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UAPA: सुप्रीम कोर्ट ने जमानत नियम, जेल अपवाद के तहत दी जमानत, नार्कों आतंक के आरोप में लगी यूएपीए की धारा

न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: Sandhya Kumari Updated Mon, 18 May 2026 12:17 PM IST
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सार

सुप्रीम कोर्ट ने यूएपीए मामलों में भी कहा कि जमानत नियम, जेल अपवाद है। अदालत ने नार्को-आतंक केस में आरोपी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत देते हुए कहा कि धारा 43डी(5) अनिश्चितकालीन कैद का आधार नहीं बन सकती और अनुच्छेद 21 सर्वोपरि है।

UAPA Supreme Court Grants Bail Under Bail is the Rule Jail is the Exception Principle Charges Narco Terrorism
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने आज कहा कि गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के मामलों में भी 'जमानत नियम है और जेल अपवाद'। शीर्ष अदालत ने जम्मू-कश्मीर के एक व्यक्ति को जमानत दे दी, जो  नार्कों आतंक मामले में मुकदमे का सामना कर रहा था। 

आरोपी को मिली जमानत

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने हैंडवाड़ा निवासी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को राहत दी। अदालत ने अंद्राबी को अपना पासपोर्ट जमा करने और हर पंद्रह दिन में स्थानीय पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट करने का निर्देश दिया। अंद्राबी पर सीमा पार से मादक पदार्थों की तस्करी और जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के वित्तपोषण में शामिल होने का आरोप है। 

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राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) 2020 से यूएपीए और भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं के तहत इस मामले की जांच कर रही है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि यूएपीए की धारा 43डी(5) अनिश्चितकालीन कारावास को उचित नहीं ठहरा सकती और इसे अनुच्छेद 21 और 22 के अधीन होना चाहिए।

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संवैधानिक सिद्धांत और नजीब मामला

पीठ ने कहा, जमानत नियम और जेल अपवाद का सिद्धांत अनुच्छेद 21 और 22 से निकलने वाला एक संवैधानिक सिद्धांत है, और निर्दोषता की धारणा कानून के शासन द्वारा शासित किसी भी सभ्य समाज की आधारशिला है।

 शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केए नजीब मामले में उसका फैसला बाध्यकारी है। निचली अदालतें, उच्च न्यायालय या इस अदालत की निचली पीठें इसे कमजोर नहीं कर सकतीं। केए नजीब मामला 2021 में यूएपीए के तहत जमानत से संबंधित सुप्रीम कोर्ट का फैसला है। अंद्राबी ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसने उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। उच्च न्यायालय ने सेलफोन रिकॉर्ड के आधार पर उसकी जमानत खारिज की थी, जिसमें सीमा पार आतंकी गुर्गों से संपर्क का संकेत था।

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