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J&K: नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता के गर्भपात की इजाजत देने से कोर्ट का इन्कार, कहा- जान को खतरे में नहीं डाल सकते
राकेश शर्मा, अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू
Published by: Nikita Gupta
Updated Fri, 22 May 2026 12:21 PM IST
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सार
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने 27 हफ्ते की गर्भावस्था वाली नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता के गर्भपात की अनुमति देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर कहा कि गर्भपात से गंभीर स्वास्थ्य जोखिम हो सकते हैं।
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- फोटो : X/fazenda_dom_pedro
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विस्तार
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने वीरवार को एक नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता के गर्भपात की इजाजत देने से इन्कार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि लगभग 27 हफ्ते के गर्भ के कारण पीड़िता की जान और भविष्य की प्रजनन क्षमता को गंभीर खतरा हो सकता है। पीड़िता की भलाई के लिए गहरी चिंता जताते हुए जस्टिस वसीम सादिक नरगल ने कहा कि अदालतें एक विधिवत गठित मेडिकल बोर्ड की स्पष्ट राय को नजरअंदाज नहीं कर सकतीं, खासकर तब जब प्रस्तावित गर्भपात से गंभीर मेडिकल और प्रसूति संबंधी जोखिम जुड़े हों।
याचिका नाबालिग पीड़िता की ओर से दायर की गई थी, जिसकी उम्र लगभग 14 वर्ष बताई गई है। कथित तौर पर यौन उत्पीड़न के कारण गर्भवती हो गई थी। कुलगाम के एक पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज करते हुए आरोपी को हिरासत में बताया गया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने श्रीनगर के सरकारी मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञों का एक मेडिकल बोर्ड गठित किया। गर्भपात की संभावना का आकलन किया गया।
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बोर्ड ने राय दी कि इस चरण में गर्भपात कराने से पीड़िता को गंभीर जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है, जिनमें गर्भाशय-निष्कासन, प्रसवोत्तर रक्तस्राव, सेप्सिस, गहन चिकित्सा की आवश्यकता, बांझपन की समस्या भी हो सकती है।
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कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया है कि प्रेग्नेंसी जारी रहने से पीड़िता को मानसिक आघात पहुंचेगा, उस पर कोर्ट ने विधिवत विचार किया है। इस बात को उसकी जान और शारीरिक स्वास्थ्य को बचाने से जुड़ी उतनी ही जरूरी चिंता के साथ संतुलित करके देखना होगा और प्रेगनेंसी खत्म करवाने के अधिकार को एक ऐसा पूर्ण अधिकार नहीं माना जा सकता, जो मेडिकल वास्तविकताओं और विशेषज्ञों की राय से अलग हो। एक बार जब सक्षम मेडिकल बोर्ड ने पीड़िता की जान को गंभीर खतरा होने के कारण प्रेगनेंसी खत्म न करने की राय दे दी है, तो कोर्ट फिर भी प्रेगनेंसी खत्म करने का निर्देश देता है तो वह मेडिकल समझदारी के विपरीत काम कर रहा होगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट, 1971 के तहत यह माना जाता है कि दुष्कर्म के कारण हुई प्रेगनेंसी से गंभीर मानसिक चोट पहुंचती है फिर भी प्रेगनेंसी खत्म करवाने का अधिकार, जान बचाने से जुड़ी गंभीर मेडिकल चिंताओं पर भारी नहीं पड़ सकता।
गर्भपात की अर्जी को नामंजूर करते हुए कोर्ट ने पीड़िता और होने वाले बच्चे के कल्याण, पुनर्वास, गोपनीयता और मेडिकल देखभाल के लिए विस्तृत निर्देश जारी किए। कोर्ट ने श्रीनगर के सरकारी लल देद अस्पताल को निर्देश दिया कि वह प्रसव से पहले और बाद का पूरा मेडिकल इलाज मुफ्त में मुहैया कराए, पूरी गोपनीयता बनाए रखे और पीड़िता की काउंसलिंग और मेडिकल निगरानी सुनिश्चित करे।