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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
नई दिल्ली
Updated Tue, 20 May 2014 08:35 PM IST
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रतीय जनता पार्टी को आम चुनाव में ऐतिहासिक जीत मिलने बाद नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाना महज औपचारिकता थी, जो राष्ट्रपति का न्योता मिलने के साथ ही पूरी हो गई है। वाकई यह उनका अनथक प्रयास ही था, जिसके दम पर भाजपा ने वह मुकाम हासिल कर लिया, जिसके बारे में सालभर पहले तक कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।
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खुद मोदी भी नहीं चाहते होंगे कि उन्हें किसी कमजोर सरकार का मुखिया बनना पड़े। ऐसी कोई सरकार उनकी कार्यशैली और उनकी क्षमता के पूरे उपयोग के लिहाज से माकूल नहीं होती। पिछले वर्ष 13 सितंबर को भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद वह मुख्यमंत्री के रूप में अपने डेढ़ दशक के अनुभव, विकास के गुजरात मॉडल और देश सेवा के वायदे के साथ गुजरात से बाहर निकले थे। 2002 के दंगों को लेकर उन्हें बार बार विपक्ष और उनके आलोचकों ने घेरने की कोशिश भी की, मगर देश की जनता ने दमदारी से उन पर भरोसा जताया।
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संसद के केंद्रीय कक्ष में संसदीय दल का नेता चुने जाने के बाद मोदी ने जो कुछ कहा, उससे समझा जा सकता है कि उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में अपनी जिम्मेदारियों और उनसे की जा रही अपेक्षाओं का एहसास है। गरीबों, युवाओं और महिलाओं के प्रति अपनी सरकार की प्रतिबद्धता जताने के साथ ही मोदी ने सबको साथ लेकर सबका विकास करने की बात की है।
सख्त प्रशासक की छवि बना चुके मोदी का एक और रूप भी देश के सामने आया, जब वह अपने भाषण के दौरान भाजपा और देश के प्रति कृतज्ञता जताते हुए भावुक हो गए। बेशक, अगले कुछ दिनों में उन्हें अपने मंत्रिमंडल को लेकर माथापच्ची करनी होगी, लेकिन उनकी बातों से लगता है कि आगे का खाका उनके दिमाग में है।
चुनाव अभियान के दौरान भले ही उन्होंने सोनिया और राहुल गांधी के साथ ही कांग्रेस पर तीखे हमले किए थे, मगर उन्होंने साफ कर दिया है कि वह अब आगे की ओर देख रहे हैं। वह उस गिलास को देख रहे हैं, जो आधा पानी और आधा हवा से भरा हुआ है। दरअसल उनका यह आशावाद ही है, जो समकालीन नेताओं से उन्हें अलग कर देता है। बेहद मामूली पृष्ठभूमि से निकलकर वह आज उस मुकाम तक पहुंचे हैं, जहां से देश को नई दिशा दे सकते हैं।