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UP Nikay Chunav: कब हो सकता है यूपी का नगर निकाय चुनाव, समझें सरकार आगे क्या करेगी?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु मिश्रा Updated Wed, 04 Jan 2023 06:00 PM IST
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सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बिना ओबीसी आरक्षण के बिना तत्काल नगर निकाय चुनाव कराने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। आइए जानते हैं कि अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद नगर निकाय चुनाव कब तक हो सकता है? सरकार का अगला कदम क्या होगा? 

UP Nagar Nikay Chunav: When can UP's municipal elections be held, understand what the government will do next?
यूपी नगर निकाय चुनाव - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

उत्तर प्रदेश नगर निकाय चुनाव को लेकर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को बड़ी राहत दे दी है। कोर्ट ने यूपी सरकार को ओबीसी आरक्षण लागू करने के लिए तीन महीने का समय दे दिया है। इन तीन महीनो में यूपी सरकार की ओर से गठित पिछड़ा वर्ग आयोग को आरक्षण से जुड़े अपने फैसले लेने होंगे। जिसके आधार पर यूपी में नगर निकाय चुनाव होगा। मतलब नगर निकाय चुनाव तीन महीने के लिए टल गया है। 
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इसके पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बिना ओबीसी आरक्षण के बिना तत्काल नगर निकाय चुनाव कराने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। आइए जानते हैं कि अब नगर निकाय चुनाव कब तक हो सकता है? सरकार का अगला कदम क्या होगा? 
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पहले जानिए क्या है पूरा मामला
उत्तर प्रदेश सरकार ने पांच दिसंबर को नगर निकाय चुनाव के लिए आरक्षण की अधिसूचना जारी की थी। इसके इसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई। कहा गया कि यूपी सरकार ने आरक्षण तय करने में सुप्रीम कोर्ट के ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूले का पालन नहीं किया है। इस पर हाईकोर्ट ने आरक्षण की अधिसूचना रद्द करते हुए यूपी सरकार को तत्काल प्रभाव से बिना ओबीसी आरक्षण लागू किए नगर निकाय चुनाव कराने का फैसला दे दिया था। 

हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद यूपी सरकार ने ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूले के तहत ओबीसी आरक्षण निर्धारित करने के लिए पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन कर दिया। इस बीच, इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ योगी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का भी दरवाजा खटखटाया। आज सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी। 
 

कब तक होंगे चुनाव? 
इसे समझने के लिए हमने सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता चंद्र प्रकाश पांडेय से बात की। उन्होंने कहा, 'सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले पर रोक लगाई है, जिसमें बिना ओबीसी आरक्षण और तत्काल प्रभाव से चुनाव कराने का निर्देश दिया गया है। मतलब साफ है कि यूपी में नगर निकाय चुनाव होगा तो वह ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूले पर ओबीसी आरक्षण निर्धारित करने के बाद ही होगा।'

पांडेय आगे कहते हैं, 'यूपी सरकार ने नगर निकाय में ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूले के तहत ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन कर दिया है। ये आयोग 31 मार्च तक यूपी सरकार को अपनी रिपोर्ट देगा। इसी रिपोर्ट के आधार पर यूपी सरकार नगर निकाय चुनाव के लिए ओबीसी आरक्षण को निर्धारित करेगी। ओबीसी आरक्षण निर्धारित होने के बाद सूबे में नगर निकाय चुनाव का रास्ता साफ हो जाएगा। मतलब अप्रैल के आखिरी हफ्ते तक प्रदेश में नगर निकाय चुनाव हो सकता है।'
 

अब आगे क्या करेगी यूपी सरकार? 
यूपी सरकार को फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी राहत दे दी है। अब सरकार पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट का इंतजार करेगी। जैसे ही ओबीसी आरक्षण को लेकर पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट आ जाएगी, सरकार विशेषज्ञों की सलाह लेकर नगर निकाय चुनाव के लिए नए सिरे से आरक्षण की अधिसूचना जारी कर देगी। मतलब जिसके चलते चुनाव फंसा था, अब सरकार उन मानकों को पूरा करते हुए ही चुनाव कराएगी। 
 

अब जानिए क्या है ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला, जिसके चलते फंसा निकाय चुनाव
सुप्रीम कोर्ट ने विकास किशनराव गवली की याचिका पर सुनवाई करते हुए ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूले से नगर निकाय चुनाव कराने का आदेश दिया था। कोर्ट का ये आदेश सभी राज्यों को लागू करना था, लेकिन अब उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में लागू नहीं हो सका है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि निकाय चुनाव में राज्य सरकार ट्रिपल टेस्ट फार्मूले का पालन करने के बाद ही ओबीसी आरक्षण तय कर सकती है। इस ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूले में तीन अहम बातें हैं। 
 
1. स्थानीय निकायों में पिछड़ेपन की प्रकृति की जांच के लिए एक आयोग की स्थापना की जाए। यह आयोग निकायों में पिछड़ेपन की प्रकृति का आंकलन करेगा और सीटों के लिए आरक्षण प्रस्तावित करेगा।
2. आयोग की सिफारिशों के तहत स्थानीय निकायों की ओर से ओबीसी की संख्या का परीक्षण कराया जाए और उसका सत्यापन किया जाए।
3. इसके बाद ओबीसी आरक्षण तय करने से पहले यह ध्यान रखा जाए कि एससी-एसटी और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए कुल आरक्षित सीटें 50 फीसदी से ज्यादा न हों।
 
 

इन चार राज्यों में भी फंसा था पेंच
यूपी की तरह ही चार अन्य राज्यों में भी नगर निकाय चुनाव में आरक्षण का पेंच फंसा था। इन मामलों में भी पहले हाईकोर्ट ने सरकार के खिलाफ ही आदेश दिया था। जैसा कि यूपी में भी हुआ है। इसके बाद सभी राज्यों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। आइए जानते हैं चारों राज्यों में क्या-क्या हुआ था? 
 

1. महाराष्ट्र: इस साल की शुरुआत में बिना ट्रिपल टेस्ट लागू करके ओबीसी आरक्षण देने के महाराष्ट्र सरकार के फैसले को खारिज कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने भी बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। तब राज्य सरकार पिछड़ों को आरक्षण देने के लिए अध्यादेश ले आई। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस अध्यादेश को भी खारिज कर दिया। अंत में राज्य सरकार को पिछड़ा आयोग का गठन करना पड़ा और उसकी सिफारिशों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की अनुमति दी। 
 

2. बिहार: राज्य सरकार ने पिछड़ा वर्ग आयोग की जगह पहले से काम कर रहे अति पिछड़ा आयोग को ओबीसी आरक्षण की रिपोर्ट तैयार करने का काम सौंप दिया। इस फैसले को यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई कि यह समर्पित पिछड़ा आयोग नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने आयोग की रिपोर्ट के आधार पर जारी चुनाव कार्यक्रम में कोई दखल नहीं दिया। लेकिन, आयोग की वैधता पर जरूर जनवरी में सुनवाई होगी। 
 

3. मध्य प्रदेश: यहां भी नगर निकाय का चुनाव अदालत में फंस गया। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बिना ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला लागू किए चुनाव कराने के सरकार के फैसले को खारिज कर दिया था। इसके खिलाफ मध्य प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई थी। मई, 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य चुनाव आयोग को बिना ओबीसी आरक्षण लागू किए चुनाव कराने का आदेश दे दिया। हालांकि, बाद में सरकार ने राज्य पिछड़ा आयोग का गठन किया और उसकी सिफारिशों के आधार पर ही चुनाव हुए। 
 

4. झारखंड: यहां भी राज्य सरकार ने बिना पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किए नगर निकाय चुनाव की घोषणा कर दी थी। इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। तब हेमंत सोरेन सरकार ने कोर्ट से आयोग के गठन के लिए समय मांगा। अब आयोग का गठन हो चुका है। अब इसी की रिपोर्ट के आधार पर यहां स्थानीय निकाय चुनाव होंगे।
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