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Srinagar News: दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हाथ से बुना रेशमी कालीन बारामुला में बन रहा
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बारामुला में बनाया जा रहा कालीन। संवाद
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30 फीट लंबा और 72 फीट चौड़ा है, जिसमें 25 करोड़ गांठें लगी हैं और लगभग 12 क्विंटल वजनी है
साकिब नबी
बारामुला। कश्मीर की सदियों पुरानी हथकरघा कला को एक नया विश्व कीर्तिमान मिलने जा रहा है। बारामुला जिले के कुंजर स्थित वाइल क्रालपोरा गांव में नौ वर्षों की अथक मेहनत के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हाथ से बुना रेशमी कालीन अपने अंतिम चरण में पहुंच गया है।
इस विशालकाय कालीन का आकार 30 फीट लंबा और 72 फीट चौड़ा है, जिसमें लगभग 25 करोड़ गांठें लगी हैं और इसका वजन लगभग 12 क्विंटल होने का अनुमान है। यह कालीन दुनिया के सबसे बड़े रेशमी कालीन (40x72 फीट) से केवल लंबाई में कुछ कम है।
व्यापारी फैयाज अहमद शाह के आदेश पर शुरू हुए इस प्रोजेक्ट का कार्य 2016 में आरंभ हुआ। मास्टर बुनकर अब्दुल गफ्फार शेख की देखरेख में 15 कुशल कारीगरों की एक टीम ने प्रतिदिन लगभग 10 घंटे कार्य करते हुए काशगर (चीन) के विशेष रेशमी धागों से जटिल पुष्प-पैटर्न उकेरे हैं, जो कश्मीरी कालीनों की पारंपरिक पहचान हैं।
गफ्फार शेख ने बताया, यह अब तक की सबसे बड़ी चुनौती थी जिसमें कलात्मक लगन, तकनीकी नवाचार और असीम धैर्य की आवश्यकता थी।
इस कालीन की अनुमानित उत्पादन लागत लगभग 6 करोड़ रुपये है। केवल इसके विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए करघे की लागत ही 4.5 लाख रुपये थी क्योंकि कश्मीर में इतने बड़े आकार का करघा उपलब्ध नहीं था।
कालीन के पूरा होने के बाद इसे विशेष सफाई प्रक्रिया से गुजारा जाएगा और फिर श्रीनगर ले जाने के लिए क्रेन व बड़े ट्रॉलरों की सहायता लेनी पड़ेगी। इसके इस वर्ष के अंत तक पूरा होने और फिर खाड़ी देशों को निर्यात किए जाने की उम्मीद है।
कालीन में दिखेगी 15वीं सदी की डिजायन की झलक
कालीन में फूलों के डिजाइन हावी हैं जो इस क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता और सदियों पुरानी बुनाई विरासत को दर्शाते हैं। हाथ से बुने हुए कश्मीरी कालीन 15वीं सदी के हैं जब सुल्तान जैन-उल-आबिदीन ने स्थानीय कारीगरों को ट्रेनिंग देने के लिए फारसी कारीगरों को पेश किया था। अपने जटिल डिजाइन और टिकाऊपन के लिए विश्व स्तर पर मशहूर ये कालीन कश्मीर के सबसे कीमती सांस्कृतिक एक्सपोर्ट में से हैं। गफ्फार ने कहा कि यह बहुत ज़्यादा समय लेने वाला काम है। आकार और जटिलता के आधार पर एक कालीन को बनाने में महीनों या साल भी लग सकते हैं जिसके लिए असाधारण कौशल और धैर्य की जरूरत होती है। संवाद
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साकिब नबी
बारामुला। कश्मीर की सदियों पुरानी हथकरघा कला को एक नया विश्व कीर्तिमान मिलने जा रहा है। बारामुला जिले के कुंजर स्थित वाइल क्रालपोरा गांव में नौ वर्षों की अथक मेहनत के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हाथ से बुना रेशमी कालीन अपने अंतिम चरण में पहुंच गया है।
इस विशालकाय कालीन का आकार 30 फीट लंबा और 72 फीट चौड़ा है, जिसमें लगभग 25 करोड़ गांठें लगी हैं और इसका वजन लगभग 12 क्विंटल होने का अनुमान है। यह कालीन दुनिया के सबसे बड़े रेशमी कालीन (40x72 फीट) से केवल लंबाई में कुछ कम है।
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व्यापारी फैयाज अहमद शाह के आदेश पर शुरू हुए इस प्रोजेक्ट का कार्य 2016 में आरंभ हुआ। मास्टर बुनकर अब्दुल गफ्फार शेख की देखरेख में 15 कुशल कारीगरों की एक टीम ने प्रतिदिन लगभग 10 घंटे कार्य करते हुए काशगर (चीन) के विशेष रेशमी धागों से जटिल पुष्प-पैटर्न उकेरे हैं, जो कश्मीरी कालीनों की पारंपरिक पहचान हैं।
गफ्फार शेख ने बताया, यह अब तक की सबसे बड़ी चुनौती थी जिसमें कलात्मक लगन, तकनीकी नवाचार और असीम धैर्य की आवश्यकता थी।
इस कालीन की अनुमानित उत्पादन लागत लगभग 6 करोड़ रुपये है। केवल इसके विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए करघे की लागत ही 4.5 लाख रुपये थी क्योंकि कश्मीर में इतने बड़े आकार का करघा उपलब्ध नहीं था।
कालीन के पूरा होने के बाद इसे विशेष सफाई प्रक्रिया से गुजारा जाएगा और फिर श्रीनगर ले जाने के लिए क्रेन व बड़े ट्रॉलरों की सहायता लेनी पड़ेगी। इसके इस वर्ष के अंत तक पूरा होने और फिर खाड़ी देशों को निर्यात किए जाने की उम्मीद है।
कालीन में दिखेगी 15वीं सदी की डिजायन की झलक
कालीन में फूलों के डिजाइन हावी हैं जो इस क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता और सदियों पुरानी बुनाई विरासत को दर्शाते हैं। हाथ से बुने हुए कश्मीरी कालीन 15वीं सदी के हैं जब सुल्तान जैन-उल-आबिदीन ने स्थानीय कारीगरों को ट्रेनिंग देने के लिए फारसी कारीगरों को पेश किया था। अपने जटिल डिजाइन और टिकाऊपन के लिए विश्व स्तर पर मशहूर ये कालीन कश्मीर के सबसे कीमती सांस्कृतिक एक्सपोर्ट में से हैं। गफ्फार ने कहा कि यह बहुत ज़्यादा समय लेने वाला काम है। आकार और जटिलता के आधार पर एक कालीन को बनाने में महीनों या साल भी लग सकते हैं जिसके लिए असाधारण कौशल और धैर्य की जरूरत होती है। संवाद