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जबलपुर: पूर्व जिला न्यायाधीश ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति को दी चुनौती, नियम बदलने पर उठाए सवाल,16 नवंबर को सुनवाई
Fri, 16 Oct 2026 11:19 AM IST
जबलपुर ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
Published by: जबलपुर ब्यूरो
Updated Fri, 16 Oct 2026 11:19 AM IST
सार
8 साल पहले अनिवार्य सेवानिवृत्त किए गए पूर्व जिला न्यायाधीश ने हाईकोर्ट में फैसले को चुनौती दी है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सेवानिवृत्ति से ठीक पहले सेवा नियमों में बदलाव कर उन्हें इसका आधार बनाया गया।
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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
विस्तार
जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद से अनिवार्य सेवानिवृत्ति दिए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने न्याय मित्र नियुक्त किया है। याचिकाकर्ता आर.के. श्रीवास ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि उन्हें निर्धारित सेवा नियमों के विपरीत अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी गई थी। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता हेमंत श्रीवास्तव को न्याय मित्र नियुक्त किया है। मामले की अगली सुनवाई 16 नवंबर को निर्धारित की गई है।
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2018 में दी गई थी अनिवार्य सेवानिवृत्ति
याचिकाकर्ता आर.के. श्रीवास की ओर से दायर याचिका में बताया गया है कि उन्होंने वर्ष 2000 में न्यायिक सेवा में प्रवेश किया था। उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) में उन्हें प्रतिवर्ष बी और सी ग्रेड मिले थे। इसके आधार पर वर्ष 2016 में उन्हें उच्च न्यायिक सेवा में पदोन्नत कर जिला न्यायाधीश (प्रारंभिक स्तर) बनाया गया था। याचिका के मुताबिक उच्च न्यायिक सेवा में करीब डेढ़ साल के कार्यकाल के दौरान उनका चार बार स्थानांतरण किया गया। इसके अलावा उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू कर उन्हें निलंबित भी कर दिया गया। बाद में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की फुल बेंच की सिफारिश पर अप्रैल 2018 में उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी गई।
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सेवा नियमों के उल्लंघन का आरोप
याचिका में दावा किया गया है कि मध्य प्रदेश उच्च न्यायिक सेवा (भर्ती और सेवा की शर्तें) नियम, 2017 के नियम 14 के उपनियम 2 के तहत अनिवार्य सेवानिवृत्ति के लिए संबंधित अधिकारी की सेवा के 10 वर्ष पूरे होना या उसकी आयु 50 वर्ष होना आवश्यक था। याचिकाकर्ता का तर्क है कि सिविल जज और मजिस्ट्रेट के रूप में निचली न्यायपालिका में बिताई गई सेवा अवधि को उच्च न्यायिक सेवा की अवधि के साथ नहीं जोड़ा जा सकता था। ऐसे में उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने के लिए लागू नियमों और उनकी पात्रता पर विचार किया जाना चाहिए था।
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सेवानिवृत्ति से पहले नियमों में बदलाव पर उठाए सवाल
याचिका में यह भी कहा गया है कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति दिए जाने से करीब एक महीने पहले मार्च 2018 में प्रभावी हुए संशोधनों के जरिए वर्ष 1994 के सेवा नियमों में बदलाव किया गया था। इन संशोधनों के तहत अनिवार्य सेवानिवृत्ति के लिए आवश्यक सेवा अवधि 20 वर्ष से घटाकर 10 वर्ष कर दी गई थी, जबकि 50 वर्ष की आयु सीमा यथावत रखी गई थी।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि नियमों में यह बदलाव उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने के उद्देश्य से किया गया था। उन्होंने अपनी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा है कि निचली और उच्च न्यायपालिका में अपने पूरे सेवाकाल के दौरान उन्हें बी या सी ग्रेड मिले थे, जिन्हें याचिका में अच्छा या बहुत अच्छा बताया गया है।
अगली सुनवाई 16 नवंबर को
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की युगलपीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता हेमंत श्रीवास्तव को न्याय मित्र नियुक्त किया है, ताकि न्यायालय को मामले के कानूनी पहलुओं पर सहायता मिल सके। अब इस मामले में अगली सुनवाई 16 नवंबर को होगी। फिलहाल याचिकाकर्ता की ओर से नियमों के उल्लंघन और अनिवार्य सेवानिवृत्ति की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं। इन आरोपों पर हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय आना बाकी है।
