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Explainer: 15 अगस्त के दो दिन बाद तक करोड़ों लोगों को नहीं पता था अपना देश, भारत-PAK बॉर्डर कैसे रखा गया गुप्त

Mon, 17 Aug 2026 06:11 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Mon, 17 Aug 2026 06:11 AM IST
सार

15 अगस्त 1947 को आजादी मिलने के दो दिन बाद यानी 17 अगस्त को भारत-पाकिस्तान सीमाएं घोषित की गईं, जिसके बाद सीमाओं के दोनों तरफ करोड़ों लोगों को विस्थापन और हिंसा झेलनी पड़ी। आखिर क्यों तत्कालीन वायसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन और साइरिल रेडक्लिफ ने बॉर्डर को गुप्त रखा था?

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Why India Pakistan Border Radcliffe Line kept Secret after Independence Day till 17 August 1947 explainer
स्वतंत्रता के बाद हिंसा-संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए क्षेत्र। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारत को 15 अगस्त 1947 को ब्रिटेन के शासन से आजादी मिल गई थी। इस मौके पर एक तरफ पूरे देश में जश्न का माहौल था तो वहीं दूसरी तरफ विभाजन की चोट भी महसूस की जा रही थी। एक चौंकाने वाली बात यह थी कि 15 अगस्त को जब आजादी का एलान हुआ था तब विभाजन ठीक से शुरू तक नहीं हो पाया था। यानी करोड़ों लोगों को यही नहीं पता था कि 15 अगस्त के दिन वे किस देश में खड़े होकर आजादी का जश्न मना रहे हैं। इस भ्रम की स्थिति की एक बड़ी वजह यह थी कि ब्रिटिश शासन ने भारत-पाकिस्तान की आजादी और विभाजन को तो मंजूरी दे दी थी, लेकिन दोनों को किस तरह बांटा गया, उसे सार्वजनिक नहीं किया गया। यह काम हुआ 17 अगस्त को, यानी आजादी के एलान के दो दिन बाद।
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ब्रिटिश शासन ने आखिर स्वतंत्रता के एलान के साथ ही भारत-पाकिस्तान की सीमाओं का खुलासा क्यों नहीं किया था? कैसे दोनों देशों में उस वक्त रह रहे करोड़ों लोग दो दिन तक यह नहीं जान पाए थे कि आजादी के वक्त वे भारत या पाकिस्तान कहां मौजूद हैं? किन राज्यों और जिलों को इसका सबसे ज्यादा असर झेलना पड़ा? भारत के विभाजन की जिम्मेदारी संभाल रहे साइरिल रेडक्लिफ कैसे इस गड़बड़ी के जिम्मेदार रहे? आइये जानते हैं...


आजादी के बाद भी ब्रिटिश शासन ने क्यों गुप्त रखीं भारत-पाकिस्तान की सीमाएं?

भारत और पाकिस्तान की सीमाओं को तय करने का काम साइरिल रेडक्लिफ को दिया गया था। ब्रिटेन में एक जाने-माने बैरिस्टर और शाही परिवार के वफादार माने जाने वाले रेडक्लिफ को दोनों देशों के बॉर्डर स्थापित करने के लिए पांच से छह हफ्तों का ही समय मिला था। वह भी तब, जब वे खुद कभी 1947 से पहले तक भारत नहीं आए थे। ऐसे में बेहद कम समय में उन्होंने न सिर्फ अलग-अलग क्षेत्रों का दौरा किया, बल्कि विभाजन से जुड़ी पूरा ब्योरा तैयार किया। हालांकि, इसे आजादी के दिन 15 अगस्त 1947 के बजाय 17 अगस्त 1947 को रिलीज किया गया। इसके पीछे तब कई छिपे हुए राजनीतिक और व्यवहारिक कारण सामने आए थे। 

पहला तर्क: आजादी के जश्न के फीके पड़ने और हिंसा भड़कने की आशंका 
अंतिम वायसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन का मानना था कि अगर 15 अगस्त से पहले सीमाओं की घोषणा कर दी गई तो इससे आजादी के जश्न का उत्साह फीका पड़ सकता था। इसके अलावा, पहले से ही विभाजन के मुहाने पर खड़े बेहद संवेदनशील और तनावपूर्ण माहौल के और ज्यादा हिंसक और विस्फोटक होने का गंभीर खतरा था।

दूसरा तर्क: विवादित फैसलों पर नेताओं की प्रतिक्रिया का डर 
ब्रिटिश शासन को डर था कि सत्ता के हस्तांतरण से पहले अगर विवादास्पद क्षेत्रीय निर्णयों को सार्वजनिक किया जाता, तो राजनीतिक दलों और नेताओं की ओर से बेहद तीखी प्रतिक्रिया आ सकती थी। इस स्थिति में सुरक्षा व्यवस्था और कानून-व्यवस्था संभालना उनके नियंत्रण से बाहर हो जाता और हालात बिगड़ जाते। 
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Why India Pakistan Border Radcliffe Line kept Secret after Independence Day till 17 August 1947 explainer
भारत-पाकिस्तान के बीच बंटवारे की रेखा खींचने वाले साइरिल रेडक्लिफ। - फोटो : अमर उजाला
तीसरा तर्क- धार्मिक स्तर पर विवादित और जटिल दावे
सीमा निर्धारण की यह पूरी प्रक्रिया बेहद कड़वाहट से भरी और जटिल थी। कांग्रेस, मुस्लिम लीग और सिख प्रतिनिधियों के दावे आपस में बुरी तरह टकरा रहे थे। सीमाओं का निर्धारण करते समय सिर्फ धार्मिक बहुसंख्या ही नहीं, बल्कि रेलवे, सिंचाई नहरों, सड़कों और बुनियादी ढांचे को भी ध्यान में रखना था, जो विभाजन से पहले पूरे प्रांत के लिए एक समान मदद करते थे। ऐसे में यह ध्यान रखना भी जरूरी था कि बुनियादी ढांचों और संसाधनों का भी सही बंटवारा हो। 

वास्तव में साइरिल रेडक्लिफ ने यह सीमा रिपोर्ट 12 अगस्त 1947 को ही तैयार कर ली थी। लेकिन इसे दबाकर रखा गया और 16 अगस्त की शाम को नई दिल्ली के गवमेंट हाउस में आयोजित एक बैठक में जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और लियाकत अली खान जैसे दोनों देशों के वरिष्ठ नेताओं को पहली बार ये सीमाएं दिखाई गईं। इसके अगले दिन, यानी 17 अगस्त 1947 को इसे औपचारिक रूप से भारत के राजपत्र (गजट) में प्रकाशित किया गया।

इस जबरदस्त गोपनीयता का असर यह हुआ कि करोड़ों लोग 15 अगस्त को यह जाने बिना ही आजादी का जश्न मना रहे थे कि वे भौगोलिक रूप से भारत में हैं या पाकिस्तान में। जब सीमाएं घोषित हुईं, तो नदिया, मालदा और गुरदासपुर जैसे क्षेत्रों में अचानक पैदा हुए भ्रम और उथल-पुथल ने इतिहास के सबसे भीषण विस्थापन और हिंसा को जन्म दिया।

किन राज्यों और जिलों को इसका सबसे ज्यादा असर झेलना पड़ा?

भारत-पाकिस्तान की सीमा के एलान में हुई इस देरी का सबसे बुरा असर तत्कालीन- पंजाब और बंगाल प्रांत पर पड़ा। दरअसल, ब्रिटिश शासन ने भारत को कमजोर करने के लिए दो तरफ से तोड़ा था। एक- पश्चिम में पंजाब-कश्मीर की तरफ, दूसरा- पूर्व में बंगाल की तरफ। ऐसे में इन प्रांतों के कुछ खास क्षेत्रों और जिलों को इस अनिश्चितता की सबसे बड़ी और दर्दनाक कीमत चुकानी पड़ी।

1. पंजाब क्षेत्र

गुरदासपुर: पंजाब का यह जिला सीमा तय न होने के असमंजस और रणनीतिक फैसलों का सबसे बड़ा उदाहरण बना। रेडक्लिफ के अंतिम फैसले में गुरदासपुर के अधिकांश हिस्से- पठानकोट, गुरदासपुर और बटाला को भारत को सौंप दिया गया, जबकि शकरगढ़ उपखंड पाकिस्तान के हिस्से में गया। इस फैसले का ऐतिहासिक और रणनीतिक असर हुआ, क्योंकि गुरदासपुर के भारत में शामिल होने से ही भारत को जम्मू और कश्मीर तक पहुंचने का सीधा जमीनी मार्ग मिल सका।

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लाहौर: रेडक्लिफ के मुताबिक, वे शुरू में लाहौर को भारत को ही सौंपने वाले थे, क्योंकि वहां हिंदू और सिख समुदाय बहुमत में थे और यह शहर संपत्तियों व बुनियादी ढांचे के मामले में बेहद समृद्ध था। लेकिन रेडक्लिफ ने महसूस किया कि बंगाल का समृद्ध कलकत्ता शहर पहले ही भारत को दिया जा चुका है और अगर लाहौर भी भारत को दे दिया गया, तो पाकिस्तान के पास कोई भी बड़ा विकसित शहर नहीं बचेगा। इस एक फैसले ने लाहौर के लाखों हिंदुओं और सिखों को पूरी तरह तबाह कर दिया, जिन्हें अचानक भड़की भीषण हिंसा के बीच अपनी पूरी जिंदगी पीछे छोड़कर भारत भागना पड़ा।

फिरोजपुर: पंजाब का यह क्षेत्र भी सीमा विवाद और राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोपों का केंद्र रहा। ऐतिहासिक दस्तावेजों के मुताबिक, लॉर्ड माउंटबेटन ने फिरोजपुर के सीमा निर्धारण में दखल दिया था, जिससे इसकी अस्थायी रूप से तय की गई सीमा को बाद में बदल दिया गया।

Why India Pakistan Border Radcliffe Line kept Secret after Independence Day till 17 August 1947 explainer
भारत-पाकिस्तान के बीच बंटवारे की रेखा खींचने वाले साइरिल रेडक्लिफ। - फोटो : अमर उजाला

2. बंगाल क्षेत्र

नदिया और मालदा: बंगाल में सीमा तय न होने की वजह से पैदा हुए गहरे भ्रम और उथल-पुथल के सबसे बड़े प्रतीक ये दो जिले बने। दरअसल, 15 अगस्त को आजादी का जश्न मनाने के बाद लोगों को यह जानने का कोई मौका तक नहीं मिला कि वे अचानक सोकर उठने पर खुद को किस देश के नागरिक के रूप में पाएंगे, जिससे इन क्षेत्रों में रातों-रात गहरा मानवीय संकट पैदा हो गया। जैसे ही अचानक 17 अगस्त को रेडक्लिफ रेखा ने इन जिलों के सदियों पुराने प्रशासनिक, आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने को बिल्कुल बीच से काट दिया, वैसे ही इन जिलों में भीषण हिंसा फैल गई और लोगों को रातों-रात पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा। 

कलकत्ता: बंगाल के इस सबसे बड़े और आर्थिक रूप से अहम शहर को विभाजन के अंतिम फैसले में भारत के हिस्से में रखा गया।

3. जम्मू और कश्मीर 

रेडक्लिफ लाइन के खींचे जाने ने इस रियासत की स्थिति को बेहद जटिल बना दिया। गुरदासपुर के भारतीय क्षेत्र में शामिल होने से कश्मीर का जमीनी रास्ता खुला। इसके बाद मुस्लिम बहुल क्षेत्र होने के बावजूद वहां के महाराजा हरि सिंह ने भारत में विलय का फैसला किया। इससे तिलमिलाए पाकिस्तान ने भारत पर कायराना वार किया और एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया। बाद में भारत ने इस मुद्दे को ब्रिटेन से लेकर यूएन तक के सामने उठाया लेकिन कश्मीर पर पाकिस्तान के अवैध कब्जे का मुद्दा आज भी अनसुलझा है। 


साइरिल रेडक्लिफ कैसे इस गड़बड़ी के जिम्मेदार रहे? 

विभाजन के दौरान हुई भीषण तबाही और सीमा निर्धारण की ऐतिहासिक गड़बड़ी के लिए साइरिल रेडक्लिफ को मुख्य रूप से जिम्मेदार ठहराया जाता है। यूं तो वे विभाजन की राजनीतिक मांग या देश में फैली सांप्रदायिक हिंसा की वजह नहीं थे, लेकिन एक 'बाहरी' के रूप में उन्होंने बंद कमरों में बिना किसी व्यावहारिक जमीनी समझ के जो लकीरें खींचीं, उसने इस मानवीय त्रासदी को इतिहास की सबसे खौफनाक त्रासदियों में से एक बना दिया।

पांच महीने में तय कर दिया दो देशों का बंटवारा
रेडक्लिफ पेशे से एक ब्रिटिश वकील (बैरिस्टर) थे, जो 8 जुलाई 1947 को अपने जीवन में पहली बार भारत आए थे। उन्हें इस उपमहाद्वीप, इसके जटिल भूगोल, जनसांख्यिकी और स्थानीय समुदायों के बारे में कोई व्यावहारिक अनुभव या जानकारी नहीं थी। ऐसे व्यक्ति को बिना किसी सर्वेक्षण दल के करोड़ों लोगों के भाग्य और देश की सीमाओं को तय करने की असीमित शक्ति सौंप दी गई।

उन्हें पंजाब और बंगाल जैसे दो विशाल, बेहद संवेदनशील और घनी आबादी वाले प्रांतों को विभाजित करने के लिए महज 35 दिन का समय दिया गया था। इतने कम समय में किसी क्षेत्र का प्रत्यक्ष दौरा करना या जमीनी स्तर पर जाकर भौगोलिक बारीकियों को समझना पूरी तरह असंभव था। बाद में खुद रेडक्लिफ ने स्वीकार किया कि समय इतना कम था कि वे इससे बेहतर काम नहीं कर सकते थे।
 

Why India Pakistan Border Radcliffe Line kept Secret after Independence Day till 17 August 1947 explainer
पश्चिमी पाकिस्तान के बांग्लादेश बनने के बाद अब भारत-पाकिस्तान सीमा लंबाई। - फोटो : अमर उजाला
पुराने नक्शों और गलत आंकड़ों का इस्तेमाल किया
जमीन पर जाकर सीमाओं का भौतिक सर्वेक्षण करने का कोई विकल्प नहीं था। रेडक्लिफ ने सीमाएं तय करने के लिए पुराने नक्शों और गलत-पुराने जनगणना आंकड़ों का सहारा लिया। यहां तक कि बंगाल सीमा आयोग की सार्वजनिक बैठकों में वे खुद व्यक्तिगत रूप से मौजूद भी नहीं रहे; उन्होंने केवल कागजात देखकर ही निर्णय ले लिया।

लाहौर जैसे शहरों पर मनमाने और लापरवाही भरे फैसले
रेडक्लिफ ने कई अहम क्षेत्रों पर फैसले बिना किसी ठोस आधार के, केवल संतुलन बनाने के लिए किए। इनमें लाहौर एक बड़ा उदाहरण रहा, जहां हिंदुओं-सिखों की आबादी के साथ उनकी संपत्ति भी ज्यादा थी। इसके बावजूद यह हिस्सा पाकिस्तान को सौंप दिया गया। यह फैसला इस आधार पर लिया गया कि समृद्ध कलकत्ता शहर तो वे पहले ही भारत को दे चुके हैं और यदि लाहौर भी भारत को दे दिया गया, तो पाकिस्तान के पास कोई भी बड़ा विकसित शहर नहीं बचेगा। केवल इस राजनीतिक संतुलन को बनाए रखने के लिए उन्होंने लाहौर पाकिस्तान को सौंप दिया, जिसके कारण वहां के लाखों हिंदुओं और सिखों को अचानक कत्लेआम और विस्थापन का सामना करना पड़ा।

जटिल बुनियादी ढांचे की पूरी अनदेखी
विभाजन से पहले पंजाब और बंगाल के सिंचाई नहर तंत्र, रेलवे नेटवर्क, सड़कें और बिजली प्रणाली एकीकृत रूप से काम करती थीं। रेडक्लिफ की खींची गई लकीर ने इन प्रणालियों को बीच से काट दिया। इसके कारण कई गांव अपने आर्थिक केंद्रों से कट गए, नदियां एक देश में थीं तो उनकी सिंचाई नहरें दूसरे देश में चली गईं, और लोग रातों-रात अपने ही घरों में विदेशी बन गए।

अपने निजी दस्तावेज जलाकर इतिहास का सबसे बड़ा रहस्य पैदा किया 
अपनी इस बेहद विवादास्पद सीमा रिपोर्ट (रेडक्लिफ लाइन) को पूरा करने के बाद रेडक्लिफ ने 16 अगस्त 1947 को भारत छोड़ने से पहले अपने निजी विचार-विमर्श और बैठकों से जुड़े अधिकांश दस्तावेजों को जलाकर नष्ट कर दिया। इस वजह से यह हमेशा के लिए एक रहस्य बन गया कि उन्होंने वास्तव में किस दबाव या सोच के तहत ये सीमाएं तय कीं। उनके निजी सचिव क्रिस्टोफर ब्यूमोंट ने बाद में कई आरोप लगाए। हालांकि, दस्तावेजों के नष्ट होने की वजह से राजनीतिक साजिशों की सच्चाई कभी खुलकर सामने नहीं आ पाई।



 
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