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भारत में कोरोना से ज्यादा इस जानलेवा बीमारी से मर रहे हैं लोग, हर रोज होती हैं 1,300 मौतें

Mon, 24 Aug 2020 10:35 PM IST
सोनू शर्मा लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सोनू शर्मा Updated Mon, 24 Aug 2020 10:35 PM IST
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More people are dying from TB disease than coronavirus in India
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

करीब एक साल पहले तक मुंबई में रहने वाले 41 वर्षीय पंकज भवनानी की जिंदगी बेहतरीन चल रही थी। पत्नी राखी और दो जुड़वा बच्चों के साथ कॉर्पोरेट जगत में एक अच्छे ओहदे की नौकरी जारी थी, लेकिन तभी अक्तूबर, 2019 में उन्हें ट्यूबरक्लोसिस (टीबी) यानी तपेदिक की बीमारी का पता चला। टीबी ने पंकज के फेफड़ों पर हमला किया था और छह महीने के इलाज के बाद पंकज ने 80 फीसदी रिकवरी भी कर ली। पर मुसीबतें और भी आनी थीं। 



फरवरी के टेस्ट में पता चला कि टीबी बैक्टीरिया ने पंकज के ब्रेन (दिमाग) को संक्रमित कर दिया है और तीन महीने के भीतर पंकज की आंखों की रौशनी चली गई और पैरों का संतुलन बिगड़ने लगा। उन्होंने बताया, 'लॉकडाउन खत्म हो चुका था और 16 जुलाई के दिन छह घंटों तक मेरी ब्रेन सर्जरी की गई और इंफेक्शन को साफ किया गया। 10 दिनों तक अस्पताल में बहुत स्ट्रॉन्ग दवाओं पर रखने के बाद मुझे डिस्चार्ज किया गया और पूरे साल इस कोर्स की हिदायत दी गई।'  

More people are dying from TB disease than coronavirus in India
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

बड़ी मुसीबत ने फिर घेरा, क्योंकि इसके एक हफ्ते बाद बाजार या सरकारी अस्पतालों में दवा मिल ही नहीं सकी। पंकज भवनानी बताते हैं, 'टीबी का इलाज कराने वालों का ट्रीटमेंट अगर बीच में रुका तो बीमारी ठीक नहीं होती और उनकी जान जाएगी। जब दवा खत्म होने लगी और कहीं से नहीं मिल रही थी तो पांच रातों तक मेरी फैमिली में कोई नही सोया। डर बढ़ रहा था कि कहीं मैं बच्चों को संक्रमित न कर दूं।' 

पंकज के परिवार और नियोक्ता कंपनी ने प्रधानमंत्री कार्यालय, महाराष्ट्र सरकार, सभी बड़े अस्पतालों और कई निजी संस्थानों से दवा की गुहार लगाई। दिक्कत यही थी कि ये दवा जापान से आयात होती थी और कोरोना वायरस के वैश्विक संकट के चलते सप्लाई बाधित थी। पत्नी राखी के ट्वीटों की बदौलत बात फैली और आखिरकार उन्हें दवा मिल सकी। उस कठिन दौर को याद करके भावुक हो जाने पर पंकज ने कहा, 'कुछ दिन तो लगा कि अब टीबी जान ही लेकर रहेगा।' 

More people are dying from TB disease than coronavirus in India
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

ट्यूबरक्लोसिस

विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO के मुताबिक, हर साल दुनिया में रिपोर्ट होने वाले ट्यूबरकुलोसिस के कुल मामलों में से एक-तिहाई भारत में होते हैं और देश में इस बीमारी से सालाना 4,80,000 मौतें भी होती हैं। आंकड़ों को ब्रेक करने पर स्थिति और भी खतरनाक लगती है, क्योंकि भारत सरकार का आकलन है कि देश में टीबी के चलते रोजाना 1,300 मौतें होती हैं। हालांकि भारत पिछले 50 सालों से टीबी की रोकथाम में लगा हुआ है, लेकिन अब भी इसे 'साइलेंट किलर' के नाम से ही जाना जाता है। 

और ये कोरोना वायरस के दस्तक देने से पहले का आकलन है। जनवरी के आखिरी हफ्ते के बाद से भारत में कोरोना के मामले बढ़ने शुरू हुए थे और 24 मार्च को देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा हुई थी। सरकारी आंकड़ों की तुलना करने पर पता चलता है कि कोरोना वायरस के चलते टीबी के मरीजों की रिपोर्टिंग या नोटिफिकेशन के मामलों (इसमें निजी और सरकारी, दोनों अस्पताल शामिल हैं) में अप्रत्याशित गिरावट दर्ज की है और मामले गिर कर लगभग आधे पर आ गए हैं। 

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More people are dying from TB disease than coronavirus in India
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात के अलावा बिहार भी उन राज्यों में शामिल हैं, जहां ट्यूबरक्लोसिस से काफी मामले इलाज के लिए रिपोर्ट होते हैं। लेकिन बिहार के प्रमुख टीबी अधिकारी डॉक्टर केएन सहाय के अनुसार, 'सारा फोकस कोविड-19 डाययग्नोसिस में शिफ्ट करना पड़ गया।'

उन्होंने कहा, 'स्टाफ की पहले भी कमी थी। पिछले महीनों में उन्हें कोविड केयर सेंटर और होम-टू-होम सैम्पल कलेक्शन वगैरह में शिफ्ट कर दिए गए। ये तो मैंने सरकारी सेंटर्स की बात बताई है, प्राइवेट में भी सारे टीबी क्लीनिक लगभग बंद थे। इन सारी चीजों ने मिलकर हमारी केस नोटिफिकेशन में काफी गिरावट कर दी, 30 फीसदी से भी ज्यादा की।'

पंकज भवनानी की तरह कोविड-19 महामारी के दौरान बहुत से ऐसे मरीज थे, जिनको दवाओं-सुविधाओं में बहुत दिक्कत हुई, अस्पतालों तक पहुंच नहीं सके। बहुत से ऐसे भी थे जो मिसिंग बताए जा रहे हैं यानी जिनका इलाज बीच में छूट गया। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

संक्रमण का खतरा

अब डर इस बात का भी है कि उनसे कम्यूनिटी में टीबी का स्प्रेड और बढ़ सकता है। शाकिब खान (नाम बदला हुआ) का परिवार गाजियाबाद-नोएडा सीमा पर बसे खोड़ा गांव में तीन साल से रह रहा था। उनके 71 वर्षीय पिता का टीबी का इलाज दिल्ली के पटेल चेस्ट अस्पताल में जारी था। दिहाड़ी का काम करने वाले शाकिब को लॉकडाउन के दौरान घर चलाने में दिक्कत आई और अपने दूसरे पड़ोसियों की तरह वे भी इसके खत्म होते ही परिवार-पिता के साथ बिजनौर के अपने गांव के लिए पलायन कर गए। उन्होंने फोन पर बताया, 'पिता की दवा लॉकडाउन में ही खत्म हो गई थी। दोबारा इलाज शुरू करवाने में तीन हफ्ते का टाइम बीत गया। डॉक्टर कह रहे हैं कि दोबारा 12 महीने दवा खानी पड़ेगी।' 

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