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Karnataka: विहिप के प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल से की मुलाकात, हेट स्पीच बिल को मंजूरी न देने का किया अनुरोध
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बंगलूरू।
Published by: निर्मल कांत
Updated Mon, 26 Jan 2026 03:43 PM IST
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सार
Karnataka: विश्व हिंदू परिषद ने कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत से नफरती भाषण और घृणा अपराध (रोकथाम) विधेयक, 2025 की मंजूरी रोकने और इसे राष्ट्रपति के विचार के लिए भेजने का आग्रह किया है। वीएचपी का कहना है कि यह विधेयक पुलिस को अत्यधिक विवेकाधिकार देता है और नफरती भाषण व घृणा अपराध के बीच अंतर स्पष्ट नहीं करता है, जिससे आम नागरिकों की अभिव्यक्ति पर खतरा पैदा हो सकता है। पढ़ें रिपोर्ट
विश्व हिंदू परिषद
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के नेताओं ने सोमवार को कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत से मुलाकात की। इस दौरान वीएचपी की नेताओं ने उनसे नफरती भाषण और घृणा अपराध (रोकथाम) विधेयक पर अपनी मंजूरी रोकने और इसे राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखने का आग्रह किया।
वीएचपी के राष्ट्रीय सचिव और सामाजिक समरसता प्रभारी देवजी भाई रावत संगठन के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ लोकभवन में राज्यपाल से मिले और उन्हें इस संबंध में एक अनुरोध पत्र सौंपा।
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विधानसभा से पारित हो चुका विधेयक
कर्नाटक नफरती भाषण और घृणा अपराध (रोकथाम) विधेयक, 2025 को दिसंबर में राज्य विधानसभा के दोनों सदनों ने पारित किया था। इस दौरान विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और जद (एस) ने इसका कड़ा विरोध किया था। फिलहाल इस विधेयक को कानून बनाने के लिए राज्यपाल की मंजूरी का इंतजार है।
विधेयक में सजा के क्या प्रावधान हैं?
इस विधेयक में घृणा अपराधों के लिए एक साल की जेल का प्रावधान है, जिसे बढ़ाकर सात साल तक किया जा सकता है, साथ ही 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाने का भी प्रावधान है। कई बार अपराध करने पर अधिकतम सात साल की जेल और एक लाख रुपये जुर्माने का प्रावधान है।
वीएचपी का राज्यपाल से विधेयक की मंजूरी रोकने का आग्रह
वीएचपी ने अपने पत्र में कहा कि प्रस्तावित कानून पुलिस को अत्यधिक विवेकाधिकार देता है, जिसका इस्तेमाल राज्य की विभिन्न कार्रवाइयों पर की जाने वाली वास्तविक आलोचना को दबाने के लिए किया जा सकता है। इसलिए संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल से इस विधेयक पर मंजूरी रोकने और इसे राष्ट्रपति के विचार के लिए भेजने का अनुरोध किया गया है।
संगठन ने पत्र में क्या कहा?
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कई अन्य संगठनों ने भी विधेयक की मंजूरी रोकने का आग्रह किया
विपक्षी भाजपा और जद (एस) के अलावा कई अन्य संगठनों ने भी राज्यपाल से इस विधेयक को मंजूरी न देने की मांग की है। वीएचपी के अनुसार, इस विधेयक में कई कानूनी और प्रक्रिया संबंधी खामियां हैं और यह असांविधानिक है। संगठन ने कहा कि भले ही सरकार इसे सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए बता रही हो, लेकिन जिस तरह से इसका मसौदा तैयार किया गया है, उसमें कई कानूनी विसंगतियां हैं और यह संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों का उल्लंघन करता है।
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वीएचपी के राष्ट्रीय सचिव और सामाजिक समरसता प्रभारी देवजी भाई रावत संगठन के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ लोकभवन में राज्यपाल से मिले और उन्हें इस संबंध में एक अनुरोध पत्र सौंपा।
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विधानसभा से पारित हो चुका विधेयक
कर्नाटक नफरती भाषण और घृणा अपराध (रोकथाम) विधेयक, 2025 को दिसंबर में राज्य विधानसभा के दोनों सदनों ने पारित किया था। इस दौरान विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और जद (एस) ने इसका कड़ा विरोध किया था। फिलहाल इस विधेयक को कानून बनाने के लिए राज्यपाल की मंजूरी का इंतजार है।
विधेयक में सजा के क्या प्रावधान हैं?
इस विधेयक में घृणा अपराधों के लिए एक साल की जेल का प्रावधान है, जिसे बढ़ाकर सात साल तक किया जा सकता है, साथ ही 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाने का भी प्रावधान है। कई बार अपराध करने पर अधिकतम सात साल की जेल और एक लाख रुपये जुर्माने का प्रावधान है।
वीएचपी का राज्यपाल से विधेयक की मंजूरी रोकने का आग्रह
वीएचपी ने अपने पत्र में कहा कि प्रस्तावित कानून पुलिस को अत्यधिक विवेकाधिकार देता है, जिसका इस्तेमाल राज्य की विभिन्न कार्रवाइयों पर की जाने वाली वास्तविक आलोचना को दबाने के लिए किया जा सकता है। इसलिए संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल से इस विधेयक पर मंजूरी रोकने और इसे राष्ट्रपति के विचार के लिए भेजने का अनुरोध किया गया है।
संगठन ने पत्र में क्या कहा?
- वीएचपी का कहना है कि यह विधेयक प्रावधानों का ऐसा समूह है, जिससे नफरती भाषण रोकने के नाम पर हर व्यक्ति को अपराधी बनाए जाने का खतरा पैदा होता है।
- वीएचपी का दावा है कि विधेयक में नफरती भाषण और घृणा अपराध के बीच कोई स्पष्ट अंतर नहीं किया गया है।
- संगठन ने कहा कि कानून का स्थापित सिद्धांत है कि भाषण को अपराध की श्रेणी में लाने वाला कानून स्पष्ट और सटीक होना चाहिए, क्योंकि अत्यधिक अस्पष्ट कानून आम लोगों में मुकदमे का भय पैदा करता है।
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कई अन्य संगठनों ने भी विधेयक की मंजूरी रोकने का आग्रह किया
विपक्षी भाजपा और जद (एस) के अलावा कई अन्य संगठनों ने भी राज्यपाल से इस विधेयक को मंजूरी न देने की मांग की है। वीएचपी के अनुसार, इस विधेयक में कई कानूनी और प्रक्रिया संबंधी खामियां हैं और यह असांविधानिक है। संगठन ने कहा कि भले ही सरकार इसे सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए बता रही हो, लेकिन जिस तरह से इसका मसौदा तैयार किया गया है, उसमें कई कानूनी विसंगतियां हैं और यह संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों का उल्लंघन करता है।