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Ground Report: जय महाकाली के साथ जय श्रीराम, बंगाल में हिंदुत्व का ज्वार और अंतिम प्रहार

Rajkishor राजकिशोर
Updated Tue, 28 Apr 2026 04:08 AM IST
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सार

पश्चिम बंगाल में चुनाव के दूसरे चरण में मुकाबला जिन 142 सीटों पर होना है, वे तृणमूल का हृदय-प्रदेश हैं। पिछले चुनाव में यहां भाजपा के पास महज 18 सीटें थीं, लेकिन इस बार हवा का रुख अलग है। भ्रष्टाचार, कट-मनी और स्थानीय प्रताड़ना के बीच शाह का ब्रह्मास्त्र कि नतीजे आने के बाद भी 60 दिनों तक सुरक्षा बल यहीं रहेंगे...एक तरह से मतदाताओं और अपने कार्यकर्ताओं को अभयदान का संदेश है।

West Bengal Election 2026 Hindutva Under Current Jai Mahakali to Jai Shri Ram Shift in second phase TMC BJP
बंगाल विधानसभा चुनाव में अमित शाह की रणनीति और ममता के जनाधार की परीक्षा - फोटो : एएनआई / अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

पश्चिम बंगाल की सियासत अस्मिता और अस्तित्व का भीषण संघर्ष बन चुकी है। हुगली की लहरों के ऊपर भले ही हाई-वोल्टेज प्रचार और तीखे आरोप-प्रत्यारोपों का शोर हो, लेकिन इन लहरों के ठीक नीचे हिंदुत्व का अंडर करंट तमाम मुद्दों को विचलित करता दिख रहा है। इस अंडर करंट को समझना वैसा ही है, जैसे गंगासागर के मुहाने पर भागीरथी के अदृश्य प्रवाह को भांपना, जो ऊपर से जितना शांत है, नीचे उतना ही वेगवान। यह वह समीकरण है, जो ममता बनर्जी के अभेद्य किले की दीवारों में दरार पैदा करने की क्षमता रखता है। आखिर में चुनाव परंपरागत खांचों से बाहर निकलकर शक्ति बनाम श्रीराम के उस मोड़ पर आ गया है, जहां हर बयान एक तीर है और हर रैली एक घेराबंदी।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बंगाल के मंदिरों में जाना महज धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक चेतना को झकझोरना है, जो बंगाल में सेक्युलरिज्म के नाम पर हाशिए में रही। दक्षिणेश्वर से लेकर बेलूर मठ तक और मतुआ धाम से लेकर कालीघाट तक मोदी की उपस्थिति ने ऐसा विमर्श खड़ा कर दिया है, जिसने ममता को उनके ही गढ़ में वैचारिक रूप से बेचैन तो कर ही दिया है। बंगाल की गलियों में नया स्वर गूंज रहा है। पारंपरिक जय महाकाली के साथ जय श्रीराम का उद्घोष अब केवल नारा नहीं, बल्कि राजनीतिक पहचान बन चुका है। कोलकाता की सड़कों पर उतरता यह जनसैलाब उस मनोवैज्ञानिक बदलाव का गवाह है, जिसे पहले चरण के मतदान के बाद भाजपा बड़ी आहट मान रही है। भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि पहले चरण में मतदाता ने चुप्पी तोड़कर मतदान किया है, तो यह उस परिवर्तन का संकेत है जिसकी पटकथा दिल्ली में लिखी गई थी।
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शाह का कमांड, बंसल का बूथ-तंत्र
गृह मंत्री अमित शाह का पिछले 15 दिनों से कोलकाता में डेरा डालना और उन सीटों पर पसीना बहाना, जहां कभी भाजपा का झंडा तक नहीं दिखता था, इस बात का प्रमाण है कि इस सियासी चाणक्य ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। शाह ने रिमोट कंट्रोल छोड़कर खुद मोर्चा संभाला है। उनके साथ साये की तरह डटे हैं भाजपा महासचिव सुनील बंसल। वही बंसल, जिन्होंने उत्तर प्रदेश में बूथ स्तर पर जीत का रसायन तैयार किया था, यहां मुकुल राय की कमी को अपनी सूक्ष्म संगठनात्मक दृष्टि से भर रहे हैं। शाह मंचों से हुंकार भरकर कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ा रहे हैं, तो बंसल पर्दे के पीछे से एक-एक बूथ का ऐसा गणित सेट कर रहे हैं, जिसमें तृणमूल की हनक और दबंगई का तोड़ निकाला जा सके।

भय पर सुरक्षा कवच की चोट
मुकाबला जिन 142 सीटों पर होना है, वे तृणमूल का हृदय-प्रदेश हैं। पिछले चुनाव में यहां भाजपा के पास महज 18 सीटें थीं, लेकिन इस बार हवा का रुख अलग है। भ्रष्टाचार, कट-मनी और स्थानीय प्रताड़ना के बीच शाह का ब्रह्मास्त्र कि नतीजे आने के बाद भी 60 दिनों तक सुरक्षा बल यहीं रहेंगे...एक तरह से मतदाताओं और अपने कार्यकर्ताओं को अभयदान का संदेश है। पिछले विधानसभा चुनाव के बाद तमाम भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों को प. बंगाल में बहुत कुछ सहना पड़ा था। यह उन लाखों समर्थकों के लिए संजीवनी है, जो 2021 की हिंसा के बाद अपनी पहचान छिपाने को मजबूर थे।

ममता की शक्ति और अभिषेक
हाई-वोल्टेज घेराबंदी के जवाब में ममता ने रणनीति की कमान पूरी तरह से बंगाली अस्मिता और धार्मिक समावेश के हाथों में सौंप दी है। जहां भाजपा हिंदुत्व को चुनावी पिच बना रही है, वहीं ममता इसे शक्ति उपासना के जरिए अपने पक्ष में मोड़ने में जुटी हैं। शीतला मंदिर और कालीघाट के द्वारे जाकर संदेश दे रही हैं कि बंगाल की परंपरा को बाहरी चश्मे से नहीं देखा जा सकता। इस मोर्चे पर उनकी युवा वाहिनी, जिसका नेतृत्व अभिषेक बनर्जी कर रहे हैं, अधिक आक्रामक और रणनीतिक दिख रही है।

अभिषेक ने फुटबाल की एनालॉजी से भाजपा को रेड कार्ड दिखाने का आह्वान कर युवाओं को अपने पाले में खींचने का दांव खेला है। सयानी घोष जैसी प्रखर वक्ता जमीनी स्तर पर केंद्र की दिल्ली बनाम बंगाल वाली छवि को भुना रही हैं। तृणमूल के ये युवा चेहरे भाजपा के जय श्रीराम को जय मां काली और अल्लाह-हू-अकबर से काट रहे हैं और चुनावी विमर्श को मंदिर से खींचकर केंद्र के बकाया फंड और हक की लड़ाई पर लाने की जद्दोजहद कर रहे हैं। तृणमूल के पलटवार से बंगाल में प्रतीकों की लड़ाई अब अधिकारों के संग्राम में तब्दील हो चुकी है।

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