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MP News: मोहन भागवत बोले-मत-पंथ,भाषा,जाति अलग हो सकती है, लेकिन हिंदू पहचान हमें जोड़ती है
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
Published by: आनंद पवार
Updated Fri, 02 Jan 2026 08:44 PM IST
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सार
भोपाल के रवींद्र भवन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि भारत की ताकत एकजुट हिंदू समाज में है, और संघ का काम लोगों में चरित्र, संयम और देशभक्ति जगाना है। उन्होंने सभी को अपनी संस्कृति, परिवार और देश के लिए समर्पित होने का आह्वान किया।
संघ प्रमुख मोहन भागवत
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
भोपाल के रवींद्र भवन में आयोजित कार्यक्रम में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपने उद्बोधन में समाज में एकता, अनुशासन और आत्मगौरव की बात कहीं। उन्होंने कहा कि संघ किसी मिलिट्री या सेवा संगठन की तरह नहीं है, बल्कि यह समाज के लोगों में चरित्र, संयम और जिम्मेदारी विकसित करता है। उन्होंने संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार के स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान और उनकी सामाजिक कार्यप्रणाली का उदाहरण भी दिया। भागवत ने कहा कि भारत पर आक्रमण बार-बार हुए क्योंकि हम एकजुट नहीं थे, और आज भी देश की मजबूती के लिए एकता आवश्यक है।
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उन्होंने कहा कि भारत केवल भूगोल नहीं है, बल्कि यह एक विशेष स्वभाव और संस्कृति का प्रतीक है। हमारे मत-पंथ, सम्प्रदाय, भाषा, जाति अलग हो सकती है। लेकिन हिन्दू पहचान हम सबको जोड़ती है। हम सबकी एक संस्कृति और धर्म है। हम सबके पूर्वज समान हैं। जब देश संकट में होता है, तो हम एकजुट होकर खड़े होते हैं। जिन्होंने देश के लिए बलिदान दिया, उन्हें सभी सम्मान की दृष्टि से देखते हैं, चाहे वे किसी भी पंथ के हों। मोहन भागवत ने हिंदू समाज को चार प्रकार में बताया कि एक वे जो गर्व से कहते हैं, “हम हिंदू हैं। दूसरे वे जो सोचते हैं, “गर्व की क्या आवश्यकता है। तीसरे, वे जो कहते हैं, “घर आएं तब बताऊंगा कि मैं हिंदू हूं। और चौथे वे जो भूल गए हैं कि हम हिंदू हैं। पहले और दूसरे समूह को संगठित करना प्राथमिकता है, बाकी को बाद में शामिल कर लेंगे। जो भूल गए हैं, उन्हें भी समय आने पर याद आएगा। समाज का संगठन ही देश के भाग्य को निर्धारित करता है।
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उन्होंने कहा कि जिन देशों में एकता और गुणवत्ता की कमी आई, उनका पतन हुआ। जिनमें यह मजबूत रही, उनका उत्थान हुआ। भागवत ने संघ की शाखाओं में अनुशासन, सामाजिक सेवा, परिवार में समरसता, भजन, स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और पारंपरिक सामाजिक नियमों के पालन पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि समाज में जितना भी बुरा हो रहा है, उससे कहीं अधिक अच्छा कार्य भी हो रहा है, बस लोगों को जागरूक होकर एकजुट होना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ, विद्या भारती या राजनीतिक दल नहीं है, बल्कि यह समाज के लिए त्याग और समर्पण का संगठन है। उन्होंने सभी से आग्रह किया कि अपने समाज, परिवार और देश के लिए समय दें, अपने पारिवारिक और सामाजिक कर्तव्यों को निभाएं, और भाषा, भोजन और संस्कृति के माध्यम से अपनी पहचान बनाए रखें। भागवत ने कहा कि हमारा देश बड़ा बनाने का कार्य हमें ही करना है; कोई दूसरा नहीं करेगा।” उनके शब्दों ने समाज में जागरूकता, जिम्मेदारी और एकता की भावना को मजबूत किया।
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उन्होंने कहा कि भारत केवल भूगोल नहीं है, बल्कि यह एक विशेष स्वभाव और संस्कृति का प्रतीक है। हमारे मत-पंथ, सम्प्रदाय, भाषा, जाति अलग हो सकती है। लेकिन हिन्दू पहचान हम सबको जोड़ती है। हम सबकी एक संस्कृति और धर्म है। हम सबके पूर्वज समान हैं। जब देश संकट में होता है, तो हम एकजुट होकर खड़े होते हैं। जिन्होंने देश के लिए बलिदान दिया, उन्हें सभी सम्मान की दृष्टि से देखते हैं, चाहे वे किसी भी पंथ के हों। मोहन भागवत ने हिंदू समाज को चार प्रकार में बताया कि एक वे जो गर्व से कहते हैं, “हम हिंदू हैं। दूसरे वे जो सोचते हैं, “गर्व की क्या आवश्यकता है। तीसरे, वे जो कहते हैं, “घर आएं तब बताऊंगा कि मैं हिंदू हूं। और चौथे वे जो भूल गए हैं कि हम हिंदू हैं। पहले और दूसरे समूह को संगठित करना प्राथमिकता है, बाकी को बाद में शामिल कर लेंगे। जो भूल गए हैं, उन्हें भी समय आने पर याद आएगा। समाज का संगठन ही देश के भाग्य को निर्धारित करता है।
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उन्होंने कहा कि जिन देशों में एकता और गुणवत्ता की कमी आई, उनका पतन हुआ। जिनमें यह मजबूत रही, उनका उत्थान हुआ। भागवत ने संघ की शाखाओं में अनुशासन, सामाजिक सेवा, परिवार में समरसता, भजन, स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और पारंपरिक सामाजिक नियमों के पालन पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि समाज में जितना भी बुरा हो रहा है, उससे कहीं अधिक अच्छा कार्य भी हो रहा है, बस लोगों को जागरूक होकर एकजुट होना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ, विद्या भारती या राजनीतिक दल नहीं है, बल्कि यह समाज के लिए त्याग और समर्पण का संगठन है। उन्होंने सभी से आग्रह किया कि अपने समाज, परिवार और देश के लिए समय दें, अपने पारिवारिक और सामाजिक कर्तव्यों को निभाएं, और भाषा, भोजन और संस्कृति के माध्यम से अपनी पहचान बनाए रखें। भागवत ने कहा कि हमारा देश बड़ा बनाने का कार्य हमें ही करना है; कोई दूसरा नहीं करेगा।” उनके शब्दों ने समाज में जागरूकता, जिम्मेदारी और एकता की भावना को मजबूत किया।

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