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Rajgarh News: जाति प्रमाण पत्र विवाद में नया मोड़, इंदौर हाईकोर्ट में मंत्री पक्ष ने पेश किए नए दस्तावेज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, राजगढ़
Published by: राजगढ़ ब्यूरो
Updated Thu, 05 Mar 2026 10:54 PM IST
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सार
इंदौर हाईकोर्ट में गौतम टेटवाल के जाति प्रमाण पत्र विवाद पर सुनवाई टली। याचिकाकर्ता ने फर्जी प्रमाण पत्र का आरोप लगाया, जबकि मंत्री पक्ष ने नए दस्तावेज पेश किए। एक ही स्कूल से अलग-अलग जाति रिकॉर्ड पर अदालत ने गहन जांच के संकेत दिए हैं।
जाति प्रमाण पत्र विवाद में फंसे राज्यमंत्री गौतम टेटवाल
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विस्तार
सारंगपुर विधायक एवं राज्यमंत्री गौतम टेटवाल के जाति प्रमाण पत्र को लेकर चल रहे विवाद में इंदौर हाईकोर्ट में गुरुवार को सुनवाई के दौरान नया मोड़ आ गया। मंत्री पक्ष की ओर से जस्टिस जयकुमार पिल्लई की एकलपीठ के समक्ष हलफनामे के साथ नए दस्तावेज प्रस्तुत किए गए, जिसके बाद निर्धारित सुनवाई फिलहाल टाल दी गई है। मामले ने अब कानूनी और राजनीतिक दोनों हलकों में हलचल पैदा कर दी है।
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यह पूरा प्रकरण गुना निवासी कोमलप्रसाद शाक्य द्वारा दायर रिट याचिका क्रमांक 21875/2024 से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि विधायक टेटवाल ने फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर चुनाव लड़ा और लाभ प्राप्त किया। उन्होंने अपने आरोपों के समर्थन में कई दस्तावेज न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए हैं, जिनमें पिता की सर्विस बुक, परिवार की वंशावली, नगर पालिका के रिकॉर्ड तथा सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत प्राप्त स्कॉलर पंजी शामिल हैं।
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मामले में सबसे अहम बिंदु एक ही स्कूल से जारी दो अलग-अलग जाति संबंधी प्रविष्टियों का है। याचिकाकर्ता का दावा है कि मंत्री के पुराने स्कूली दस्तावेजों में उनकी जाति ‘जीनगर’ और वर्ग ‘पिछड़ा’ दर्ज है। वर्ष 2007 और 2013 में आरटीआई के माध्यम से प्राप्त रिकॉर्ड में भी यही जानकारी अंकित होने का उल्लेख किया गया है। इसके विपरीत, अब स्कूल प्राचार्य की ओर से एक अन्य प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया गया है, जिसमें उनकी जाति कुछ और दर्ज बताई गई है।
इतना ही नहीं, बचाव पक्ष ने वर्ष 2011 की तारीख वाला एक प्रमाण पत्र भी अदालत में पेश किया है, जिसमें दूसरी जाति अंकित है। नगर पालिका के दाखिला रिकॉर्ड में भी मंत्री के दादा की जाति भी वही दर्ज होने का दावा किया गया है। हालांकि, याचिकाकर्ता ने इन नए दस्तावेजों की सत्यता पर सवाल उठाते हुए उन्हें संदिग्ध करार दिया है और स्वतंत्र जांच की मांग की है। न्यायालय में दोनों पक्षों के तर्कों के बीच अब यह सवाल प्रमुख हो गया है कि आखिर एक ही शैक्षणिक संस्थान से दो भिन्न रिकॉर्ड कैसे जारी हुए। अदालत ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अगली सुनवाई तक सभी दस्तावेजों की गहन जांच का संकेत दिया है।

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