Shivsena: उद्धव गुट को एक दिन में दोहरा झटका, सांसद आष्टीकर और निंबालकर अब शिंदे के साथ; जानें क्या बताई वजह
महाराष्ट्र में जून का महीना उद्धव गुट के लिए कितना नुकसानदायी है, इसका अंदाजा पार्टी में पड़े फूट से सबके सामने आ चुका है। पहली बार साल 2022 का वक्त था और अब इस वर्ष ऐसा ही हाल है। आज ही पार्टी के दो सांसदों ने शिंदे गुट का दामन थाम लिया है। इसमें हिंगोली से सांसद नरेश पाटिल आष्टीकर और ओस्मानाबाद से सांसद ओमप्रकाश राजे निंबालकर शामिल हैं।
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उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना (यूबीटी) को रविवार को दो सांसदों ने बड़ा झटका देते हुए डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना का दामन थाम लिया है। पहले हिंगोली से सांसद नागेश पाटिल आष्टीकर ने एलान किया। पिछले कई दिनों से उनके पार्टी छोड़ने की अटकलें लग रही थीं, जिन पर उन्होंने पहली बार खुलकर प्रतिक्रिया दी। सोशल मीडिया पर जारी एक वीडियो संदेश में उन्होंने कहा कि उन्होंने अपनी विचारधारा से कोई समझौता नहीं किया है। उनका कहना था कि वह 'एक शिवसेना से दूसरी शिवसेना' में गए हैं। उन्होंने दावा किया कि 18 जून तक उन्होंने और कुछ अन्य सांसदों ने कोई फैसला नहीं लिया था, लेकिन उसके बाद उनके खिलाफ की गई कुछ टिप्पणियों ने उन्हें यह कदम उठाने पर मजबूर कर दिया।
वहीं दूसरा नाम ओमप्रकाश राजे निंबालकर का है, उन्होंने भी आज घोषणा की कि वह उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होंगे। धाराशिव पहुंचे निंबालकर ने अपने समर्थकों से मुलाकात के बाद कहा कि स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी की हार और विपक्ष में रहने के कारण जनता के लिए काम नहीं कर पाने की स्थिति ने उन्हें यह फैसला लेने के लिए मजबूर किया। उन्होंने कहा, 'हम चुनाव इसलिए हारे क्योंकि हम सत्ता में नहीं थे। पिछले दो वर्षों में सरकार का हिस्सा नहीं होने के कारण मैं लोगों के लिए ज्यादा काम नहीं कर सका। इन परिस्थितियों को देखते हुए मैंने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने का फैसला किया है'। सांसद ने बताया कि उनकी एकनाथ शिंदे और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से बातचीत हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि दोनों नेताओं ने उनकी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से भी बात कराई थी।
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पार्टी के बागियों पर जमकर बरसे थे संजय राउत
हालांकि उन्होंने सीधे तौर पर किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन माना जा रहा है कि उनका इशारा शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत की ओर था। संजय राउत ने बागी सांसदों के खिलाफ कड़ी भाषा का इस्तेमाल किया था और ‘ऑपरेशन तुड़वा’ की चेतावनी भी दी थी। आष्टीकर ने कहा कि किसी को नाराजगी जाहिर करने का अधिकार है, लेकिन भाषा की मर्यादा बनाए रखनी चाहिए।
आष्टीकर ने धन की कमी को भी बड़ा कारण बताया
सांसद ने पार्टी छोड़ने के पीछे विकास कार्यों के लिए धन की कमी को भी बड़ा कारण बताया। उन्होंने कहा कि विपक्ष में होने के कारण क्षेत्र के विकास कार्य प्रभावित हो रहे थे और कार्यकर्ताओं के काम भी नहीं हो पा रहे थे। उनके अनुसार सांसद निधि (एमपीलैड) के पांच करोड़ रुपये पर्याप्त नहीं हैं और पिछले दो वर्षों में लगातार प्रयासों के बावजूद वह अपने लोकसभा क्षेत्र के लिए अतिरिक्त विकास निधि नहीं ला सके।
'जनता की सेवा के लिए काम करते रहेंगे'
नागेश आष्टीकर ने कहा कि जनता ने उनसे बड़ी उम्मीदों के साथ उन्हें चुना है और उनकी जिम्मेदारी लोगों के काम करवाना है। इसी कारण उन्होंने यह फैसला लिया। उन्होंने भरोसा दिलाया कि वह आगे भी क्षेत्र के विकास और जनता की सेवा के लिए काम करते रहेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी के कुछ नेता उनके फैसले से नाराज हो सकते हैं, लेकिन समय के साथ वे उनकी मजबूरी और स्थिति को समझेंगे। उनके मुताबिक उनके पास यह कदम उठाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था।
निंबालकर ने पिता की हत्या के मामले का किया जिक्र
इस दौरान ओमप्रकाश राजे निंबालकर ने अपने पिता पवनराजे निंबालकर की हत्या के मामले का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पूर्व गृह मंत्री पद्मसिंह पाटिल को इस मामले में बरी किए जाने के बाद उन्होंने अमित शाह से न्याय की मांग की थी। उन्होंने कहा, 'हम किसी तरह का विशेष लाभ नहीं चाहते, लेकिन हमारी मांग है कि मामले में फैसला पूरी तरह तथ्यों और मेरिट के आधार पर हो'। उन्होंने बताया कि एकनाथ शिंदे ने भी आश्वासन दिया था कि सीबीआई इस मामले में अपील दायर करेगी।
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17 जून की बैठक में नहीं शामिल हुए थे नागेश
गौरतलब है कि 17 जून को दिल्ली में हुई शिवसेना (यूबीटी) की संसदीय दल की बैठक में छह सांसद; संजय दिना पाटिल, संजय देशमुख, संजय जाधव, भाऊसाहेब वाकचौरे, नागेश पाटिल आष्टीकर और ओमप्रकाश राजे निम्बालकर; शामिल नहीं हुए थे। इसके बाद से ही उनके शिंदे गुट में जाने की चर्चाएं तेज हो गई थीं। वर्तमान में शिवसेना (यूबीटी) के लोकसभा में नौ सांसद हैं। राजनीतिक जानकारों के अनुसार यदि कम से कम छह सांसद एक साथ पार्टी छोड़ते हैं, तो वे दल-बदल विरोधी कानून के प्रावधानों से बच सकते हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में महाराष्ट्र की राजनीति में और हलचल देखने को मिल सकती है।