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Srinagar News: सूखे के कारण वुलर झील से जुड़े मछुआराें की आजीविका पर संकट
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- जलस्तर कम होने, जलीय फसलों की कटाई रुकने और मछलियां कम होने से आय के स्रोत हो रहे खत्म
भट शहजाद
बांदीपोरा। पिछले साल सितंबर में विनाशकारी बाढ़ के बाद लगातार सूखी सर्दी के मौसम ने वुलर झील पर निर्भर हजारों मछुआरों के लिए आजीविका का संकट खड़ा कर दिया है। यहां पानी का स्तर कम होने, जलीय फसलों की कटाई रुकने और मछलियों की संख्या कम होने से उनके आय के पारंपरिक स्रोत खत्म हो रहे हैं।
कई मछुआरे परिवार जो दशकों से वुलर झील पर निर्भर थे अब वैकल्पिक काम ढूंढ़ रहे हैं। वुलर झील सूख गई है जिस कारण सर्दियों के महीनों में मछली पकड़ने और सिंघाड़े निकालने के काम में कमी आई है। उत्तरी कश्मीर के बांदीपोरा जिले के कुलहामा गांव के निवासी असलम अहमद ने कहा कि उनके गांव की 90 प्रतिशत आबादी मछली पकड़ने अथवा सिंघाड़े निकालने के लिए झील पर निर्भर है लेकिन इस समय मछुआरे घर पर बैठे हुए हैं।
कुछ साल पहले जनवरी में एक मछुआरा आसानी से दिन में लगभग 500-600 रुपये कमा लेता था क्योंकि झील में पानी का स्तर अच्छा था जिससे उन्हें नियमित किनारों के पास आसानी से सिंघाड़े निकालने में मदद मिलती थी लेकिन अब जैसे-जैसे झील सूख रही है समुदाय के लिए परिवारों का पालन-पोषण करने में मुश्किलें आ रही हैं।
मोहम्मद रफीक का कहना है कि जैसे-जैसे झील में पानी का स्तर कम हो रहा है मछुआरे हर दिन बहुत कम या बिना मछली के घर लौट रहे हैं। कई सालों की अनुपस्थिति के बाद वुलर संरक्षण और प्रबंधन प्राधिकरण की ओर से ड्रेजिंग ऑपरेशन के बाद कमल के तने फिर से दिखाई देने लगे जिससे आर्थिक पुनरुद्धार की उम्मीदें जगी हैं।
हालांकि सितंबर में आई बाढ़ ने निचले इलाकों को जलमग्न कर दिया जिससे पौधे परिपक्व होने से पहले ही डूब गए। स्थानीय लोगों का अनुमान है कि लगभग आधी फसल बर्बाद हो गई। मोहम्मद अकबर ने कहा कि न केवल मौसम बल्कि व्यापक पारिस्थितिक गिरावट जिसमें भारी गाद जमा होना, ऊपरी इलाकों से कचरे से प्रदूषण और पानी की गहराई कम होना भी इसके मुख्य कारण हैं।
वे अधिकारियों से झील में प्रदूषण को रोकने का आग्रह करते हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक सूखा और कम बर्फबारी वुलर झील में पानी के स्तर में गिरावट का कारण हैं। इससे इसका प्राकृतिक रिचार्ज चक्र बाधित हुआ है। उन्होंने चेताया कि अगर सूखा जारी रहा तो गर्मियों में स्थिति और खराब हो सकती है। संवाद
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भट शहजाद
बांदीपोरा। पिछले साल सितंबर में विनाशकारी बाढ़ के बाद लगातार सूखी सर्दी के मौसम ने वुलर झील पर निर्भर हजारों मछुआरों के लिए आजीविका का संकट खड़ा कर दिया है। यहां पानी का स्तर कम होने, जलीय फसलों की कटाई रुकने और मछलियों की संख्या कम होने से उनके आय के पारंपरिक स्रोत खत्म हो रहे हैं।
कई मछुआरे परिवार जो दशकों से वुलर झील पर निर्भर थे अब वैकल्पिक काम ढूंढ़ रहे हैं। वुलर झील सूख गई है जिस कारण सर्दियों के महीनों में मछली पकड़ने और सिंघाड़े निकालने के काम में कमी आई है। उत्तरी कश्मीर के बांदीपोरा जिले के कुलहामा गांव के निवासी असलम अहमद ने कहा कि उनके गांव की 90 प्रतिशत आबादी मछली पकड़ने अथवा सिंघाड़े निकालने के लिए झील पर निर्भर है लेकिन इस समय मछुआरे घर पर बैठे हुए हैं।
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कुछ साल पहले जनवरी में एक मछुआरा आसानी से दिन में लगभग 500-600 रुपये कमा लेता था क्योंकि झील में पानी का स्तर अच्छा था जिससे उन्हें नियमित किनारों के पास आसानी से सिंघाड़े निकालने में मदद मिलती थी लेकिन अब जैसे-जैसे झील सूख रही है समुदाय के लिए परिवारों का पालन-पोषण करने में मुश्किलें आ रही हैं।
मोहम्मद रफीक का कहना है कि जैसे-जैसे झील में पानी का स्तर कम हो रहा है मछुआरे हर दिन बहुत कम या बिना मछली के घर लौट रहे हैं। कई सालों की अनुपस्थिति के बाद वुलर संरक्षण और प्रबंधन प्राधिकरण की ओर से ड्रेजिंग ऑपरेशन के बाद कमल के तने फिर से दिखाई देने लगे जिससे आर्थिक पुनरुद्धार की उम्मीदें जगी हैं।
हालांकि सितंबर में आई बाढ़ ने निचले इलाकों को जलमग्न कर दिया जिससे पौधे परिपक्व होने से पहले ही डूब गए। स्थानीय लोगों का अनुमान है कि लगभग आधी फसल बर्बाद हो गई। मोहम्मद अकबर ने कहा कि न केवल मौसम बल्कि व्यापक पारिस्थितिक गिरावट जिसमें भारी गाद जमा होना, ऊपरी इलाकों से कचरे से प्रदूषण और पानी की गहराई कम होना भी इसके मुख्य कारण हैं।
वे अधिकारियों से झील में प्रदूषण को रोकने का आग्रह करते हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक सूखा और कम बर्फबारी वुलर झील में पानी के स्तर में गिरावट का कारण हैं। इससे इसका प्राकृतिक रिचार्ज चक्र बाधित हुआ है। उन्होंने चेताया कि अगर सूखा जारी रहा तो गर्मियों में स्थिति और खराब हो सकती है। संवाद