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Jabalpur News: तीन दशक बाद हाईकोर्ट ने माना गैर इरादतन हत्या का अपराध, दोषियों की सजा की कम; जानें मामला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
Published by: जबलपुर ब्यूरो
Updated Sun, 13 Jul 2025 06:48 PM IST
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सार
1993 में की गई एक हत्या के मामले में जबलपुर हाईकोर्ट ने दोषियों की आजीवन कारावास की सजा को कम कर सात साल कर दिया। कोर्ट ने जमानत पर रिहा चल रहे तीन दोषियों को सरेंडर करने के आदेश दिए, जबकि सजा पूरी कर चुके एक व्यक्ति को रिहा कर दिया।
जबलपुर हाईकोर्ट
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
हत्या के आरोप में जिला न्यायालय ने चार आरोपियों को तीन दशक पूर्व आजीवन कारावास की सजा सुनाई, जिसके खिलाफ दोषियों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल तथा न्यायमूर्ति एके सिंह की युगलपीठ ने पाया कि यह घटना तत्कालीन विवाद के कारण घटित हुई थी। इसके बाद अदालत ने इसे गैर-इरादतन हत्या मानते हुए जमानत पर रिहा तीन आरोपियों की सजा घटाकर सात वर्ष कर दी और उन्हें जिला न्यायालय में आत्मसमर्पण करने के आदेश दिए। मुख्य आरोपी ने पहले ही 10 वर्ष की सजा पूरी कर ली थी, अतः युगलपीठ ने उसे रिहा करने के आदेश दिए।
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जबलपुर जिला न्यायालय ने वर्ष 1996 में हत्या के अपराध में बुद्धू, मुन्ना, इमरत और बिरजू को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। अपील की सुनवाई के दौरान युगलपीठ ने पाया कि अप्रैल 1993 को ग्राम करहैया, थाना बेलखेड़ा निवासी 60 वर्षीय नक्कू अपनी भैंस को पानी पिलाने के लिए सरकारी हैंडपंप पर ले गया था। इस दौरान आरोपी बुद्धू ने विरोध किया और कुल्हाड़ी से उसके सिर पर हमला कर दिया। अन्य आरोपियों ने लाठियों से हमला किया। नक्कू को बचाने उसके भाई कंधीलाल और टट्टू आए, जिन पर भी हमला कर उन्हें घायल कर दिया गया। इस घटना में नक्कू की मौत हो गई।
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अपील में कहा गया कि गवाहों और चिकित्सा साक्ष्य में विरोधाभास हैं। घटना सुबह लगभग साढ़े आठ बजे की थी। नक्कू को पहले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहां 10:30 बजे डॉक्टर ने मेडिकल कॉलेज रेफर किया, जो दोपहर 12:30 बजे वहां पहुंचाया गया। समय पर इलाज न मिलने के कारण उसकी मृत्यु हुई। आरोपियों का हत्या करने का कोई इरादा नहीं था, विवाद के कारण घटना हुई।
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युगलपीठ ने पाया कि आरोपी मुन्ना 3 साल 10 माह, बिरजू 3 साल, इमरत 4 साल और बुद्धू 10 साल की सजा पहले ही पूरी कर चुके हैं और वर्तमान में जमानत पर हैं। अदालत ने मुन्ना, इमरत व बिरजू की सजा घटाकर 7 साल कर दी और उन्हें शेष सजा काटने के लिए जिला न्यायालय में आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया। बुद्धू को सजा पूर्ण करने के आधार पर रिहा करने के निर्देश दिए गए।

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