Explainer: क्या है 3.5% नियम, जिसके आगे झुक सकती है सत्ता; भारत के युवाओं के आंदोलन से इसका क्या कनेक्शन?
क्या है 3.5% रूल, जिसकी चर्चा दुनिया के कई बड़े जन आंदोलनों के साथ होती रही है? भारत में सोशल मीडिया पर शुरू हुआ सीजेपी अभियान युवाओं के जुड़ने के साथ सड़कों तक पहुंचा और आंदोलन की एक बड़ी मांग पूरी होने के बाद इसकी कामयाबी की चर्चा तेज हो गई। इसी के साथ दशकों पुराने इस रूल का जिक्र भी होने लगा। आइए विस्तार से जानते हैं।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
सोशल मीडिया पर एक मजाक के तौर पर शुरू हुआ एक अभियान धीरे-धीरे युवा आंदोलन में बदल गया। शिक्षा व्यवस्था, बेरोजगारी और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर युवा इससे जुड़ने लगे। बाद में सामाजिक कार्यकर्ता और दूसरे समूह भी आंदोलन का हिस्सा बने। विरोध सोशल मीडिया से निकलकर जंतर-मंतर और फिर संसद मार्च तक पहुंच गया। इसके बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की खबर सामने आई।
इसी आंदोलन के साथ एक पुरानी रिसर्च फिर चर्चा में है 3.5% रूल। सवाल है कि क्या किसी देश की सिर्फ 3.5% आबादी की सक्रिय भागीदारी किसी आंदोलन को सफल बना सकती है? यह आंकड़ा आया कहां से और क्या भारत का सीजेपी आंदोलन इस नियम पर फिट बैठता है?
पहले जानिए, भारत में क्या हुआ?
भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सरकार के आलोचकों और बेरोजगार युवाओं की तुलना 'कॉकरोच' और 'परजीवी' से की। इसके बाद बॉस्टन यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर सवाल किया, 'क्या होगा अगर सभी कॉकरोच एक साथ आ जाएं?' उन्होंने लोगों को जोड़ने के लिए एक वेबसाइट बनाई और देखते ही देखते अभियान सोशल मीडिया पर फैल गया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर सीजेपी के दो करोड़ से ज्यादा फॉलोअर्स हो गए। इसी दौरान पेपर लीक, परीक्षाओं में तकनीकी खामियों और रद्द हुई परीक्षाओं से नाराज युवा भी इससे जुड़ गए। बाद में आंदोलन ने नीट पेपर लीक को लेकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को हटाने की मांग की।
भारत में किनती युवा आबादी है?
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के मुताबिक 15 से 29 साल के लोगों को युवा आबादी में शामिल किया गया है। 2026 में भारत की अनुमानित 142.59 करोड़ आबादी में करीब 36.74 करोड़ युवा हैं। यानी देश की कुल आबादी में युवाओं की हिस्सेदारी करीब 25.8% है।
सोशल मीडिया से सड़क तक कैसे पहुंचा आंदोलन?
20 जून को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन शुरू हुआ। शुरुआत में समर्थन सीमित था, लेकिन धीरे-धीरे युवा इससे जुड़ते गए। आंदोलन के नौवें दिन सामाजिक और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी इसमें शामिल हो गए। इसके बाद 20 जुलाई को संसद के मानसून सत्र के पहले दिन 'संसद चलो' मार्च का आह्वान किया गया। इस तरह सोशल मीडिया पर शुरू हुआ अभियान जमीनी आंदोलन में बदल गया।
क्या है यह 3.5% नियम?
अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक एरिका चेनोवेथ और मारिया जे. स्टीफन की किताब 'नागरिक प्रतिरोध क्यों सफल होता है: अहिंसक संघर्ष की रणनीतिक ताकत' में इस रूल का जिक्र किया गया है। चेनोवेथ और स्टीफन ने दुनिया में हुए हिंसक और अहिंसक आंदोलनों का अध्ययन किया। इसके लिए तैयार किए गए आंकड़ों में 1900 से 2006 के बीच हुए 323 बड़े आंदोलनों को शामिल किया गया। इन आंदोलनों का मुख्य उद्देश्य किसी राष्ट्रीय सरकार को सत्ता से हटाना या किसी क्षेत्र को स्वतंत्र कराना था।
चेनोवेथ ने पाया कि जिन आंदोलनों में अपने सबसे बड़े प्रदर्शन के दौरान देश की कम से कम 3.5% आबादी ने सक्रिय भागीदारी की थी, वे सभी सफल हुए थे। इस स्तर की भागीदारी हासिल करने वाले आंदोलन मुख्य रूप से अहिंसक थे। इसी पैटर्न को बाद में 3.5% नियम कहा जाने लगा।
3.5% का आंकड़ा आया कहां से?
यह कोई पहले से तय किया गया आंकड़ा नहीं था। चेनोवेथ ने आंदोलन के सबसे बड़े प्रदर्शन में शामिल लोगों की संख्या को उस देश की आबादी से भाग देकर हिस्सेदारी निकाली। इसी दौरान उन्होंने देखा कि 3.5% या उससे ज्यादा भागीदारी वाले आंदोलन सफल हुए थे। उन्होंने 2013 में पहली बार सार्वजनिक रूप से इस आंकड़े को पेश किया। अगर भारत की 2026 की अनुमानित 147 करोड़ आबादी पर यही गणना करें, तो करीब पांच करोड़ लोग होते हैं।
सोशल मीडिया समर्थन नहीं, सक्रिय भागीदारी जरूरी
3.5% नियम में पूरे आंदोलन के दौरान कभी न कभी उससे जुड़े सभी लोगों को नहीं गिना जाता। इसमें आंदोलन के सबसे बड़े एकल प्रदर्शन में शामिल लोगों की संख्या देखी गई थी। यानी अलग-अलग दिनों में जुटी भीड़ को जोड़कर 3.5% नहीं निकाला जा सकता। इसलिए किसी आंदोलन के सोशल मीडिया अनुयायियों, पोस्ट पसंद करने वालों या ऑनलाइन समर्थन करने वालों की संख्या को सीधे सक्रिय भागीदारी नहीं माना जा सकता।
क्या 3.5% लोग जुटे तो जीत तय है?
नहीं। एरिका चेनोवेथ खुद स्पष्ट करती हैं कि 3.5% कोई पक्का नियम या जीत का फॉर्मूला नहीं है। यह पुराने आंदोलनों के अध्ययन में दिखाई दिया एक सामान्य पैटर्न है। आंदोलन की सफलता के लिए संख्या के साथ उसकी रफ्तार, संगठन, रणनीतिक नेतृत्व और लंबे समय तक टिके रहने की क्षमता भी महत्वपूर्ण है।
दिलचस्प बात यह है कि सफल हुए बड़े अहिंसक आंदोलनों में 83% ने 3.5% की सीमा पार किए बिना ही सफलता हासिल कर ली थी। इसलिए 3.5% को सफलता के लिए जरूरी न्यूनतम संख्या भी नहीं माना जा सकता।
फिर संख्या इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
बड़ी भागीदारी से सरकार पर कई स्तरों पर दबाव बन सकता है। बड़े प्रदर्शन सामान्य और आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं। आंदोलन में लाखों लोगों की सक्रिय भागीदारी यह संकेत भी दे सकती है कि समाज में उसका समर्थन प्रदर्शनकारियों की संख्या से कहीं ज्यादा है। अहिंसक आंदोलन में अलग-अलग उम्र, पेशे और सामाजिक समूहों के लोग शामिल हो सकते हैं।
इसके अलावा आंदोलन बड़ा होने पर राजनीतिक, कारोबारी, मीडिया और दूसरे प्रभावशाली समूह भी सरकार से दूरी बना सकते हैं। चेनोवेथ की रिसर्च में सत्ता का समर्थन करने वाले समूहों का पाला बदलना सफल आंदोलनों का महत्वपूर्ण कारण माना गया है।
कहां-कहां देखी गई सफलता?
3.5% रूल के पीछे की सोच को पोलैंड के सॉलिडैरिटी मूवमेंट से समझा जा सकता है। 1980 में पोलैंड के गडांस्क शहर में जहाज बनाने वाले मजदूरों ने स्वतंत्र यूनियन, बेहतर कामकाजी परिस्थितियों और राजनीतिक सुधारों की मांग को लेकर हड़ताल शुरू की। लेक वालेसा के नेतृत्व में शुरू हुआ यह विरोध जल्द ही बड़े आंदोलन में बदल गया। कुछ ही महीनों में सॉलिडैरिटी मूवमेंट के करीब एक करोड़ सदस्य हो गए। यह संख्या पोलैंड के कुल वर्कफोर्स के करीब एक-तिहाई के बराबर थी। खास बात यह थी कि इसमें सिर्फ मजदूर नहीं थे। बुद्धिजीवी, कैथोलिक और कम्युनिस्ट शासन के विरोधी भी आंदोलन का हिस्सा बन गए। सरकारी कार्रवाई के बावजूद आंदोलन जारी रहा। आखिरकार 1989 में बातचीत हुई, जिसके बाद आंशिक रूप से स्वतंत्र चुनाव कराए गए और सॉलिडैरिटी को राजनीतिक पार्टी के रूप में मान्यता मिली। उसी साल सॉलिडैरिटी ने इतनी संसदीय सीटें जीतीं कि वह सरकार का नेतृत्व कर सके। अगले साल पोलैंड में कम्युनिस्ट शासन समाप्त हो गया और 1990 में वालेसा राष्ट्रपति बने।
फिलीपींस में तीन दिन में सत्ता छोड़नी पड़ी
फिलीपींस का 1986 का आंदोलन भी अहिंसक जनभागीदारी का बड़ा उदाहरण है। 22 फरवरी 1986 को राजधानी मनीला में लाखों लोग तत्कालीन राष्ट्रपति फर्डिनांड मार्कोस के खिलाफ सड़कों पर उतर आए। मार्कोस करीब दो दशक से सत्ता में थे। विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा और महज तीन दिन बाद 25 फरवरी को मार्कोस को सत्ता छोड़नी पड़ी। फिलीपींस भी उन जगहों में शामिल है, जिनके अहिंसक प्रतिरोध का जिक्र चेनोवेथ और स्टीफन की रिसर्च में मिलता है।
6% से ज्यादा लोग जुटे, फिर भी आंदोलन असफल
3.5% नियम की सीमा समझने के लिए बहरीन का उदाहरण महत्वपूर्ण है। 2011 से 2014 के बीच वहां किंग हमद के खिलाफ आंदोलन हुआ। एक बड़े प्रदर्शन में करीब एक लाख लोगों ने हिस्सा लिया, जो देश की आबादी के 6% से ज्यादा थे। इसके बावजूद आंदोलन अपने मुख्य लक्ष्य में सफल नहीं हुआ। चेनोवेथ के मुताबिक बहरीन की सरकार को बाहरी सैन्य समर्थन मिला और बड़े पैमाने की जनभागीदारी लंबे समय तक कायम नहीं रह सकी। यह उदाहरण दिखाता है कि केवल 3.5% की सीमा पार करना सफलता की गारंटी नहीं है।
क्या हर आंदोलन पर लागू होता है 3.5% नियम?
नहीं। यह सबसे महत्वपूर्ण सीमा है। जिस रिसर्च से 3.5% का आंकड़ा निकला, उसमें मुख्य रूप से सरकार को सत्ता से हटाने या क्षेत्रीय स्वतंत्रता हासिल करने वाले आंदोलन शामिल थे। चेनोवेथ के मुताबिक शिक्षा, जलवायु, अधिकारों, स्थानीय सरकार, कंपनियों या शैक्षणिक संस्थानों से जुड़े आंदोलनों में भी यही 3.5% का आंकड़ा लागू होगा या नहीं, यह बताने के लिए पर्याप्त विश्वसनीय आंकड़े मौजूद नहीं हैं।
क्या भारत के युवाओं का आंदोलन 3.5% नियम पर फिट बैठता है?
आंदोलन को सीधे 3.5% नियम का उदाहरण मानना सही नहीं होगा। पहली वजह यह है कि ऑनलाइन समर्थकों को सक्रिय प्रदर्शनकारियों में नहीं गिना जा सकता। दूसरी, आंदोलन के सबसे बड़े एकल प्रदर्शन में कितने लोग शामिल हुए, इसका विश्वसनीय आंकड़ा जरूरी है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस आंदोलन की मांगें शिक्षा व्यवस्था, बेरोजगारी, पेपर लीक और शिक्षा मंत्री को हटाने जैसे मुद्दों से जुड़ी थीं। जबकि 3.5% नियम मूल रूप से सरकार को सत्ता से हटाने या क्षेत्रीय स्वतंत्रता हासिल करने वाले आंदोलनों के अध्ययन से निकला है। इसलिए इसे सीधे लागू नहीं किया जा सकता। हालांकि इस आंदोलन में रिसर्च से मेल खाती कुछ बातें जरूर दिखाई देती हैं, ऑनलाइन अभियान का सड़क तक पहुंचना, समय के साथ लोगों का जुड़ना और दूसरे समूहों का समर्थन मिलना।