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Ujjain News: प्रो. त्रिपाठी बोले- संस्कृत पूजा-विधान से बढ़कर आम जनमानस और लोकपरंपरा की जीवंत भाषा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
Published by: उज्जैन ब्यूरो
Updated Tue, 18 Nov 2025 09:24 PM IST
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सार
प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने कहा कि संस्कृत केवल धर्म-पूजा की भाषा नहीं, बल्कि लोकजीवन की जीवंत भाषा है। 19वीं सदी तक गांवों में आमजन संस्कृत समझते थे। खजुराहो जैसे मंदिर आम कलाकारों ने बनाए। योगेश्वर भट्ट आदि की रचनाओं में गृहस्थी की सजीव झलक मिलती है। काव्य का उद्देश्य जनशिक्षण है।
संस्कृत विश्वविद्यालय नई दिल्ली के पूर्व कुलपति प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी
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विस्तार
संस्कृत केवल पूजा-विधान और धर्म चिंतन की भाषा नहीं है, बल्कि भारत के आम जनमानस लोक जीवन और लोक परंपरा की जीवित भाषा है। संस्कृत को केवल अनुष्ठानों तक सीमित समझना औपनिवेशिक काल में फैलाई गई गलत धारणा थी, जिसने इस भाषा के वास्तविक व्यापक स्वरूप को छिपा दिया। उन्नीसवीं शताब्दी तक गांवों में पंडित ही नहीं सामान्य लोग भी संस्कृत भाषा को समझते थे, गांवों में शास्त्र-विचार होते थे और संस्कृत में ऐसी रचनाएं लगातार बनती थीं, जो जनमानस के जीवन से सीधे जुड़ती थीं।
ये विचार केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय नई दिल्ली के पूर्व कुलपति प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने स्व. कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ की प्रेरणा और पद्मभूषण डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन की स्मृति में भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित 23 वीं अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला के दूसरे दिन प्रमुख वक्ता के रूप में डिजिटली व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि कई लोकगीत और लोक-कविताएं ऐसी थीं जिन्हें राजाश्रय भले न मिला हो, लेकिन वे जनता की स्मृति में सदैव जीवित रहीं।
कार्यक्रम की औपचारिक शुरूआत सद्भावना एवं देशभक्ति पूर्ण गीतों से हुई। दीप प्रज्जवलन प्रमुख वक्ता प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी, उनकी धर्मपत्नी प्रो. सत्यवती त्रिपाठी, पूर्व कुलगुरु विक्रम विश्वविद्यालय प्रो. बालकृष्ण शर्मा, वरिष्ठ रंगकर्मी सतीश दवे, मोटिवेशनल स्पीकर निर्मल भटनागर ने किया। अतिथि स्वागत संस्था प्रमुख युधिष्ठिर कुलश्रेष्ठ, डॉ. सदानंद त्रिपाठी, डॉ. शैलेंद्र पाराशर, डॉ. संतोष पंडया, प्रभु चौधरी, डॉ. अमिता मंडलोई ने किया। सभागार में डॉ शिव चौरसिया, आचार्य श्रीराम दवे, अनिल दास, गोपाल कृष्ण निगम, विनोद काबरा, डॉ. परवीन चोपड़ा, डॉ. पुष्पा चौरसिया, सुंदरलाल मालवीय, डॉ. भूमिका सक्सेना सहित अनेक गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति रही।
ये भी पढ़ें- जनता के दबाव में झुकी सरकार, दो दिन से जारी बंद के बाद ममलेश्वर लोक प्रोजेक्ट फिलहाल रद्द
खजुराहो जैसे मंदिरों का निर्माण राजाओं ने नहीं सामान्य कलाकारों ने किया
संस्कृत कविता में लोक जीवन विषय पर अपनी बात रखते हुए प्रोफेसर राधावल्लभ त्रिपाठी ने कहा कि खजुराहो जैसे भव्य मंदिरों का निर्माण राजाओं ने नहीं बल्कि सामान्य जन के कलाकारों ने किया था और इसी आमजन के श्रम सौंदर्य-बोध और संवेदना की झलक संस्कृत के अनेक काव्यों में स्पष्ट मिलती है। यद्यपि पारंपरिक अध्ययन में इस लोकधारा को अक्सर उपेक्षित रखा गया। उन्होंने महान कवि योगेश्वर भट्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी रचनाओं में मध्यमवर्गीय परिवारों का जीवन अद्भुत जीवंतता के साथ प्रकट होता है। बरसात में घर बचाने की चिंता, गृहस्थी की चुनौतियां और परिवारों के छोटे-छोटे प्रसंग उनकी कविताओं में इतने सहज और मार्मिक रूप में आते हैं कि लगता है जैसे आज के समाज का ही चित्र सामने खिंच रहा हो। संस्कृत भाषा की विशिष्ट सांस्कृतिक संवेदनाओं को समझाते हुए उन्होंने कहा कि संस्कृत में वर्षा का वर्णन केवल पानी बरसने के रूप में नहीं, बल्कि देव के बरसने के रूप में किया जाता है। यह मनुष्य प्रकृति और देवत्व के अद्भुत सांस्कृतिक एकात्म का प्रतीक है और संस्कृत की विशिष्ट मानसिकता का संकेत भी। उन्होंने बताया कि संस्कृत के लोकसाहित्य में बच्चों के खेल, ग्रामीण जीवन की समस्याएं, प्राकृतिक आपदाओं से जूझते परिवारों की पीड़ा, भूख और अभाव की स्थितियां तथा ग्रामीण समाज की संवेदनाएं अत्यंत सजीव रूप में उपस्थित हैं। अनेक ऐसे श्लोक हैं जिन्हें कवियों और संकलकों ने कठिन संघर्ष के बाद संरक्षित किया है और उन्हीं के प्रयासों से लोकजीवन से जुड़ी यह साहित्यिक विरासत आज तक सुरक्षित है। व्याख्यान के अंतिम हिस्से में उन्होंने कहा कि संस्कृत को केवल धर्म की भाषा मानकर हम उसके लोकचरित्र और मानवीय व्यापकता को सीमित कर देते हैं, जबकि संस्कृत सदियों से लोकजीवन की भाषा रही है और आज भी भारतीय सांस्कृतिक चेतना की धड़कन के रूप में जीवित है।
काव्य का उद्देश्य जनसामान्य को शिक्षित करना
कालिदास अकादमी उज्जैन के निदेशक डॉ. गोविंद गंधे ने कहा कि काव्य नि:संदेह लोक का प्रतिबिंब है और संस्कृत काव्य के आरंभ से ही उसका मूल स्वर लोकजीवन की अनुभूति से जुड़ा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आदि कवि वाल्मीकि के रामायण से ही यह परंपरा दिखाई देती है कि संस्कृत काव्य ने जनजीवन की कथा कहने का मार्ग चुना और उसी आधार पर आगे अनेक काव्यशास्त्र और नाट्यशास्त्र विकसित हुए। आचार्य वामन ने काव्य के प्रयोजन पर जो विचार दिए हैं, उनमें यश और अर्थ जैसे लक्ष्यों के साथ-साथ काव्य का एक बड़ा उद्देश्य जनसामान्य को शिक्षित करना, उनके व्यवहार को सुधारना, उन्हें अकल्याण से रक्षा करना और उन्हें आनंद की अनुभूति कराना भी है। जब काव्य का ध्येय लोकहित होता है तो स्वाभाविक रूप से काव्य में लोक की संवेदनाएं, लोक के अनुभव और जीवन की बहुरंगी छवियां स्पष्ट रूप से उभरती हैं।
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ये विचार केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय नई दिल्ली के पूर्व कुलपति प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने स्व. कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ की प्रेरणा और पद्मभूषण डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन की स्मृति में भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित 23 वीं अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला के दूसरे दिन प्रमुख वक्ता के रूप में डिजिटली व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि कई लोकगीत और लोक-कविताएं ऐसी थीं जिन्हें राजाश्रय भले न मिला हो, लेकिन वे जनता की स्मृति में सदैव जीवित रहीं।
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कार्यक्रम की औपचारिक शुरूआत सद्भावना एवं देशभक्ति पूर्ण गीतों से हुई। दीप प्रज्जवलन प्रमुख वक्ता प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी, उनकी धर्मपत्नी प्रो. सत्यवती त्रिपाठी, पूर्व कुलगुरु विक्रम विश्वविद्यालय प्रो. बालकृष्ण शर्मा, वरिष्ठ रंगकर्मी सतीश दवे, मोटिवेशनल स्पीकर निर्मल भटनागर ने किया। अतिथि स्वागत संस्था प्रमुख युधिष्ठिर कुलश्रेष्ठ, डॉ. सदानंद त्रिपाठी, डॉ. शैलेंद्र पाराशर, डॉ. संतोष पंडया, प्रभु चौधरी, डॉ. अमिता मंडलोई ने किया। सभागार में डॉ शिव चौरसिया, आचार्य श्रीराम दवे, अनिल दास, गोपाल कृष्ण निगम, विनोद काबरा, डॉ. परवीन चोपड़ा, डॉ. पुष्पा चौरसिया, सुंदरलाल मालवीय, डॉ. भूमिका सक्सेना सहित अनेक गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति रही।
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खजुराहो जैसे मंदिरों का निर्माण राजाओं ने नहीं सामान्य कलाकारों ने किया
संस्कृत कविता में लोक जीवन विषय पर अपनी बात रखते हुए प्रोफेसर राधावल्लभ त्रिपाठी ने कहा कि खजुराहो जैसे भव्य मंदिरों का निर्माण राजाओं ने नहीं बल्कि सामान्य जन के कलाकारों ने किया था और इसी आमजन के श्रम सौंदर्य-बोध और संवेदना की झलक संस्कृत के अनेक काव्यों में स्पष्ट मिलती है। यद्यपि पारंपरिक अध्ययन में इस लोकधारा को अक्सर उपेक्षित रखा गया। उन्होंने महान कवि योगेश्वर भट्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी रचनाओं में मध्यमवर्गीय परिवारों का जीवन अद्भुत जीवंतता के साथ प्रकट होता है। बरसात में घर बचाने की चिंता, गृहस्थी की चुनौतियां और परिवारों के छोटे-छोटे प्रसंग उनकी कविताओं में इतने सहज और मार्मिक रूप में आते हैं कि लगता है जैसे आज के समाज का ही चित्र सामने खिंच रहा हो। संस्कृत भाषा की विशिष्ट सांस्कृतिक संवेदनाओं को समझाते हुए उन्होंने कहा कि संस्कृत में वर्षा का वर्णन केवल पानी बरसने के रूप में नहीं, बल्कि देव के बरसने के रूप में किया जाता है। यह मनुष्य प्रकृति और देवत्व के अद्भुत सांस्कृतिक एकात्म का प्रतीक है और संस्कृत की विशिष्ट मानसिकता का संकेत भी। उन्होंने बताया कि संस्कृत के लोकसाहित्य में बच्चों के खेल, ग्रामीण जीवन की समस्याएं, प्राकृतिक आपदाओं से जूझते परिवारों की पीड़ा, भूख और अभाव की स्थितियां तथा ग्रामीण समाज की संवेदनाएं अत्यंत सजीव रूप में उपस्थित हैं। अनेक ऐसे श्लोक हैं जिन्हें कवियों और संकलकों ने कठिन संघर्ष के बाद संरक्षित किया है और उन्हीं के प्रयासों से लोकजीवन से जुड़ी यह साहित्यिक विरासत आज तक सुरक्षित है। व्याख्यान के अंतिम हिस्से में उन्होंने कहा कि संस्कृत को केवल धर्म की भाषा मानकर हम उसके लोकचरित्र और मानवीय व्यापकता को सीमित कर देते हैं, जबकि संस्कृत सदियों से लोकजीवन की भाषा रही है और आज भी भारतीय सांस्कृतिक चेतना की धड़कन के रूप में जीवित है।
काव्य का उद्देश्य जनसामान्य को शिक्षित करना
कालिदास अकादमी उज्जैन के निदेशक डॉ. गोविंद गंधे ने कहा कि काव्य नि:संदेह लोक का प्रतिबिंब है और संस्कृत काव्य के आरंभ से ही उसका मूल स्वर लोकजीवन की अनुभूति से जुड़ा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आदि कवि वाल्मीकि के रामायण से ही यह परंपरा दिखाई देती है कि संस्कृत काव्य ने जनजीवन की कथा कहने का मार्ग चुना और उसी आधार पर आगे अनेक काव्यशास्त्र और नाट्यशास्त्र विकसित हुए। आचार्य वामन ने काव्य के प्रयोजन पर जो विचार दिए हैं, उनमें यश और अर्थ जैसे लक्ष्यों के साथ-साथ काव्य का एक बड़ा उद्देश्य जनसामान्य को शिक्षित करना, उनके व्यवहार को सुधारना, उन्हें अकल्याण से रक्षा करना और उन्हें आनंद की अनुभूति कराना भी है। जब काव्य का ध्येय लोकहित होता है तो स्वाभाविक रूप से काव्य में लोक की संवेदनाएं, लोक के अनुभव और जीवन की बहुरंगी छवियां स्पष्ट रूप से उभरती हैं।

कालिदास अकादमी उज्जैन के निदेशक डॉ गोविंद गंधे

संस्कृत विश्वविद्यालय नई दिल्ली के पूर्व कुलपति प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी, कालिदास अकादमी उज्जैन

संस्कृत विश्वविद्यालय नई दिल्ली के पूर्व कुलपति प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी, कालिदास अकादमी उज्जैन

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