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कौन बनेगा करोड़पति में क्यों पूछा गया ये सवाल!
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Thu, 04 Oct 2018 05:00 PM IST
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भारत में किस मामले को सुप्रीम कोर्ट के 13 न्यायाधीशों की सबसे बड़ी संविधान बेंच द्वारा सुना गया था? जवाब है... केशवानंद भारती केस। यही सवाल केबीसी-10 में असम की बिनीता जैन से पूछा गया था जिसका जवाब देकर बिनीता जैन सीजन-10 की पहली करोड़पति विजेता बनीं और देशभर में उनकी चर्चा होने लगी।
लेकिन क्या आप केशवानंद भारती केस के बारे में जानते हैं? आखिर क्यों इस सवाल को शो में एक करोड़ के लिए पूछा गया? दरअसल इस सवाल का जवाब बेहद मुश्किल था क्योंकि केशवानंद भारती केस के बारें मे कम ही लोग जानते हैं।
ये है केशवानंद भारती केस का इतिहास
24 अप्रैल 1973 को सुप्रीम कोर्ट ने ‘केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य’ मामले में फैसला दिया था। पिछले 45 वर्षों से ये तारीख भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। यह देश के इतिहास में पहला और आखिरी मामला था जब सुनवाई के लिए 13 जजों की पीठ का गठन हुआ।
इससे पहले और आज तक किसी भी मामले में इतनी संख्या में जजों ने फैसला नहीं सुनाया है। इस पीठ ने अक्टूबर 1972 और मार्च 1973 के बीच करीब 70 दिनों तक सुनवाई की। सैकड़ों मामलों और 71 देशों के संविधानों का अध्ययन किया। इसके बाद 13 जजों की पीठ ने करीब 700 पन्नों का फैसला सुनाया।
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लेकिन क्या आप केशवानंद भारती केस के बारे में जानते हैं? आखिर क्यों इस सवाल को शो में एक करोड़ के लिए पूछा गया? दरअसल इस सवाल का जवाब बेहद मुश्किल था क्योंकि केशवानंद भारती केस के बारें मे कम ही लोग जानते हैं।
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ये है केशवानंद भारती केस का इतिहास
24 अप्रैल 1973 को सुप्रीम कोर्ट ने ‘केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य’ मामले में फैसला दिया था। पिछले 45 वर्षों से ये तारीख भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। यह देश के इतिहास में पहला और आखिरी मामला था जब सुनवाई के लिए 13 जजों की पीठ का गठन हुआ।
इससे पहले और आज तक किसी भी मामले में इतनी संख्या में जजों ने फैसला नहीं सुनाया है। इस पीठ ने अक्टूबर 1972 और मार्च 1973 के बीच करीब 70 दिनों तक सुनवाई की। सैकड़ों मामलों और 71 देशों के संविधानों का अध्ययन किया। इसके बाद 13 जजों की पीठ ने करीब 700 पन्नों का फैसला सुनाया।
आखिर क्यों केशवानंद भारती को कोर्ट जाना पड़ा?
Supreme Court
केशवानंद भारती मामले को समझने के लिए उस दौर के राजनैतिक परिदृश्य को समझना होगा। केशवानंद भारती मामले की भूमिका 1967 में लिखनी शुरू हुई। 1967 में सुप्रीम कोर्ट ने गोलकनाथ मामले में एक अहम फैसला देते हुए कहा कि संसद के पास ये अधिकार नहीं है कि वह नागरिकों के मौलिक अधिकारों के साथ छेड़छाड़ कर सके।
इस फैसले के करीब ढाई साल बाद इंदिरा गांधी ने देश के 14 बड़े बैंकों के राष्ट्रीयकरण, रजवाड़ों को मिलने वाले ‘प्रिवी पर्स’ को समाप्त करने का फैसला लिया। इंदिरा सरकार के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
गोलकनाथ केस, बैंकों का राष्ट्रीकरण और प्रिवी पर्स में इंदिरा गांधी सरकार को सुप्रीम कोर्ट में हार झेलनी पड़ी। इन तीन फैसलों में हार से परेशान इंदिरा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्टों पर लगाम लगाने के मकसद से एक-एक कर संविधान में संशोधन के जरिये सुप्रीम कोर्ट के तीनों फैसलों को रद्द कर दिया। इन संशोधनों से विधायिका ज्यादा ताकतवर हो गयी। वह नागरिकों के मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती थी और उन्हे निरस्त तक कर सकती थी।
कौन थे केशवानंद भारती
केशवानंद भारती केरल के एक धार्मिक मठ के प्रमुख थे। केरल सरकार ने मठ प्रबंधन के उनके अधिकारों को सीमित कर दिया था। इसी के खिलाफ वे सुप्रीम कोर्ट पहुंचे गए। केरल में कासरगोड़ सदियों पुराना शैव मठ है जो एडनीर में बना है। ये मठ 9वीं सदी के संत और अद्वैत वेदांत दर्शन के प्रणेता आदिगुरु शंकराचार्य से जुड़ा है।
शंकराचार्य के चार शुरुआती शिष्यों में से एक तोतकाचार्य की परंपरा में इस मठ को स्थापित किया गया था। इस मठ का इतिहास करीब 1,200 साल पुराना है। इसी मठ के प्रमुख थे केशवानंद भारती। इस मामले में एनए पालकीवाला, धार्मिक मठ के प्रमुख केशवानंद भारती की पैरवी कर रहे थे। पालकीवाला ने गोलकनाथ केस, बैंकों का राष्ट्रीकरण और प्रिवी पर्स मामले में भी सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी जिनकी वजह से इंदिरा सरकार को हार का सामना करना पड़ा था।
इस फैसले के करीब ढाई साल बाद इंदिरा गांधी ने देश के 14 बड़े बैंकों के राष्ट्रीयकरण, रजवाड़ों को मिलने वाले ‘प्रिवी पर्स’ को समाप्त करने का फैसला लिया। इंदिरा सरकार के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
गोलकनाथ केस, बैंकों का राष्ट्रीकरण और प्रिवी पर्स में इंदिरा गांधी सरकार को सुप्रीम कोर्ट में हार झेलनी पड़ी। इन तीन फैसलों में हार से परेशान इंदिरा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्टों पर लगाम लगाने के मकसद से एक-एक कर संविधान में संशोधन के जरिये सुप्रीम कोर्ट के तीनों फैसलों को रद्द कर दिया। इन संशोधनों से विधायिका ज्यादा ताकतवर हो गयी। वह नागरिकों के मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती थी और उन्हे निरस्त तक कर सकती थी।
कौन थे केशवानंद भारती
केशवानंद भारती केरल के एक धार्मिक मठ के प्रमुख थे। केरल सरकार ने मठ प्रबंधन के उनके अधिकारों को सीमित कर दिया था। इसी के खिलाफ वे सुप्रीम कोर्ट पहुंचे गए। केरल में कासरगोड़ सदियों पुराना शैव मठ है जो एडनीर में बना है। ये मठ 9वीं सदी के संत और अद्वैत वेदांत दर्शन के प्रणेता आदिगुरु शंकराचार्य से जुड़ा है।
शंकराचार्य के चार शुरुआती शिष्यों में से एक तोतकाचार्य की परंपरा में इस मठ को स्थापित किया गया था। इस मठ का इतिहास करीब 1,200 साल पुराना है। इसी मठ के प्रमुख थे केशवानंद भारती। इस मामले में एनए पालकीवाला, धार्मिक मठ के प्रमुख केशवानंद भारती की पैरवी कर रहे थे। पालकीवाला ने गोलकनाथ केस, बैंकों का राष्ट्रीकरण और प्रिवी पर्स मामले में भी सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी जिनकी वजह से इंदिरा सरकार को हार का सामना करना पड़ा था।
आखिर क्यों पड़ी 13 जजों की जरूरत
केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या संसद के पास संविधान को किसी भी हद तक संशोधित करने का अधिकार है? क्या संसद नागरिकों के मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है? इन्हीं सवालों का जवाब केशवानंद भारती मामले में 13 जजों को खोजना था। पहले ही गोलकनाथ मामले में 11 जजों की पीठ फैसला दे चुकी थी कि संसद मौलिक अधिकारों से छेड़छाड़ नहीं कर सकती।
इसी मुद्दे पर कोई नया फैसला लेने के लिए 11 जजों से भी बड़ी पीठ के गठन की जरूरत थी। इसलिए मुख्य न्यायाधीश सर्व मित्र सीकरी की अध्यक्षता में देश के इतिहास में पहली बार 13 जजों की एक बेंच का गठन हुआ और शुरु हुई केशवानंद भारती मामले की सुनवाई
करीब 70 दिनों की बहस के बाद 24 अप्रैल 1973 को कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। सात जजों ने पक्ष में फैसला दिया और छह जजों ने विपक्ष में। इस फैसले में छह के मुकाबले सात के बहुमत से जजों ने गोलकनाथ मामले के फैसले को पलट दिया। यानी न्यायालय ने माना कि संसद मौलिक अधिकारों में भी संशोधन कर तो सकती है, लेकिन ऐसा कोई संशोधन नहीं कर सकती जिससे संविधान के मूलभूत ढांचे का मूल स्वरूप बदल जाए।
ये हैं सबसे बड़ी संविधान पीठ के जज
मुख्य न्यायाधीश सर्व मित्र सीकरी
जस्टिस जेएम शेलत
जस्टिस केएस हेगड़े
जस्टिस एन. ग्रोवर
जस्टिस एच.आर. खन्ना
जस्टिस ए एन. रे
जस्टिस जी. पालेकर
जस्टिस के मेथ्यू
जस्टिस बेग
जस्टिस जगमोहन रेड्डी
जस्टिस एन. द्विवेदी
जस्टिस वी. चंद्रचूड़
केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या संसद के पास संविधान को किसी भी हद तक संशोधित करने का अधिकार है? क्या संसद नागरिकों के मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है? इन्हीं सवालों का जवाब केशवानंद भारती मामले में 13 जजों को खोजना था। पहले ही गोलकनाथ मामले में 11 जजों की पीठ फैसला दे चुकी थी कि संसद मौलिक अधिकारों से छेड़छाड़ नहीं कर सकती।
इसी मुद्दे पर कोई नया फैसला लेने के लिए 11 जजों से भी बड़ी पीठ के गठन की जरूरत थी। इसलिए मुख्य न्यायाधीश सर्व मित्र सीकरी की अध्यक्षता में देश के इतिहास में पहली बार 13 जजों की एक बेंच का गठन हुआ और शुरु हुई केशवानंद भारती मामले की सुनवाई
करीब 70 दिनों की बहस के बाद 24 अप्रैल 1973 को कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। सात जजों ने पक्ष में फैसला दिया और छह जजों ने विपक्ष में। इस फैसले में छह के मुकाबले सात के बहुमत से जजों ने गोलकनाथ मामले के फैसले को पलट दिया। यानी न्यायालय ने माना कि संसद मौलिक अधिकारों में भी संशोधन कर तो सकती है, लेकिन ऐसा कोई संशोधन नहीं कर सकती जिससे संविधान के मूलभूत ढांचे का मूल स्वरूप बदल जाए।
ये हैं सबसे बड़ी संविधान पीठ के जज
मुख्य न्यायाधीश सर्व मित्र सीकरी
जस्टिस जेएम शेलत
जस्टिस केएस हेगड़े
जस्टिस एन. ग्रोवर
जस्टिस एच.आर. खन्ना
जस्टिस ए एन. रे
जस्टिस जी. पालेकर
जस्टिस के मेथ्यू
जस्टिस बेग
जस्टिस जगमोहन रेड्डी
जस्टिस एन. द्विवेदी
जस्टिस वी. चंद्रचूड़
