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Railways: युद्ध से बिगड़ा समुद्री व्यापार, कंटेनर ट्रेन ऑपरेटरों की बढ़ी मुश्किलें; रेलवे ले सकता है यह फैसला
डिजिटल ब्यूरो अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Rahul Kumar
Updated Wed, 22 Apr 2026 05:15 PM IST
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सार
इस समय करीब 50 रेक निष्क्रिय पड़े हैं। जो सामान्य से 5 से 8 गुना ज्यादा हैं। कई मामलों में ट्रेनों को बंदरगाहों तक खाली चलाना पड़ रहा है, जिससे बिना कार्गो के भी ऑपरेटरों को हॉलेज शुल्क चुकाना पड़ रहा है।
पिलखनी से साहनेवाल तक कॉरिडोर सेक्शन पर दौड़ रही मालगाड़ी।
- फोटो : संवाद
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विस्तार
पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध का असर अब भारत के लॉजिस्टिक्स सेक्टर पर भी दिखने लगा है। इसी को देखते हुए कंटेनर ट्रेन ऑपरेटरों (सीटीओ) को राहत देने पर रेल मंत्रालय गंभीरता से विचार कर रहा है। सूत्रों के मुताबिक, इस संबंध में कई अनुरोध मिलने के बाद मंत्रालय ने स्थिति की समीक्षा शुरू कर दी है। जल्द ही राहत से जुड़े फैसले लिए जा सकते हैं।
कंटेनर कारोबार में गिरावट
दरअसल, कंटेनर ट्रेन ऑपरेटर (सीटीओ) प्राइवेट कंपनियां होती हैं। जो रेलवे के साथ लाइसेंस समझौते के तहत अपने रेक का इस्तेमाल कर निर्यात-आयात और घरेलू कंटेनरों की ढुलाई करती हैं। लेकिन होर्मुज स्ट्रेट में हालात बिगड़ने और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर इसके असर के चलते समुद्री कंटेनर कारोबार में गिरावट देखी जा रही हैं।
इसका सीधा असर सीटीओ के कामकाज पर पड़ा है और उन्हें राजस्व में भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है। क्षमता की कमी के चलते ऑपरेटरों पर खर्च और बढ़ गया है। जिन रेक का इस्तेमाल नहीं हो रहा, उन्हें रेलवे निष्क्रिय रखता है। इस पर उन्हें स्टेबिंग चार्ज देना पड़ता है। जिसका भुगतान ऑपरेटरों को करना होता है। कारोबार घटने की वजह से बड़ी संख्या में रेक खाली पड़े हैं। उनका उपयोग नहीं हो पा रहा है, जिससे ऑपरेटरों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ गया है।
50 रेक निष्क्रिय पड़े
कंटेनर ट्रेन ऑपरेटरों के संगठन के मुताबिक, इस समय करीब 50 रेक निष्क्रिय पड़े हैं। जो सामान्य से 5 से 8 गुना ज्यादा हैं। कई मामलों में ट्रेनों को बंदरगाहों तक खाली चलाना पड़ रहा है, जिससे बिना कार्गो के भी ऑपरेटरों को हॉलेज शुल्क चुकाना पड़ रहा है।
रेलवे सूत्रों के अनुसार, शुरुआत में रेलवे राहत देने के पक्ष में नहीं था, लेकिन ऑपरेटरों को हो रहे नुकसान और उसके माल ढुलाई पर संभावित असर को देखते हुए अब इस पर विचार किया जा रहा है। पिछले सप्ताह इस मुद्दे पर कई बैठकें हुई हैं, हालांकि अभी कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है। जानकारी के मुताबिक, देश में सरकारी और निजी ऑपरेटर मिलकर करीब 700 कंटेनर ट्रेनें चलाते हैं, जिनमें से लगभग आधी ट्रेनें निजी कंपनियों के पास हैं।
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कंटेनर कारोबार में गिरावट
दरअसल, कंटेनर ट्रेन ऑपरेटर (सीटीओ) प्राइवेट कंपनियां होती हैं। जो रेलवे के साथ लाइसेंस समझौते के तहत अपने रेक का इस्तेमाल कर निर्यात-आयात और घरेलू कंटेनरों की ढुलाई करती हैं। लेकिन होर्मुज स्ट्रेट में हालात बिगड़ने और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर इसके असर के चलते समुद्री कंटेनर कारोबार में गिरावट देखी जा रही हैं।
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इसका सीधा असर सीटीओ के कामकाज पर पड़ा है और उन्हें राजस्व में भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है। क्षमता की कमी के चलते ऑपरेटरों पर खर्च और बढ़ गया है। जिन रेक का इस्तेमाल नहीं हो रहा, उन्हें रेलवे निष्क्रिय रखता है। इस पर उन्हें स्टेबिंग चार्ज देना पड़ता है। जिसका भुगतान ऑपरेटरों को करना होता है। कारोबार घटने की वजह से बड़ी संख्या में रेक खाली पड़े हैं। उनका उपयोग नहीं हो पा रहा है, जिससे ऑपरेटरों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ गया है।
50 रेक निष्क्रिय पड़े
कंटेनर ट्रेन ऑपरेटरों के संगठन के मुताबिक, इस समय करीब 50 रेक निष्क्रिय पड़े हैं। जो सामान्य से 5 से 8 गुना ज्यादा हैं। कई मामलों में ट्रेनों को बंदरगाहों तक खाली चलाना पड़ रहा है, जिससे बिना कार्गो के भी ऑपरेटरों को हॉलेज शुल्क चुकाना पड़ रहा है।
रेलवे सूत्रों के अनुसार, शुरुआत में रेलवे राहत देने के पक्ष में नहीं था, लेकिन ऑपरेटरों को हो रहे नुकसान और उसके माल ढुलाई पर संभावित असर को देखते हुए अब इस पर विचार किया जा रहा है। पिछले सप्ताह इस मुद्दे पर कई बैठकें हुई हैं, हालांकि अभी कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है। जानकारी के मुताबिक, देश में सरकारी और निजी ऑपरेटर मिलकर करीब 700 कंटेनर ट्रेनें चलाते हैं, जिनमें से लगभग आधी ट्रेनें निजी कंपनियों के पास हैं।

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