Explainer: एफसीआरए संशोधन पर क्यों उठ रहे हैं सवाल? क्या हैं नए नियम और सरकार का क्या है पक्ष?
एफसीआरए संशोधन पर अब देश के साथ-साथ अमेरिका में भी बहस छिड़ गई है। अमेरिकी सांसदों की टिप्पणियों के बाद यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय चर्चा में आ गया है। सरकार का कहना है कि प्रस्तावित बदलाव केवल पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए हैं, जबकि विपक्ष का आरोप है कि इससे केंद्र सरकार के अधिकार बढ़ेंगे और कुछ धार्मिक व अल्पसंख्यक संस्थाएं प्रभावित हो सकती हैं। फिलहाल विधेयक संसद के विचाराधीन है, जबकि नए एफसीआरए नियम लागू हो चुके हैं। आइए विस्तार से जानते हैं।
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विस्तार
भारत में विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने वाले कानून विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) में प्रस्तावित संशोधन इन दिनों चर्चा में है। इसकी वजह सिर्फ देश के भीतर की बहस नहीं, बल्कि अमेरिका की प्रतिक्रिया भी है। विपक्ष, सरकार और अब अमेरिकी सांसदों की टिप्पणियों के बाद यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सुर्खियों में है।
ऐसे में सवाल उठता है कि एफसीआरए क्या है? इसमें क्या बदलाव प्रस्तावित हैं? क्या बदलाव लागू हो चुके हैं? इसे लेकर क्या भ्रम है? सरकार का क्या कहना है? आइए जानते हैं...
अभी चर्चा में क्यों है एफसीआरए?
अमेरिका के वेस्ट वर्जीनिया से रिपब्लिकन सांसद राइली मूर ने मंगलवार को एफसीआरए में प्रस्तावित संशोधनों पर चिंता जताई है। उनका दावा है कि इन बदलावों से भारत सरकार को चर्च और धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन में दखल देने का अधिकार मिल सकता है। उन्होंने इसे ईसाई समुदाय पर हमला बताते हुए कहा कि अगर विधेयक मौजूदा स्वरूप में पारित होता है तो इसका असर भारत-अमेरिका संबंधों पर भी पड़ सकता है।
वहीं, सीपीआई(एम) सांसद जॉन ब्रिटास ने अमेरिकी सांसद की टिप्पणी का विरोध करते हुए इसे भारत का आंतरिक मामला बताया। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पार्टी पहले से एफसीआर के कड़े प्रावधानों का विरोध करती रही है।
विपक्ष को क्या आपत्ति है?
केरल के मुख्यमंत्री वीडी सतीशन ने बीते अप्रैल में आरोप लगाया था कि प्रस्तावित एफसीआरए संशोधन से केंद्र सरकार को किसी संस्था का एफसीआरए लाइसेंस नवीनीकरण न करने और उसके बाद विदेशी फंड से बनी संपत्तियों पर नियंत्रण स्थापित करने की शक्ति मिल सकती है। उनका दावा था कि इससे चर्च, ईसाई शैक्षणिक संस्थानों और अन्य अल्पसंख्यक संस्थाओं के हित प्रभावित हो सकते हैं।
वहीं, तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने भी विधेयक का विरोध करते हुए कहा था कि यह ईसाई और अन्य अल्पसंख्यक संस्थानों को प्रभावित कर सकता है। उनका आरोप है कि मामूली प्रक्रियागत चूक के आधार पर पंजीकरण रद्द होने की स्थिति में स्कूल, कॉलेज, अस्पताल और अनाथालय जैसी संस्थाओं की संपत्तियां भी प्रभावित हो सकती हैं।
एफसीआरए क्या है?
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, यानी एफसीआरए कानून तय करता है कि भारत में कोई एनजीओ, ट्रस्ट, शैक्षणिक संस्थान, धार्मिक संगठन, कंपनी या व्यक्ति विदेश से मिलने वाला धन किन शर्तों पर प्राप्त कर सकता है और उसका उपयोग कैसे करेगा।
इस कानून का मुख्य उद्देश्य विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता लाना, उसके उपयोग की निगरानी करना और यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी धन का इस्तेमाल भारत की संप्रभुता, राष्ट्रीय सुरक्षा, लोकतांत्रिक संस्थाओं या सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाले कार्यों में न हो। इस कानून का संचालन गृह मंत्रालय करता है।
एफसीआरए में अब तक कब-कब बदलाव हुए?
- भारत में पहली बार एफसीआरए वर्ष 1976 में लागू किया गया था।
- बाद में विदेशी फंडिंग के बढ़ते दायरे और बदलती परिस्थितियों को देखते हुए 2010 में नया एफसीआरए कानून लाया गया। - इसके बाद 2016, 2018 और 2020 में भी इसमें संशोधन किए गए।
- अब 2026 में सरकार नया संशोधन विधेयक लेकर आई है और नए नियम भी अधिसूचित कर चुकी है।
2026 के संशोधन में क्या जोड़ा गया है?
विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था और फिलहाल यह संसद के विचाराधीन है। वहीं, एफसीआरए नियम, 2026 को 22 जून 2026 को अधिसूचित किया जा चुका है और ये लागू हो चुके हैं।
सरकार के अनुसार, विधेयक और नए नियमों का उद्देश्य पिछले कुछ वर्षों में कानून के क्रियान्वयन के दौरान सामने आई प्रशासनिक और प्रक्रियागत कमियों को दूर करना है। सरकार का कहना है कि इन बदलावों से एफसीआरए के मूल ढांचे में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं किया गया है, बल्कि 2010 से लागू व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और प्रभावी बनाने के लिए प्रशासनिक एवं सुशासन से जुड़े प्रावधानों को मजबूत किया गया है।
अभी एफसीआरए के तहत क्या नियम हैं?
- विदेशी अंशदान प्राप्त करने के लिए किसी संस्था को एफसीआरए पंजीकरण या पूर्व अनुमति लेनी होती है।
- विदेशी धन सबसे पहले एसबीआई की नई दिल्ली मुख्य शाखा में खोले गए निर्धारित खाते में आता है।
- इसके बाद संस्था उसे अपने अधिकृत खातों में स्थानांतरित कर सकती है।
- हर साल संस्था को ऑडिट रिपोर्ट, विदेशी दानदाताओं की जानकारी और धन के उपयोग का पूरा विवरण सरकार को देना होता है।
- पंजीकरण पांच साल के लिए मान्य होता है और समय-समय पर उसका नवीनीकरण कराना पड़ता है।
- कानून के तहत चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार, सांसद-विधायक, सरकारी कर्मचारी, न्यायाधीश और कुछ अन्य श्रेणियों के लोग विदेशी अंशदान नहीं ले सकते।
2026 के प्रस्तावित संशोधन में क्या-क्या बदलाव हैं?
1. विदेशी फंड से बनी संपत्तियों के लिए नामित प्राधिकारी
अगर किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण रद्द, समाप्त या सरेंडर हो जाता है, तो विदेशी अंशदान से बनी संपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक नामित प्राधिकारी बनाई जाएगी। अगर संस्था बाद में दोबारा पंजीकरण हासिल कर लेती है तो उसकी संपत्ति वापस कर दी जाएगी। अगर पंजीकरण बहाल नहीं होता, तभी तय प्रक्रिया के बाद संपत्ति स्थायी रूप से सरकार के नियंत्रण में जाएगी।
2. धार्मिक स्थलों की सुरक्षा
सरकार का कहना है कि किसी भी धार्मिक स्थल का धार्मिक स्वरूप नहीं बदला जा सकेगा। चर्च, मंदिर, मस्जिद या अन्य धार्मिक संस्थानों की धार्मिक पहचान कानून के तहत सुरक्षित रहेगी।
3. अपील का अधिकार
अगर कोई संस्था नामित प्राधिकारी के फैसले से असहमत होती है तो उसे पहले पुनर्विचार और फिर जिला न्यायालय में अपील करने का अधिकार होगा।
4. पंजीकरण स्वतः समाप्त होने का प्रावधान
अगर कोई संस्था समय पर एफसीआरए पंजीकरण का नवीनीकरण नहीं कराती तो उसका पंजीकरण स्वतः समाप्त माना जाएगा।
5. सजा में बदलाव
एफसीआरए उल्लंघन के मामलों में अधिकतम सजा पांच साल से घटाकर एक साल करने का प्रस्ताव है।
6. जांच के नियम
राज्य सरकारों और उनकी एजेंसियों को एफसीआरए से जुड़े मामलों में जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की मंजूरी लेनी होगी।
नए नियमों में क्या बदलाव लागू हो चुके हैं?
1. उद्देश्य और राज्य के आधार पर पंजीकरण
- अब एफसीआरए पंजीकरण में संस्था को स्पष्ट रूप से बताना होगा कि वह विदेशी अंशदान किस उद्देश्य के लिए प्राप्त करेगी।
- साथ ही यह भी बताना होगा कि उसका काम किन राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों में होगा।
- पहले सामान्य श्रेणियों में अनुमति मिल जाती थी, लेकिन अब गतिविधियों और राज्यों के हिसाब से अलग-अलग और स्पष्ट अनुमति दी जाएगी।
- पहले से पंजीकृत संस्थाओं को भी एक वर्ष के भीतर बताना होगा कि वे किन उद्देश्यों और किन राज्यों के लिए अपना पंजीकरण जारी रखना चाहती हैं।
2. धार्मिक गतिविधियों को लेकर स्पष्ट नियम
- नए नियमों में पहली बार यह स्पष्ट किया गया है कि विदेशी अंशदान किन-किन धार्मिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
- इसका उद्देश्य सभी धर्मों से जुड़े संगठनों के लिए नियमों को स्पष्ट करना है, ताकि उन्हें यह पता हो कि कौन-सी धार्मिक गतिविधियां विदेशी फंडिंग के दायरे में आएंगी।
3. पंजीकरण के नवीनीकरण के लिए न्यूनतम खर्च की शर्त
- एफसीआरए पंजीकरण का नवीनीकरण कराने वाले एनजीओ को यह दिखाना होगा कि उसने पिछले दो वर्षों में विदेशी अंशदान से कम-से-कम 10 लाख रुपये का उपयोग किया है।
- सरकार का कहना है कि इससे केवल सक्रिय और वास्तव में काम करने वाले संगठनों का ही पंजीकरण जारी रहेगा, जबकि निष्क्रिय संस्थाओं की पहचान हो सकेगी।
4. रिपोर्टिंग के नियम और सख्त हुए
- अब वार्षिक रिटर्न में परियोजना-वार और गतिविधि-वार खर्च का पूरा विवरण देना होगा।
- संस्था को अपनी आधिकारिक वेबसाइट और सोशल मीडिया खातों की जानकारी भी देनी होगी।
- अगर विदेशी धन किसी मध्यस्थ संस्था के माध्यम से मिला है, तब भी अंतिम विदेशी दानदाता की पूरी जानकारी देना अनिवार्य होगा।
- सरकार का कहना है कि इन बदलावों का उद्देश्य विदेशी फंडिंग में अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है।
एफसीआरए से जुड़े प्रमुख आंकड़े
- विदेशी अंशदान: वर्ष 2024-25 में देश की करीब 16,200 सक्रिय एफसीआरए-पंजीकृत संस्थाओं को लगभग 22,963 करोड़ रुपये का विदेशी अंशदान प्राप्त हुआ। गृह मंत्रालय का कहना है कि यह दर्शाता है कि एफसीआरए विदेशी अंशदान पर रोक लगाने वाला नहीं, बल्कि उसके पंजीकरण, उपयोग और निगरानी को विनियमित करने वाला कानून है।
- रद्द हुए पंजीकरण: पिछले एक दशक में करीब 22,000 संस्थाओं के एफसीआरए पंजीकरण रद्द किए जा चुके हैं।
- समाप्त हुए पंजीकरण: इसी अवधि में लगभग 15,000 संस्थाओं के एफसीआरए पंजीकरण की अवधि समाप्त हो चुकी है। इनमें समय पर नवीनीकरण नहीं कराने वाले मामले भी शामिल हैं।
- पंजीकरण की वैधता: एफसीआरए के तहत दिया गया पंजीकरण पांच वर्ष के लिए मान्य होता है। इसके बाद संस्था को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उसका नवीनीकरण कराना होता है।
- प्रशासनिक खर्च की सीमा: एफसीआरए के तहत प्राप्त विदेशी अंशदान का अधिकतम 20 प्रतिशत ही प्रशासनिक खर्च पर किया जा सकता है, जबकि कम-से-कम 80 प्रतिशत राशि घोषित उद्देश्यों और परियोजनाओं पर खर्च करना अनिवार्य है।
- कुल संस्थाओं में हिस्सेदारी: गृह मंत्रालय के अनुमान के अनुसार, एफसीआरए के तहत पंजीकृत संस्थाएं देश में कार्यरत कुल गैर-सरकारी संस्थाओं के एक प्रतिशत से भी कम हैं।