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Child Bullying: स्कूल में बुलिंग से बच्चों में बढ़ रहे डिप्रेशन-सुसाइड के केस, आखिर क्यों होती हैं ऐसी घटनाएं

Mon, 13 Jul 2026 02:42 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिलाष श्रीवास्तव Updated Mon, 13 Jul 2026 02:42 PM IST
सार

बुलिंग यानी किसी को जानबूझकर बार-बार परेशान करना, डराना, अपमानित करना या उसे शारीरिक और मानसिक रूप से चोट पहुंचाने की कोशिश करना। ये बच्चों में डिप्रेशन और आत्महत्या के मामलों को बढ़ाता जा रहा है। इसके पीछे के मनोविज्ञान को समझना जरूरी है।

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Child Bullying cases in india why bullying happens know psychology and how to stop it
बच्चों की बुलिंग - फोटो : Amarujala.com/AI

विस्तार

जयपुर के नीरजा मोदी स्कूल की चौथी कक्षा की छात्रा अमायरा ने पिछले साल 1 नंवबर को स्कूल की चौथी मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली थी। ये मामला अब फिर से सुर्खियों में है। अमायरा के माता-पिता ने क्लासरूम का सीसीटीवी फुटेज सामने रखते हुए आरोप लगाया है कि अमायरा को उसके क्लासमेट बार-बार बुली करते थे, परेशान करते थे।

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अमायरा ने कई बार टीचर्स से इसकी शिकायत भी की थी, लेकिन न तो इस तरफ कोई खास ध्यान दिया गया न ही कोई कार्रवाई हुई। लिहाजा परेशान होकर बच्ची ने आत्महत्या जैसा कदम उठा लिया। परिवार ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत सभी जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग की है। 
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पिछले साल, घटना के अगले दिन दो सदस्यों वाली इंस्पेक्शन कमेटी के दौरे के बाद सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (सीबीएसई) ने नीरजा मोदी स्कूल को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। इस मामले ने छात्रों में बुलिंग की घटनाओं पर फिर से सोचने को मजबूर कर दिया है।  
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देश में छात्रों की बुलिंग (क्लासमेट द्वारा परेशान करने) के मामले पहले भी सामने आते रहे हैं। पर सवाल ये है कि-
 

  • आखिर हमउम्र छात्र ऐसा करते क्यों हैं?
  • इसके पीछे क्या सोच होती है?
  • इसको लेकर मनोविज्ञान क्या कहता है और इस तरह की घटनाओं को कैसे रोका जा सकता है?

Child Bullying cases in india why bullying happens know psychology and how to stop it
बच्चों में बुलिंग की समस्या - फोटो : Amarujala.com/AI

गौरतलब है अमायरा जैसे कई मामले अक्सर सुर्खियों में रहे हैं लेकिन इस तरफ अक्सर लोगों का ध्यान नहीं जाता है।
 

  • बेंगलुरु (2021): बाल्डविन बॉयज स्कूल में 10वीं के छात्र  रौनक बनर्जी (14 वर्ष) ने साथियों द्वारा बुलिंग से परेशान होकर आत्महत्या कर ली थी।
  • बेंगलुरु (2026): कक्षा आठवीं की 14 वर्षीय छात्रा ने कथित तौर पर आत्महत्या की। सुसाइड नोट में स्कूल में हुई बेइज्जती और अपमान का जिक्र किया गया था।


कई तरह से हो सकती है बुलिंग
  
भारत में बच्चों और किशोरों के आत्महत्या की बढ़ती दर के पीछे 'बुलीइंग' (धौंस जमाना या परेशान करना) को एक अहम वजह माना जा रहा है।

रिपोर्ट  से पता चलता है कि साल 2019-2023 के बीच, छात्रों की आत्महत्या के लगभग 491 दर्ज मामले बुलीइंग, संस्थागत उत्पीड़न और जातिगत भेदभाव से जुड़े थे, यानी औसतन हर हफ्ते ऐसा एक मामला सामने आया।

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, बुलिंग का मतलब है किसी को जानबूझकर बार-बार परेशान करना, डराना, अपमानित करना या उसे शारीरिक-मानसिक रूप से चोट पहुंचाने की कोशिश करना।
 

  • बुलीइंग कई तरह की होती है। इसमें बोलकर परेशान करना (वर्बल बुलीइंग) सबसे आम है जैसे साथियों को लगातार ताने मारना, मजाक उड़ाना और बुरे नामों से बुलाना। 
  • सेक्सुअल बुलीइंग भी आम होती जा रही है, खासकर छोटे बच्चों के बीच। जैसे किसी के बारे में सेक्सुअल कमेंट लिखना, बिना मर्जी के प्राइवेट तस्वीरें शेयर करना या सेक्सुअल धमकी देना। 
  • फिर आती है साइबर-बुलीइंग। क्लास में कही गई किसी बात का स्क्रीनशॉट लेकर सैकड़ों लोगों के साथ शेयर कर दिया जाता है। किसी की फोटो पोस्ट करके उसका मजाक उड़ाया जाता है। लगातार अनजान लोगों से मैसेज आते रहते हैं।। 


ऐसे मामलों में अक्सर परिवार वाले बच्चे को ही दोषी ठहराते हैं।

"तुम उन्हें तुम्हें परेशान क्यों करने देते हो?, तुम्हें मजबूत बनना होगा। बस उन्हें नज़रअंदाज करो।

ऐसी बातें समझाकर मामले को टाल दिया जाता है, लिहाजा बच्चा इस बारे में बात करना बंद कर देता है। वह सब कुछ अपने मन में ही दबाए रखता है। यही कारण है कि बुली होने वाले छात्रों में आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं।

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बुलिंग के कारण होने वाली दिक्कतें - फोटो : Amarujala.com/AI

बच्चे दूसरों को बुली क्यों करते हैं? इसके पीछे की साइकोलॉजी

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि बुलिंग करने वाला हर बच्चा जन्म से आक्रामक नहीं होता। उसके व्यवहार के पीछे कई सामाजिक और मानसिक कारण हो सकते हैं।

अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के अनुसार जिन बच्चों ने घर में हिंसा, गाली-गलौज, उपेक्षा या अत्यधिक कठोर अनुशासन देखा होता है, उनमें दूसरों के प्रति आक्रामक व्यवहार विकसित होने की संभावना अधिक होती है। वे शक्ति दिखाकर खुद को मजबूत महसूस करना चाहते हैं।
 

  • कुछ बच्चे लोकप्रिय बनने, दोस्तों को प्रभावित करने या समूह में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए भी बुलिंग करते हैं। सोशल स्टेटस पाने की इच्छा भी इसका कारण हो सकती है।
  • शोध बताते हैं कि कम सहानुभूति, गुस्से पर नियंत्रण की कमी, बार-बार हिंसक कंटेंट देखना, परिवार में तनाव और सकारात्मक मार्गदर्शन का अभाव भी बुलिंग की प्रवृत्ति बढ़ा सकते हैं।
     

कुछ बच्चों के साथ बुलिंग होने का खतरा अधिक होता है। 

  • जो बच्चे समाज के ऐसे वर्गों से आते हैं जिन्हें अक्सर भेदभाव या उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। 
  • इसके अलावा आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे, अलग जेंडर पहचान रखने वाले बच्चे, किसी शारीरिक या मानसिक दिव्यांगता से जूझ रहे बच्चे भी बुलिंग का ज्यादा शिकार बन सकते हैं।


अमर उजाला से बातचीत में वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ सत्यकांत त्रिवेदी बताते हैं, बुलिंग का बच्चों पर गंभीर और लंबे समय तक रहने वाला असर पड़ सकता है। इसका बच्चों के भावनात्मक और मानसिक स्वास्थ्य को भी गहराई से प्रभावित करती है।
 

  • ऐसे बच्चे डिप्रेशन,एंग्जायटी, आत्मविश्वास में कमी और अकेलेपन जैसी समस्याओं का सामना कर सकते हैं। 
  • कई मामलों में यह स्थिति इतनी गंभीर हो सकती है कि बच्चा नशे जैसी गलत आदतों की ओर बढ़ने लगे या उसकी पढ़ाई और स्कूल में प्रदर्शन भी प्रभावित होने लगे।
     

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बच्चों में बुलिंग की समस्या - फोटो : Amarujala.com/AI

अध्ययन में क्या पता चला?

यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा के अध्ययन में सामने आया कि बुलिंग और साथ पढ़ने वाले बच्चों द्वारा बार-बार परेशान किया जाना छोटे बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकता है। यहां तक कि इससे बच्चों में ट्रॉमा यानी किसी दर्दनाक अनुभव के बाद लंबे समय तक रहने वाला मानसिक और भावनात्मक आघात भी विकसित हो सकता है।

जर्नल ऑफ क्लिनिकल चाइल्ड एंड एडोलसेंट साइकोलॉजी में प्रकाशित रिपोर्ट में पाया गया कि जिन बच्चों ने अपने साथियों द्वारा परेशान किए जाने का अनुभव किया, उनमें से 40% से अधिक बच्चों में ऐसे मानसिक लक्षण पाए गए जो चिकित्सकीय रूप से गंभीर माने जाते हैं।

अध्ययन के प्रमुख लेखक और यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा के कॉलेज ऑफ एजुकेशन में सहायक प्रोफेसर जॉन.एल.कूली कहती हैं, अक्सर लोग बुलिंग को बच्चों के बड़े होने की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा मान लेते हैं, लेकिन इस रिसर्च से पता चलता है कि कई बच्चों के लिए यह अनुभव वास्तव में बेहद नुकसानदायक हो सकता है।

इस अध्ययन में तीसरी से पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाले 250 बच्चों को शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने पूरे शैक्षणिक सत्र के दौरान बच्चों के अनुभवों पर नजर रखी। उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि बच्चों के साथियों द्वारा उन्हें किस तरह परेशान किया जाता है और इसका उनके मानसिक स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है?
 

  • रिसर्च में पाया गया कि स्कूल सत्र की शुरुआत में ही लगभग 10 में से 9 बच्चों ने कम से कम एक बार साथियों द्वारा परेशान किए जाने का अनुभव किया था।
  • शोधकर्ताओं के अनुसार, कई बच्चे उस घटना के बारे में सोचने से बचने लगते हैं या लोगों से दूरी बनाने लगते हैं। वहीं कुछ बच्चों को बार-बार वही घटनाएं याद आती रहती हैं, उन्हें नींद आने में परेशानी होती है या वे हर समय असुरक्षित और तनाव में महसूस करते हैं।


बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव छह महीने से भी अधिक समय तक बना रहा। इससे संकेत मिलता है कि ऐसे अनुभव लंबे समय तक मानसिक परेशानियों का कारण बन सकते हैं। यह बात केवल बुलिंग ही नहीं, बल्कि साथियों द्वारा परेशान किए जाने के लगभग हर रूप में देखने को मिली।

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क्या कहते हैं डॉक्टर - फोटो : freepik

इस तरह की घटनाओं को कैसे रोका जा सकता है?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि माता-पिता और शिक्षकों को बच्चों से उनके दोस्तों और स्कूल के अनुभवों के बारे में खुलकर बात करनी चाहिए।
 

  • अगर कोई बच्चा यह बताता है कि उसे स्कूल या ऑनलाइन परेशान किया जा रहा है, तो उसकी बात को हल्के में नहीं लेना चाहिए। समय रहते उसकी बात सुनना, उस पर विश्वास करना और जरूरी मदद उपलब्ध कराना, बच्चे को लंबे समय तक रहने वाले मानसिक नुकसान से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।


डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी कहते हैं, बुलिंग के मामलों को रोकने के लिए देश को अब स्कूलों में भी कॉलेजों की एंटी-रैगिंग नीति की तर्ज पर एक प्रभावी एंटी-बुलीइंग नीति की आवश्यकता है। इसका उद्देश्य केवल बुली करने वाले बच्चों को दंडित करना नहीं, बल्कि उनके व्यवहार के कारणों को समझकर समय रहते सुधारना भी होना चाहिए।

साथ ही प्रत्येक स्कूल में अभिभावकों और बच्चों के लिए नियमित जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएं, जहां बच्चों को सिखाया जाए कि बुलीइंग का सामना कैसे करें, मदद कैसे मांगें और किसी साथी के साथ बुलीइंग होते देखकर संवेदनशील हस्तक्षेप कैसे करें। सुरक्षित स्कूल केवल अच्छे अंकों से नहीं, बल्कि सम्मान, सहानुभूति और भावनात्मक सुरक्षा की संस्कृति से बनते हैं।



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स्रोत: 
School bullying and mental health among adolescents: a narrative review


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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