Jammu: जम्मू यूनिवर्सिटी में रिसर्च का हाल बेहाल, 78% पीएचडी थीसिस लेट; सीएजी रिपोर्ट ने खोली पोल
जम्मू यूनिवर्सिटी में पीएचडी थीसिस की जांच में देरी सामने आई है, जहां 2017-22 के बीच 78% थीसिस समय पर जांची ही नहीं गईं। कैग रिपोर्ट के मुताबिक छात्रों को डिग्री के लिए 6 महीने की बजाय कई मामलों में 4 साल तक इंतजार करना पड़ा।
विस्तार
जम्मू यूनिवर्सिटी में रिसर्च व्यवस्था की हालत चिंताजनक है। पीएचडी करने वाले छात्रों को डिग्री के लिए तय छह महीने नहीं बल्कि कई मामलों में चार साल तक इंतजार करना पड़ा। कैग की रिपोर्ट के अनुसार 2017-18 से 2021-22 के बीच 78 फीसदी थीसिस समय पर जांची ही नहीं गईं। करोड़ों रुपये के रिसर्च प्रोजेक्ट भी बिना नतीजे के रह गए।
कैग के मुताबिक इस अवधि में 764 शोधार्थियों ने अपनी थीसिस जमा की। नियम के अनुसार छह माह में जांच पूरी होनी चाहिए थी पर 162 यानी 22 फीसदी थीसिस ही समय पर जांची गईं। बाकी 577 यानी 78 फीसदी देरी से जांची गईं। कई मामलों में यह देरी 30 दिन से बढ़कर 1,481 दिन यानी करीब चार साल तक पहुंच गई। आंकड़े बताते हैं कि समस्या एक-दो साल की नहीं, बल्कि लगातार बढ़ती रही। 2017-18 में 62 फीसदी थीसिस देरी से जांची गईं। 2018-19 में यह आंकड़ा 84 फीसदी हो गया। 2019-20 में हाल और खराब हुआ और 93 फीसदी थीसिस की समय पर जांच नहीं हो सकी। यानी हर साल स्थिति बिगड़ती गई और सुधार के लिए ठोस कदम नजर नहीं आए।
नियमों के विपरीत बनाए पीएचडी गाइड, योजना कागजों में सिमटी:
रिपोर्ट में सामने आया कि पीएचडी गाइड बनाने में यूजीसी के नियमों का पालन नहीं किया गया। यूनिवर्सिटी ने अकादमिक कोऑर्डिनेटर को ही रिसर्च सुपरवाइजर बना दिया। रिपोर्ट में कहा गया है कि यूनिवर्सिटी ने 2020 में सात सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाने की योजना बनाई थी लेकिन 2022 तक एक भी सेंटर शुरू नहीं हो सका। न रोडमैप तैयार हुआ और न ही बुनियादी ढांचा विकसित किया गया। बड़े स्तर की योजना कागजों में ही सीमित रह गई।
निगरानी का अभाव, प्रोजेक्ट अपने हाल पर:
कैग ने पाया कि यूनिवर्सिटी में रिसर्च प्रोजेक्ट्स की मॉनिटरिंग कमजोर रही। डीन रिसर्च स्टडीज ने न नियमित प्रगति रिपोर्ट ली और न ही समय-समय पर समीक्षा की। नतीजतन, कई प्रोजेक्ट बिना दिशा के चलते रहे और लापरवाही बढ़ती गई। 86 प्रोजेक्ट में से आठ तय समय के बाद भी पूरे नहीं हो सके। इनकी लागत 2.50 करोड़ थी और मार्च 2022 तक सिर्फ 47.71 लाख रुपये ही खर्च हो पाए। करीब 2.11 करोड़ के पांच प्रोजेक्ट बीच में ही बंद हो गए। इन पर करीब 12 लाख खर्च हुए लेकिन कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया।
समाज व सरकार तक नहीं पहुंचा फायदा:
2017-22 के दौरान 54 प्रोजेक्ट पूरे होने का दावा किया गया। नौ की रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराई गई। सिर्फ आठ पर ही रिसर्च पेपर प्रकाशित हुए। अधिकांश रिसर्च का न अकादमिक असर दिखा और न ही सही दस्तावेजीकरण हुआ। विवि में ऐसा कोई सिस्टम नहीं पाया गया जिससे रिसर्च के नतीजे सरकार, उद्योग या समाज तक पहुंच सकें। यानी जो शोध लोगों के काम आ सकता था, वह उन तक पहुंच नहीं पाया। कई प्रोजेक्ट में तैयार वैज्ञानिक डेटा और परिणाम का उपयोग नहीं किया गया।
अधूरी मंजूरी में 144 करोड़ के काम किए शुरू, कई अटके
जम्मू यूनिवर्सिटी (जेयू) में विकास कार्यों में गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं। मार्च 2022 तक की अवधि की कैग रिपोर्ट के अनुसार 144.86 करोड़ के 11 काम बिना तकनीकी मंजूरी के शुरू कर दिए गए। नतीजा कई प्रोजेक्ट अटक गए और कई बंद हो गए। नियमों के अनुसार 10 लाख रुपये से अधिक के कार्यों के लिए तकनीकी मंजूरी जरूरी होती है।
इसके बावजूद यूनिवर्सिटी ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, राज्य योजना और प्रधानमंत्री पुनर्निर्माण योजना समेत विभिन्न योजनाओं के तहत 144.86 करोड़ के 11 काम बिना मंजूरी के शुरू कर दिए। 2019 तक अधीक्षण अभियंता का पद भी खाली रहा जिससे तकनीकी जांच की व्यवस्था कमजोर रही। इससे बाद में कई कार्यों में डिजाइन बदलने पड़े। कुछ काम मूल योजना से ही अलग तरीके से किए गए। कई स्थानों पर तय दायरे से बाहर काम हुआ। इन कारणों से कई प्रोजेक्ट अटकने से समय पर पूरे नहीं हो सके।
करोड़ों के उपकरण बेकार, रिकॉर्ड भी पूरा नहीं:
कैग ने 2017 से 2022 की अवधि के दौरान पाया कि करीब 1.63 करोड़ की मशीन बंद पड़ी है। 75 लाख का सामान गलियारे में रखा हुआ है। 82 लाख के उपकरण उपयोग में नहीं हैं। 62 लाख रुपये का हीटिंग सिस्टम लंबे समय से बंद पड़ा है। भारी खर्च के बावजूद ये मशीनरी बेकार पड़ी है। इसकी वजह तकनीकी स्टाफ की कमी, रखरखाव का अभाव और योजना में खामियां हैं। वहीं कुछ प्रोजेक्ट पूरे होने के बाद उपकरण संबंधित विभागों को सौंपे जाने थे लेकिन करीब 72 लाख के उपकरणों का सही रिकॉर्ड भी नहीं रखा गया।
महिलाओं के शौचालय अधूरे, फंड का रास्ता बदला:
कैंटीन, शौचालय और छात्रावास जैसी सुविधाओं के लिए राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान के तहत यूनिवर्सिटी को करीब 20 करोड़ रुपये मिले थे। 13 शौचालय बनाए जाने थे और चार ही बन पाए। इसके लिए जारी 2.29 करोड़ में से 1.68 करोड़ अन्य कार्यों में खर्च कर दिए गए। करीब आठ लाख का हिसाब स्पष्ट नहीं है। महिलाओं के लिए निर्धारित 23.19 लाख भी उद्देश्य पर खर्च नहीं किए गए। बाद में इन्हें छात्रावास निर्माण में लगा दिया गया। यूनिवर्सिटी ने इसका कारण कैंपस में जगह की कमी बताया है।
बिना जांच बनाई योजना, 3.50 करोड़ फंसे:
कैग के अनुसार कई प्रोजेक्ट बिना पर्याप्त सर्वे और जमीन की जांच के तैयार कर दिए गए। इनमें नया छात्रावास, हाई एनर्जी फिजिक्स यूनिट का भवन और रिमोट सेंसिंग एवं भू-स्थानिक सूचना प्रणाली विभाग का भवन शामिल हैं। कुछ मामलों में जमीन निर्माण के लिए उपयुक्त नहीं थी जबकि एक मामले में मौजूदा भवन पर अतिरिक्त मंजिल बनाने की योजना तकनीकी रूप से सही नहीं पाई गई। ऐसे में काम शुरू ही नहीं हो सका और करीब 3.50 करोड़ बैंक खाते में पड़े रह गए। यानी योजना बनाने में ही कमी रही जिससे पैसा फंस गया और काम आगे नहीं बढ़ पाया।
5.31 करोड़ खर्च के बाद भी छात्रावास अधूरा:
छात्रावास निर्माण के लिए पहले 5.25 करोड़ मंजूर किए गए जिसे बाद में बढ़ाकर 6.52 करोड़ कर दिया गया। निचले हिस्से को पूरा करने के बजाय ऊपरी मंजिलों का काम शुरू कर दिया गया। पैसे की कमी से काम बीच में ही रुक गया। 5.31 करोड़ खर्च हो चुके हैं लेकिन भवन अधूरा पड़ा है। अतिरिक्त कार्यों के नाम पर 2.65 करोड़ के काम बिना टेंडर प्रक्रिया अपनाए उसी ठेकेदार को दे दिए गए। ये कार्य मूल योजना का हिस्सा भी नहीं थे और नियमों का भी उल्लंघन हुआ।