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इंदौर: छात्रों की गूंज के माहौल को वोटबैंक में बदलना कांग्रेस के लिए आसान नहीं

Mon, 21 Sep 2026 06:01 AM IST
Abhishek Chendke न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर Published by: Abhishek Chendke Updated Mon, 21 Sep 2026 06:01 AM IST
सार

इंदौर में छात्रों की गूंज कार्यक्रम में उमड़ी भीड़ ने कांग्रेस को लंबे समय बाद उत्साहित होने का मौका दिया है हालांकि, भीड़ का उत्साह चुनावी वोट में कितना बदल पाएगा, यह कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती होगी। 

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Indore: Converting the atmosphere charged with student voices into a vote bank is not easy for the Congress.
राहुल गांधी - फोटो : amarujala

विस्तार

इंदौर में इस बार छात्रों की गूंज कार्यक्रम कांग्रेस के इतिहास के सफल कार्यक्रमों में गिना जा रहा है। 40 साल पहले जब राजीव गांधी का रोड शो इंदौर में हुआ था, तब भी काफी भीड़ उमड़ी थी। इतने साल बाद इतनी भीड़ देख कांग्रेसी फूले नहीं समा रहे हैं और अब माहौल अपने पक्ष में मान रहे हैं, लेकिन इसे वोट बैंक में तब्दील करना कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा, क्योंकि कांग्रेस नेता चुनाव के समय जमीनी स्तर की तैयारियों में हमेशा कमजोर रहे हैं, जबकि भाजपा की चुनावी तैयारियां बूथ स्तर से बढ़कर पन्ना प्रमुख स्तर पर रहती हैं। कांग्रेस के उम्मीदवार इंदौर में हमेशा अपने दम पर चुनाव लड़ते रहे हैं।

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इससे पहले भी राहुल ने इंदौर में सभाएं कीं, लेकिन उनका भी कभी राजनीतिक लाभ चुनाव में कांग्रेस को नहीं मिला। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के पास चार और भाजपा के पास पांच सीटें थीं।

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2023 के विधानसभा चुनाव के पहले राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में मालवा निमाड़ और इंदौर के हिस्सों का रूट भी शामिल था, लेकिन जब चुनाव परिणाम आए तो इंदौर जिले की 9 सीटों में से एक भी सीट पर कांग्रेस का खाता नहीं खुला। कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष जीतू पटवारी भी अपनी परंपरागत राऊ सीट से विधानसभा चुनाव हार गए। इसके अलावा लोकसभा चुनाव में भी इंदौर के भाजपा उम्मीदवार देश में सबसे ज्यादा वोटों से जीते। कांग्रेस के प्रत्याशी अक्षय बम ने अंतिम तिथि पर नाम वापस लेकर एक तरह से भाजपा को वॉकओवर दे दिया था।
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कभी इंदौर था कांग्रेस का गढ़

इंदौर 70 और 80 के दशक में कांग्रेस का गढ़ रहा है। इंदौर के नेता प्रकाशचंद्र सेठी, सुरेश सेठ, रामसिंह भाई वर्मा की जननेता वाली छवि थी। इंदौर कांग्रेस का गढ़ माना जाता था। नगर निगम से लेकर विधानसभा और लोकसभा स्तर पर कांग्रेस के उम्मीदवार चुनाव जीतते थे, लेकिन 90 के दशक में भाजपा ने अपने पैर जमाना शुरू किए। रामजन्मभूमि आंदोलन में सक्रिय नेताओं की जमीन इस आंदोलन के कारण तैयार हुई थी। उसके बाद भाजपा ने इंदौर में मुड़कर नहीं देखा।

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