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2 October: दमोह में महात्मा गांधी ने रखी थी गुरुद्वारे की नींव, कार से घूमा था शहर, देखने उमड़े थे हजारों लोग
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दमोह
Published by: दमोह ब्यूरो
Updated Thu, 02 Oct 2025 06:04 PM IST
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सार
महात्मा गांधी 1933 में दमोह आए थे, जहां उन्होंने गडरयाऊ मोहल्ले में गुरुद्वारे की नींव रखी और सद्भावना का संदेश दिया। उन्हें शहर में डॉक्टर दुआ की शेवरेले कार से घुमाया गया। इसी दौरान “एक चवन्नी चांदी की, जय बोल महात्मा गांधी की” नारे की शुरुआत हुई, जो पूरे देश में प्रचलित हुआ।
गुरुद्वारे में रखी बापू की प्रतिमा
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विस्तार
आज पूरा देश बापू की 156वीं जयंती पर उन्हें याद कर रहा है। वहीं दमोह में भी लोग आज बापू की पुरानी यादों की चर्चा कर रहे हैं, क्योंकि दमोह में 1933 में महात्मा गांधी का आगमन हुआ था और यहां गडरयाऊ मोहल्ले में गुरुद्वारे की नींव उन्होंने रखी थी। बापू यहां जो सद्भावना का संदेश देकर गए थे, वह आज भी यहां के लोगों की संकल्पशक्ति बना हुआ है। यहां गुरुद्वारे में ही बापू की प्रतिमा स्थापित की गई है। इससे यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु जहां गुरुग्रंथ साहब के समक्ष मत्था टेकते हैं, वहीं बापू को भी नमन करते हैं।
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सेवरेले कार से घूमा था दमोह
देश के राष्ट्रपिता और आजादी के अहिंसा वादी योद्धा महात्मा गांधी 1933 में जब पहली बार दमोह आए थे उस समय की सबसे महंगी कार सेवरेले में उन्हें शहर का भ्रमण कराया गया था। इतना ही नहीं उन्हें गढ़ाकोटा से दमोह तक उसी कार से लाया गया था। वह कार दमोह के प्रतिष्ठित डॉक्टर दुआ की थी और तब के चालक जगन्नाथ पटेरिया थे। दमोह पहुंचकर गांधी जी ने शहर के मोरगंज गल्ला मंडी में सभा आयोजित की थी। इसमें करीब 10 हजार लोग शामिल हुए थे। उसके बाद जब वह मलिन बस्ती वर्तमान में गडरयाऊ मोहल्ला पहुंचे थे और वहां उन्होंने गुरुद्वारे की नींव रखी थी। आज भी उस गुरुद्वारे का संचालन वाल्मीकि समाज द्वारा किया जा रहा है।
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दादा की थी कार
शहर के प्रतिष्ठित शिशु रोग विशेषज्ञ डॉक्टर तरुण दुआ बताते हैं कि उनके दादा डाक्टर बीडी दुआ उस समय जेल डॉक्टर थे, लेकिन गांधी जी से प्रभावित होकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी थी और देश की आजादी के लिए कूद पड़े थे। दमोह आने से पहले गांधी जी गढ़ाकोटा में रुके थे जहां से उन्हें दमोह आना था। इसलिए उनके दादा ने करीबी जगन्नाथ पटेरिया को अपनी शेवरेले कार दी और कहा कि वह गांधी जी को इसी कार से दमोह लेकर आएं। पटेरिया भी देशभक्त थे और हमेशा खादी पहनते थे गांधी जी भी केवल खादी पहनते थे। उस समय उनके दादा की कार में चमड़े के सीट कवर थे। इसलिए उन्हें निकालकर खादी के कपड़े के सीट कवर लगाए गए और फिर गांधी जी को गढ़ाकोटा से दमोह लाया गया। उसी कार से उन्हें दमोह में भ्रमण कराया गया।
डॉक्टर दुआ का कहना है कि जब भी उनके परिजन उन्हें देश की आजादी में दादा का योगदान बताते थे तो उन्हें काफी गर्व होता था। आज भी उन्हें इस बात पर गर्व है कि उनके परिजनों ने भी देश की आजादी में अपना योगदान दिया। हालांकि लंबा समय होने के कारण उनके पास उस समय की कोई फोटो नहीं है।
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दमोह में हुई थी नारे की शुरुआत
गांधी जी के दमोह आगमन के एक प्रत्यक्ष गवाह पूर्व विधायक स्वर्गीय आनंद श्रीवास्तव हमेशा बताते थे कि जब गांधी जी दमोह आए थे उस समय अंग्रेजों ने सिक्के के रूप में एक चांदी की चवन्नी यानी 25 पैसे के चलन को शुरू किया था। उसी चवन्नी को लेकर दमोह में एक नारा तैयार किया गया, जिसमें कहा जाता था एक चवन्नी चांदी की जय बोल महात्मा गांधी की। दमोह में बना यह नारा पूरे देश में चलन में आया था। वे बताते थे कि उस समय वह छोटे थे, लेकिन उन्होंने घंटाघर पर गांधीजी को करीब से देखा था और उस नारे की गूंज सुनी थी। दमोह प्रवास के दौरान गांधीजी ने शहर के गडरयाऊ मोहल्ले में गुरुद्वारे की स्थापना की थी, जिसका एक शिलालेख वहां मौजूद है। गुरुद्वारे की देखरेख वाल्मीकि समाज द्वारा की जाती है।



उस समय का शिलालेख

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