mamata Banerjee: ममता को कांग्रेस का ऑफर,अपने पुराने मूल में लौट आइए...रणनीतिक तैयारी तेज
ममता बनर्जी का कांग्रेस में कैसा इतिहास रहा था?
ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर की शुरुआत कांग्रेस से ही हुई। उनकी पहली बार पहचान छात्र राजनीति के दौर में ही हो गई थी। इसके बाद उन्होंने 1997 तक कांग्रेस में कई अहम राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय पदों पर काम किया।
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चुनावी सफलता और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने का दौर
1984 की ऐतिहासिक जीत: तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी राजनीति में महिलाओं को आगे लाना चाहते थे। सुब्रत मुखर्जी की सिफारिश पर प्रणब मुखर्जी को ममता बनर्जी का नाम भेजा गया था। 1984 के लोकसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने जाधवपुर निर्वाचन क्षेत्र से वाम मोर्चे के दिग्गज नेता और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) उम्मीदवार सोमनाथ चटर्जी को हराकर एक बड़ी जीत दर्ज की। इसके बाद उन्हें युवा कांग्रेस (इंदिरा) का महासचिव बनाया गया। 1987 में वे राष्ट्रीय परिषद की सदस्य और 1988 में कांग्रेस संसदीय दल की कार्यकारी समिति की सदस्य बनीं।बनाई फायरब्रांड नेता की छवि: वे 1991 और 1996 में दक्षिण कोलकाता संसदीय क्षेत्र से फिर से सांसद चुनी गईं। 1991 में भारत सरकार में उन्हें युवा और खेल, महिला और बाल विकास राज्य मंत्री नियुक्त किया गया था। इस दौर में ममता बनर्जी ने अपनी पहचान एक फायरब्रांड नेता की बनाई, जो कि बंगाल में वाम मोर्चे के शासन के खिलाफ खुलकर आवाज उठाती रहीं।
क्यों और कैसे हुई कांग्रेस से मतभेद की शुरुआत?
ममता बनर्जी हमेशा से पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे (माकपा नीत) के खिलाफ अपने कड़े संघर्ष के लिए जानी जाती थीं। 1990 में कथित तौर पर वाम मोर्चे के गुंडों की तरफ से उन्हें बुरी तरह पीटा भी गया था। धीरे-धीरे उन्हें लगने लगा कि कांग्रेस में रहना उनके इस संघर्ष में बाधा बन रहा है। उनका मानना था कि कांग्रेस आलाकमान पश्चिम बंगाल में उनके वाम-विरोधी आंदोलन को जानबूझकर रोकना चाहता है, क्योंकि राष्ट्रीय राजनीति और संसद में कांग्रेस वामपंथियों के समर्थन पर काफी हद तक निर्भर थी। इसलिए कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व बंगाल में माकपा के आक्रामक रूप से विरोध करने का इच्छुक नहीं था।ममता बनर्जी और उनके समर्थकों ने कांग्रेस के कुछ नेताओं पर कटाक्ष करने के लिए तरबूज सिद्धांत (वॉटरमेलन थ्योरी) शब्द का इस्तेमाल किया। उनका आरोप था कि बंगाल के कांग्रेस नेता बाहर से हरे हैं यानी कांग्रेस के रंग में दिखते हैं, लेकिन अंदर से लाल हैं यानी वामपंथियों के प्रति वैचारिक नरमी रखने वाले हैं। ममता बनर्जी का आरोप था कि कांग्रेसी नेता सार्वजनिक रूप से वामपंथियों का विरोध करने का दिखावा करते हैं, लेकिन अंदरखाने वे वामपंथी राजनीति को सत्ता में बनाए रखने में मदद कर रहे हैं।
कब और किस वजह से कांग्रेस से अलग हो गईं ममता?
जमीनी स्तर के लिए तलाशा नया मंच: बताया जाता है कि कांग्रेस नेतृत्व के साथ लगातार बढ़ते मतभेदों के कारण 1997 तक ममता बनर्जी अपनी ही पार्टी के संगठन के अंदर काफी अकेली पड़ गई थीं। सबसे बड़ा मोड़ अगस्त 1997 में तब आया जब तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी के नेतृत्व में कोलकाता के नेताजी इंडोर स्टेडियम में कांग्रेस का एक बड़ा अधिवेशन आयोजित हुआ। इस आधिकारिक अधिवेशन के विरोध में ममता बनर्जी ने स्टेडियम के ठीक बाहर अपनी एक समानांतर जनसभा का आयोजन किया। इस बाहरी रैली में कांग्रेस के आधिकारिक इंडोर कार्यक्रम की तुलना में कहीं ज्यादा भीड़ उमड़ी। पार्टी के बहुत से कार्यकर्ता आधिकारिक कार्यक्रम को छोड़कर ममता बनर्जी की रैली में शामिल हुए, जिससे साबित हुआ कि उनकी लोकप्रियता अब कांग्रेस के संगठन या बैनर की मोहताज नहीं है।...और फिर हुआ कांग्रेस से निष्कासन और नई पार्टी का जन्म: पार्टी नेतृत्व को सीधे तौर पर चुनौती देने के बाद 1997 में ममता बनर्जी को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया। इसके बाद, मुकुल रॉय जैसे नेताओं के साथ मिलकर उन्होंने एक नई शुरुआत की और 1 जनवरी 1998 को उन्होंने आधिकारिक तौर पर अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की स्थापना की। पार्टी का नाम तृणमूल भी इसी सोच के साथ चुना गया था, ताकि वे सीधे तौर पर ग्रासरूट (जमीनी स्तर) के लोगों से जुड़कर काम कर सकें।
क्यों कांग्रेस से अलग होने वाले बाकी दलों की तरह नाकाम नहीं हुई टीएमसी?
भारतीय राजनीति में स्वतंत्रता के बाद से कांग्रेस में कई विभाजन हुए और बंगाल में भी अजय मुखर्जी और प्रणब मुखर्जी जैसे नेताओं ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टियां बनाई थीं। लेकिन ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) इन राजनीतिक प्रयोगों से अलग रही, क्योंकि यह पार्टी कांग्रेस से अलग होने के बाद केवल बची ही नहीं रही, बल्कि इसने सत्ता भी हासिल की और लगातार तीन कार्यकाल तक सत्ता में बनी रही।1998 में अपनी नई पार्टी का नाम तृणमूल (यानी जमीनी स्तर) रखने के पीछे ममता बनर्जी की स्पष्ट सोच थी कि वे आम और ग्रासरूट स्तर के लोगों के लिए काम करना चाहती थीं। बताया जाता है कि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का चुनाव चिह्न घास पर उगे दो पौधे या जोड़ा फूल रखा, जो कि उनकी पार्टी के जमीन से जुड़ाव को दर्शाने वाला बना। इस चुनाव चिह्न का लोगो 1 जनवरी 1998 को पार्टी की स्थापना के दिन खुद ममता बनर्जी ने अपने हाथों से स्केच किया था। ममता को जानने वाले नेता और विश्लेषक बताते हैं कि उनकी सरल और मिलनसार प्रकृति ने उन्हें जनता के बीच अपार लोकप्रियता दिलाई। उन्होंने खुद की छवि एक बेहद जन-जुड़ाव वाली नेता या दीदी के रूप में सावधानीपूर्वक स्थापित की और लगातार सड़क की राजनीति को अपना हथियार बनाया।
1998 में गठित हुए दल को सत्ता में आने में 13 साल क्यों लगे?
कांग्रेस से अलग होने के बाद से बंगाल की सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने का ममता बनर्जी का सफर काफी संघर्षपूर्ण और उतार-चढ़ाव वाला रहा। दरअसल, उन्हें सबसे पहले बंगाल में स्थापित वाम नेतृत्व का सामना करना था, वहीं अपनी पार्टी को एकजुट रखने और नए काडर को बनाने की चुनौती भी उनके सामने रही।
2006-2007: सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन से पार्टी को मिली नई ताकत
- टीएमसी के सत्ता में आने की असल नींव तब पड़ी जब वामपंथी सरकार ने औद्योगिक परियोजनाओं को मंजूरी दी। इनमें सिंगूर में टाटा और नंदीग्राम में सलीम ग्रुप के लिए किसानों की कृषि भूमि का अधिग्रहण शुरू किया।
- ममता बनर्जी ने विस्थापित हो रहे किसानों के समर्थन में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की और जमीन अधिग्रहण के खिलाफ सड़क पर उतरकर उग्र विरोध प्रदर्शन किया।
- 2007 में नंदीग्राम में विरोध कर रहे लोगों पर पुलिस की फायरिंग में 14 लोगों की मौत हो गई। इस घटना ने वामपंथी सरकार के खिलाफ जनता के गुस्से को भड़का दिया।
- इन्हीं आंदोलनों के बीच टीएमसी को अपना सबसे लोकप्रिय नारा मां, माटी, मानुष मिला, जिसने पूरे बंगाल की जनता, खासकर महिलाओं और किसानों को पार्टी से गहराई से जोड़ दिया।
2009-2010: लहर फिर टीएमसी के पक्ष में
- 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस ने फिर कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए के साथ गठबंधन किया और बंगाल में 26 सीटें जीतकर शानदार वापसी की। ममता बनर्जी को एक बार फिर रेल मंत्रालय सौंपा गया।
- 2010 में टीएमसी ने कोलकाता नगर निगम (केएमसी) चुनावों में 141 में से 97 सीटें जीतकर टीएमसी ने स्पष्ट कर दिया कि 2011 के विधानसभा चुनावों के लिए बंगाल में बदलाव की जमीन तैयार हो चुकी है।
2011: गठन के 13 साल बाद टीएमसी को मिली जीत
- आखिरकार 2011 के विधानसभा चुनावों में टीएमसी ने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और वाम दल के 34 वर्ष के शासन का अंत कर दिया।
- इस चुनाव में टीएमसी गठबंधन ने 227 सीटें जीतीं, जिसमें से अकेले टीएमसी को 187 सीटें मिली। यानी टीएमसी अकेले ही पूर्ण बहुमत पर थी।
2011-2026: टीएमसी के बेरोकटोक शासन का दौर
2011 में जब ममता बनर्जी ने वाम मोर्चे को हराया, तो उन्होंने सिर्फ चुनाव ही नहीं जीता, बल्कि उस विशाल संगठन वाले इकोसिस्टम को भी विरासत में हासिल कर लिया जो माकपा को दशकों से सत्ता में बनाए हुए था। वामपंथियों की तरफ से बनाई गईं स्थानीय समितियों, पंचायत नेटवर्क, ट्रेड यूनियन और सहकारी समितियों के इस पूरे ढांचे ने अपनी निष्ठाएं बदल लीं और टीएमसी से जुड़ गए, जिससे जमीनी स्तर पर सत्ता पर टीएमसी की पकड़ वामपंथियों जैसी ही मजबूत हो गई। वहीं, वाम मोर्चे का इस चुनाव के बाद सूपड़ा साफ हो गया और अगले 15 साल (2011 से 2026 तक) ममता बनर्जी ने बेरोकटोक शासन किया। सत्ता संभालते ही उन्होंने सबसे पहला बड़ा फैसला सिंगूर के किसानों को उनकी 400 एकड़ जमीन वापस लौटाने का लिया, जिससे उनकी 'दीदी' वाली जन-नेता की छवि और मजबूत हो गई।
अब जानें- क्यों कांग्रेस के टूट वाले दौर में पहुंची टीएमसी?
बंगाल की राजनीति में एक बार फिर इतिहास खुद को दोहराता हुआ दिख रहा है। 1998 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस नेतृत्व से बगावत करके जिस तरह तृणमूल कांग्रेस बनाई थी, अब ठीक वैसी ही परिस्थितियां खुद टीएमसी के अंदर पैदा हो गई हैं।इसकी प्रमुख वजह मई 2026 के विधानसभा चुनावों में करारी हार रही है, जिसमें टीएमसी बुरी तरह हार मिली और पार्टी महज 80 सीटों पर सिमट गई। इसके बाद से पार्टी 28 साल के अपने इतिहास के सबसे बड़े संकट का सामना कर रही है। निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 80 में से 58 तृणमूल विधायकों ने बागी तेवर अपना लिए हैं।
1. 1998 और 2026 का दौर कैसे एक-जैसा
नेतृत्व के जमीनी स्तर से कटने का आरोप: 1990 के दशक में ममता बनर्जी ने कांग्रेस नेतृत्व पर आरोप लगाया था कि वे जमीनी संघर्ष और कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर रहे हैं। आज टीएमसी का बागी गुट भी यही आरोप लगा रहा है। उनका कहना है कि पार्टी की सत्ता कुछ ही हाथों में, खासकर ममता के भतीजे और पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी के इर्द-गिर्द सिमट गई है और पुराने नेताओं को दरकिनार किया जा रहा है।ताकत का समानांतर प्रदर्शन: 1997 में जब कांग्रेस का आधिकारिक अधिवेशन हो रहा था, तब ममता बनर्जी ने अपनी अलग रैली करके यह साबित किया था कि असल जनसमर्थन उनके पास है। इसी तरह आज बागी गुट ने ममता बनर्जी की ओर से प्रस्तावित नेता- शोभनदेव चट्टोपाध्याय को दरकिनार करते हुए 58 विधायकों का समर्थन जुटाकर ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में विपक्ष का नेता बनवा लिया है।
एक नए राजनीतिक स्पेस की तलाश: जिस तरह कभी ममता बनर्जी ने कांग्रेस से टूटकर वामपंथियों के खिलाफ एक नया विकल्प खड़ा किया था, उसी तरह आज बागी गुट बंगाल में एक ऐसा नया राजनीतिक स्पेस बनाना चाहता है जो न तो मौजूदा टीएमसी का ढांचा हो और न ही भाजपा हो। इस गुट ने खुद की अलग छवि बनाने का एलान किया है।
2. 1998 की कांग्रेस और 2026 की टीएमसी की टूट में अंतर भी
ममता बनर्जी पर सीधा व्यक्तिगत हमला नहीं: 1998 के उलट बागी गुट सीधे तौर पर ममता बनर्जी पर हमला नहीं कर रहा है। बागी नेताओं का कहना है कि वे अभी भी ममता बनर्जी का सम्मान करते हैं और पार्टी बनाने में उनके योगदान को मानते हैं। ऋतब्रत बनर्जी ने तो यहां तक कहा कि वे ममता बनर्जी से इस विपक्षी मोर्चे की मुख्य सलाहकार बनने का अनुरोध करेंगे। उनकी असली लड़ाई अभिषेक बनर्जी और उनके करीबी सलाहकारों के बढ़ते प्रभाव से है।नई पार्टी बनाने के बजाय विरासत की जंग: ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर एक नई पार्टी बनाई थी। लेकिन मौजूदा बागी गुट का इरादा अलग पार्टी बनाने का नहीं है; वे खुद को असली तृणमूल करार दे रहे हैं। उनकी कोशिश पार्टी के संगठन चुनाव चिह्न (जोड़ा फूल) और टीएमसी की पूरी राजनीतिक विरासत पर कब्जा करने की है।