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नादिमर्ग नरसंहार की 23वीं बरसी: जख्म आज भी ताजे, कश्मीरी पंडितों ने नम आंखों से दी श्रद्धांजलि

संवाद न्यूज एजेंसी, मुजम्मिल याकूब Published by: Nikita Gupta Updated Tue, 24 Mar 2026 01:18 PM IST
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सार

नादिमर्ग नरसंहार की 23वीं बरसी पर कश्मीरी पंडित और स्थानीय मुसलमान शोक सभा में एकत्रित होकर 24 निर्दोषों को श्रद्धांजलि दी।

On the anniversary of the Nadimarg massacre
माैजूद विस्थापित कश्मीरी पंडितों का मकान। - फोटो : संवाद
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विस्तार

साझा दुख और एकजुटता के मार्मिक प्रदर्शन में दर्जनों विस्थापित कश्मीरी पंडित सोमवार को नादिमर्ग गांव में एकत्रित हुए। यहां वर्ष 2003 में हुए नरसंहार के घाव 23 साल बीत जाने के बाद भी जिंदा दिखे। नरसंहार की 23वीं बरसी मनाई गई। नम आंखों से कश्मीरी पंडितों ने ‘अपनों’ को श्रद्धांजलि दी।

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इस कार्यक्रम में स्थानीय मुसलमान भी उनके साथ शामिल हुए। सभी ने उन 24 बेकसूर लोगों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जिन्हें आतंकियों ने गोलियों से भून दिया था। शोक सभा में कश्मीरी पंडित समुदाय के सदस्यों ने स्मारक पर मोमबत्तियां जलाईं और प्रार्थनाएं कीं। ऐसी प्रार्थनाएं ज्यादातर जम्मू तक ही सीमित रहती थीं लेकिन पिछले कुछ वर्षों से नरसंहार की बरसी को यहां मनाना शुरू किया गया है। यह एक बड़ा बदलाव का संकेत है।
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इस शोक सभा ने एक बार फिर दोनों समुदायों को ठीक उसी जगह पर एक साथ ला दिया जहां 23 मार्च, 2003 की उस मनहूस रात को यह त्रासदी हुई थी। दिवंगत आत्माओं के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए पुष्प अर्पित किए गए और मोमबत्तियां जलाई गईं। सभी ने उस भयानक रात को याद किया जब महिलाओं और बच्चों सहित 24 कश्मीरी पंडितों की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी।

उन्होंने कहा कि ऐसी त्रासदियों को याद रखना होगा। यह सुनिश्चित करना होगा कि इसका इतिहास भुला न दिया जाए। समुदाय के नेताओं ने समाज के सभी वर्गों के लोगों से शांतिपूर्ण और समावेशी भविष्य के लिए मिलकर काम करने का आग्रह किया। उन्होंने न्याय की मांग करते हुए पीड़ितों की याद को जीवित रखने के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई। कई लोगों ने आशा व्यक्त की कि ऐसी घटनाएं फिर कभी नहीं दोहराई जाएंगी। उन्होंने समुदायों के बीच आपसी समझ को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयासों का आह्वान किया। श्रद्धांजलि सभा का समापन सामूहिक प्रार्थनाओं और कश्मीर में शांति, भाईचारा तथा सद्भाव बनाए रखने के एक नए संकल्प के साथ हुआ। काफी संख्या में विस्थापित कश्मीरी पंडित परिवारों के सदस्य शोक सभा में पहुंचे थे।

यहां के लोगों को अपना फर्ज अदा करना होगा : 
एक कश्मीरी पंडित ने कहा, आज के दिन को हम काला दिवस के रूप में मनाते हैं। हम उन 24 लोगों को याद करते हैं जिन्होंने अपनी शहादत दी थी। जब तक शरीर में जान रहेगी तब तक इन्हें याद करते रहेंगे। उनको कभी माफ नहीं किया जाएगा जिन्होंने इस घटना को अंजाम दिया। उनको न हम भूल सकते हैं न माफ कर सकते हैं। यहां के यहां के लोगों को अपना फर्ज अदा करना होगा।

On the anniversary of the Nadimarg massacre
नादिमर्ग में आयोजित शोक सभा के लिए रखी गई पूजन सामग्री। - फोटो : संवाद

आज भी सोच कर रूह कांप उठती है :
भावना भट ने कहा कि आज भी नरसंहार के बारे में सोच कर रूह कांप उठती है। हमारे भाई-बहनों के साथ उस भयानक रात को क्या हुआ होगा। उन पर क्या गुजरी होगी। स्थानीय कश्मीरी मुस्लिम शाइक अहमद मलिक ने कहा, हम इस दिन का जितना अफसोस करेंगे वो कम है। उस रात जो घटा हमारे माथे पर एक कलंक समान है जिसे हम कभी धो नहीं सकते। पैगम्बर मोहम्मद साहब भी फरमाते हैं जिसने एक बेगुनाह का कत्ल किया उसने इंसानियत का कत्ल किया है। उस रात तो 24 लोगों की हत्या कर दी गई। 23 मार्च, 2003 की रात को आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों ने नादिमर्ग गांव पर हमला बोल दिया था। कश्मीरी पंडितों के परिवारों को उनके घरों से बाहर घसीटा, उन्हें एक चिनार के पेड़ के पास कतार में खड़ा करने के बाद गोलियों से भून दिया।

इस क्रूर हमले ने इस क्षेत्र की सामूहिक यादों पर एक ऐसा गहरा जख्म छोड़ा है जिसे मिटाया नहीं जा सकता। सांप्रदायिक सौहार्द को दर्शाते हुए इस भावुक पल में स्थानीय मुस्लिम कश्मीरी पंडितों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हुए। प्रार्थनाएं करते समय वे एक-दूसरे के साथ आंसू बांट रहे थे और एक-दूसरे को गले लगा रहे थे। ये दृश्य आतंकवाद को एक करारा जवाब था।

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