कर्नाटक में कब पूरे होंगे वादे?: दांव पर बीमारी से जूझ रहे हजारों बच्चों की जान, BJP ने कांग्रेस को कैसे घेरा?
कर्नाटक विधानसभा में विपक्ष के नेता आर. अशोक ने कांग्रेस सरकार पर टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित बच्चों के लिए घोषित मुफ्त इंसुलिन योजना लागू करने में देरी का आरोप लगाया है। उनका दावा है कि 7,000 से अधिक बच्चे इंसुलिन का इंतजार कर रहे हैं और कई परिवार इलाज का खर्च नहीं उठा पा रहे हैं।
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कर्नाटक में टाइप-1 डायबिटीज़ से पीड़ित बच्चों के लिए घोषित मुफ्त इंसुलिन योजना को लेकर सियासत तेज हो गई है। विधानसभा में विपक्ष के नेता आर. अशोक ने कांग्रेस सरकार पर बजट में किए गए वादे को अब तक लागू नहीं करने का आरोप लगाया है। उनका दावा है कि योजना में देरी के कारण 7,000 से अधिक बच्चे मुफ्त इंसुलिन का इंतजार कर रहे हैं, जबकि कई गरीब परिवार इलाज का खर्च उठाने में असमर्थ हैं। बीजेपी ने इसे सरकार की प्रशासनिक विफलता बताया है और साथ ही मिड-डे मील योजना में चावल की आपूर्ति में देरी को लेकर भी सरकार पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
बजट में घोषणा के बाद भी शुरू नहीं हो सकी योजना
अशोक ने कड़े शब्दों में कहा कि सरकार ने कई महीने पहले टाइप-1 डायबिटीज़ से पीड़ित 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को मुफ्त इंसुलिन उपलब्ध कराने की योजना की घोषणा की थी, लेकिन अब तक इसे ज़मीन पर लागू नहीं किया गया। उनका कहना है कि यह घोषणा सिर्फ बजट तक ही सीमित रह गई।
क्या सरकार प्रचार में व्यस्त रही?
मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार पर निशाना साधते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने यह घोषणा केवल प्रचार पाने के लिए की थी, लेकिन इसे अमल में लाने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की। अशोक ने कहा कि एक ओर सरकार विज्ञापन और प्रचार पर भारी खर्च कर रही है, वहीं दूसरी ओर गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार हर महीने 2,000 से 5,000 रुपये तक का इंसुलिन खर्च उठाने को मजबूर हैं।
योजना अटकने की सबसे बड़ी वजह क्या है?
अशोक ने इस देरी के लिए कर्नाटक राज्य चिकित्सा आपूर्ति निगम लिमिटेड (KSMSCL) के अधिकारियों की कथित लापरवाही और टेंडर प्रक्रिया में हुई देरी को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या मुख्यमंत्री का अपने मंत्रियों, अधिकारियों और प्रशासन पर कोई प्रभावी नियंत्रण है। उनके अनुसार प्रशासनिक विफलता के कारण ही यह योजना अब तक लागू नहीं हो सकी।
कितने बच्चे कर रहे मुफ्त इंसुलिन का इंतजार?
बीजेपी नेता ने दावा किया कि पूरे कर्नाटक में टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित 7,000 से अधिक बच्चे मुफ्त इंसुलिन मिलने का इंतजार कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि आर्थिक रूप से कमजोर कई परिवार इलाज का खर्च नहीं उठा पाने के कारण अपने बच्चों की इंसुलिन की खुराक तक कम करने को मजबूर हैं, जिससे उनकी जान पर गंभीर खतरा पैदा हो गया है।
क्या सरकारी अस्पतालों को नहीं मिल रही इंसुलिन?
अशोक ने आरोप लगाया कि बेंगलुरु स्थित इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हेल्थ और KIDS हॉस्पिटल सहित कई सरकारी अस्पतालों को हजारों पंजीकृत बच्चों का इलाज करने के बावजूद इंसुलिन की आपूर्ति नहीं मिली है। उनका दावा है कि कुछ अस्पतालों को जरूरत पूरी करने के लिए गैर-सरकारी संगठनों (NGO) की मदद लेनी पड़ रही है।
सरकार अपनी ही बजट घोषणा निभाने में नाकाम रही?
सरकार की प्रतिबद्धता पर सवाल उठाते हुए अशोक ने कहा कि प्रशासनिक अक्षमता, टेंडर प्रक्रिया में देरी और विभागों के बीच तालमेल की कमी के कारण यह योजना अब तक शुरू नहीं हो सकी है। उन्होंने मुख्यमंत्री से तत्काल टेंडर प्रक्रिया पूरी कर पात्र बच्चों को मुफ्त इंसुलिन उपलब्ध कराने की मांग की और चेतावनी दी कि आगे भी देरी हुई तो इसका सबसे ज्यादा नुकसान गरीब परिवारों को उठाना पड़ेगा।
क्या मिड-डे मील योजना में भी फेल हो गई सरकार?
विपक्ष के नेता ने कर्नाटक सरकार पर 9वीं और 10वीं कक्षा के विद्यार्थियों के लिए मिड-डे मील योजना के तहत चावल की आपूर्ति में देरी का भी आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि नया शैक्षणिक सत्र शुरू हुए डेढ़ महीने से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन अब तक चावल की कमी बनी हुई है।
किन्हें खिलाया जा रहा प्राथमिक स्कूल के हिस्से का चावल?
अशोक ने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार हाई स्कूल के छात्रों के लिए चावल उपलब्ध कराने में विफल रही है। इसके चलते स्कूलों को 9वीं और 10वीं कक्षा के विद्यार्थियों का भोजन तैयार करने के लिए प्राथमिक कक्षाओं (1 से 8) के छात्रों के हिस्से का चावल इस्तेमाल करना पड़ रहा है।
क्या सरकारी स्कूलों के बच्चों का भोजन भी अब व्यवस्था के भरोसे?
मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार को संबोधित करते हुए अशोक ने सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के भोजन की व्यवस्था पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि समय पर आपूर्ति न होने का सबसे अधिक असर गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के उन बच्चों पर पड़ा है, जो मिड-डे मील योजना पर निर्भर हैं।
क्या अधिकारी रहे निष्क्रिय?
बीजेपी नेता ने आरोप लगाया कि वित्त विभाग से मंजूरी मिलने और स्कूल शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव द्वारा 15 जून को अधिकारियों को पत्र लिखे जाने के बावजूद शिक्षा विभाग के आयुक्त ने चावल की समय पर खरीद और वितरण सुनिश्चित करने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया।
क्या टल सकता था संकट?
अशोक ने दावा किया कि राज्य सरकार ने पहले से कोई ठोस तैयारी नहीं की, जबकि अधिकारियों को मालूम था कि चावल की खरीद और उसकी आपूर्ति में कम से कम 15 दिन का समय लगता है। उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकारियों को खुद इस बात की आशंका थी कि जुलाई के अंत तक भी हाई स्कूलों में नया स्टॉक पहुंच पाएगा या नहीं। उन्होंने कहा कि प्राथमिक विद्यालयों के छात्रों के लिए निर्धारित चावल का इस्तेमाल बड़े छात्रों के भोजन में किया जा रहा है। यदि यही स्थिति जारी रही तो जल्द ही छोटे बच्चों के लिए भी चावल की कमी पैदा हो सकती है।
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क्या सरकार ने कोई सबक नहीं लिया?
मिड-डे मील योजना में पिछले वर्ष खराब गुणवत्ता वाली अरहर दाल की आपूर्ति को लेकर हुए विवाद का उल्लेख करते हुए अशोक ने आरोप लगाया कि सरकार एक बार फिर स्कूली बच्चों को गुणवत्तापूर्ण और समय पर भोजन उपलब्ध कराने में विफल साबित हुई है। उन्होंने मुख्यमंत्री से तत्काल हस्तक्षेप कर हाई स्कूलों में चावल की आपूर्ति सुनिश्चित करने और मिड-डे मील योजना को बिना किसी बाधा के जारी रखने की अपील की।