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श्रीनगर: बागवानी की बहार में गुम हो रही धान की हरियाली, सेब की रंगत में खोने लगी कश्मीरी चावल की खुशबू

Fri, 23 Oct 2026 02:09 PM IST
Nikita Gupta अमृतपाल सिंह बाली, अमर उजाला नेटवर्क, श्रीनगर
अमृतपाल सिंह बाली, अमर उजाला नेटवर्क, श्रीनगर Published by: Nikita Gupta Updated Fri, 23 Oct 2026 02:09 PM IST
सार

कश्मीर में सेब की खेती का रकबा बढ़ने के साथ धान की खेती सिमट रही है। नौ वर्षों में धान का क्षेत्रफल 15% घटा, जबकि दूसरे राज्यों से चावल की आपूर्ति करीब 30% बढ़ी है।

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The fragrance of Kashmiri rice is beginning to fade amidst the vibrant hues of apples.
खेतों में खड़ी धान की फसल।

विस्तार

कश्मीर की पहचान सिर्फ केसर के फूलों और सेब के लाल बागों से नहीं, धान के लहलहाते खेतों और जीओ टैग प्राप्त मुश्कबुदजी चावल की खास खुशबू से भी रही है। लेकिन खेती की बदलती तस्वीर में अब सेब की रंगत धान की हरियाली पर भारी पड़ती जा रही है। बेहतर कमाई की उम्मीद में किसान धान के मुकाबले बागवानी को तरजीह दे रहे हैं। इसका असर स्थानीय खाद्यान्न उत्पादन और पारंपरिक चावल के उत्पादन पर संकट गहराते जा रहा है।

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कृषि उत्पादन विभाग के अनुसार बीते नौ वर्षों में जम्मू-कश्मीर में धान की खेती का रकबा करीब 3.045 लाख हेक्टेयर से घटकर 2.588 लाख हेक्टेयर रह गया है। इसके उलट, पिछले दो दशकों में सेब की खेती का क्षेत्रफल करीब 60 प्रतिशत बढ़कर 1.73 लाख हेक्टेयर हो गया। इसी दौरान दूसरे राज्यों से जम्मू-कश्मीर आने वाले चावल की आपूर्ति भी बढ़ी है। वर्ष 2022-23 में यह मात्रा 3.74 लाख टन थी, जो 2024-25 में बढ़कर 4.86 लाख टन पहुंच गई। यानी आपूर्ति में करीब 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

कमाई की चाह में बदल रही खेती
कृषी विशेषज्ञ मंदीप सिंह बताते हैं कि सेब की बागवानी किसानों के लिए आय का अहम जरिया है। बाजार में मांग और बेहतर कमाई की संभावना उन्हें बागवानी की ओर आकर्षित करती है। दूसरी ओर, धान की खेती में श्रम, पानी, लागत और मौसम से जुड़ी चुनौतियां हैं। ऐसे में खेती के फैसले बदल रहे हैं। हालांकि, यह बदलाव किसानों की आय के अवसर बढ़ाता है, लेकिन स्थानीय खाद्यान्न उत्पादन बनाए रखने की चुनौती भी पैदा करता है।

मुश्कबुदजी की विरासत बचाने की जरूरत
कश्मीर का पारंपरिक सुगंधित चावल मुश्कबुदजी अपने विशिष्ट स्वाद और खुशबू के लिए जाना जाता है। इसकी पहचान बनाए रखने के लिए किसानों को उचित मूल्य, बेहतर बीज और बाजार उपलब्ध कराना जरूरी है। मुश्कबुदजी घाटी की पहचान रहा है। इसके विकास के लिए हमें काम करना होगा।

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इन प्रजातियों पर भी देना होगा ध्यान
मुश्कबुदजी के साथ ही कामद कश्मीर की प्रसिद्ध सुगंधित पारंपरिक किस्म। अपने स्वाद और पकने के बाद की बनावट के कारण इसे विशेष अवसरों और पारंपरिक भोज में शामिल किया जाता है। ऐसे ही जाग, नून बियोल, काव क्रीड प्रजाति भी घाटी की पहचान है।

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