Predictions: वर्ष 2026 में शनि देव 27 जुलाई से मीन राशि में वक्री (उल्टी चाल) होकर 11 दिसंबर 2026 तक लगभग 138 दिनों तक इसी स्थिति में रहेंगे, जिसका भारत पर प्रभाव राजनीतिक उथल-पुथल, आर्थिक क्षेत्रों में सुस्ती और कूटनीतिक चुनौतियों के रूप में सामने आता है।
बड़ी भविष्यवाणी: वक्री शनि और अतिचारी गुरु लाएंगे राजनीति में भूचाल, देश और सरकार में होगी उथल-पुथल
Predictions: ज्योतिष के ग्रंथों के अनुसार, जब देवगुरु बृहस्पति अतिचारी हों और उसी कालखंड में शनि वक्री हो जाए, तो असामान्य वर्षा, अकाल, महंगाई का प्रकोप, राजाओं का विनाश और प्रजा को बहुत कष्ट पहुंचने की स्थिति बन जाती हैं।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गुरु बृहस्पति की अतिचारी गति का प्रभाव
देवगुरु बृहस्पति की इस असामान्य और तीव्र (अतिचारी) गति के कालखंड में ही देश के सबसे बड़े धार्मिक केंद्र श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र में इस तरह की वित्तीय विसंगतियों का उजागर होना इस बात का संकेत है कि, बृहस्पति की अतिचारी गति धर्म के विरुद्ध किसी कार्य को स्वीकार नहीं करेगी और अब शनि देव 27 जुलाई से मीन राशि में वक्री (उल्टी चाल) होकर 11 दिसंबर 2026 तक लगभग 138 दिनों तक इसी स्थिति में रहेंगे। शनि देव को हिंदू धर्म और ज्योतिष में कर्मफल दाता और न्याय का देवता माना जाता है, जो हर व्यक्ति को उसके अच्छे या बुरे कर्मों का निष्पक्ष फल देते हैं।
ज्योतिष के ग्रंथों के अनुसार, जब देवगुरु बृहस्पति अतिचारी हों और उसी कालखंड में शनि वक्री हो जाये तो असामान्य वर्षा, दुर्भिक्ष, महंगाई का प्रकोप, राजाओं का विनाश और प्रजा को बहुत कष्ट पहुंचने की स्थिति बन जाती हैं। आम जनमानस और शासन सत्ता में संघर्ष की स्थिति बनती है।
वर्तमान में कर्क राशि में चल रहे गुरु अतिचारी हैं और 27 जुलाई को शनि वक्री (उलटी) गति में आ जाएंगे जहां वह मीन राशि में इसी उलटी चाल में चलते हुए 11 दिसंबर तक बेहद अचंभित कर देने वाली राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल पैदा करेंगे। अगले 138 दिनों में शनि की वक्री और गुरु की अतिचारी गति भारत, अमेरिका और इजराइल में बड़े राजनेताओं और सामाजिक हस्तियों की स्थिति डावाँडोल कर सकती है।
अब आजाद भारत की कुंडली (15 अगस्त 1947, मध्य रात्रि, दिल्ली) में फरवरी 2027 तक चल रही मंगल में राहु की कठिन विंशोत्तरी दशा और वर्तमान में शनि की वक्री चाल केंद्र सरकार में उच्च पदों पर बड़े आकस्मिक और विस्मयकारी बदलावों का ज्योतिषीय संकेत दे रही है। इसके अलावा कई अन्य राजनीतिक बदलाव भी देखने को मिल सकते हैं। ज्योतिष में मंगल-राहु का संबंध अचानक घटनाओं, जनाक्रोश, राजनीतिक टकराव, सुरक्षा संबंधी चुनौतियों और आक्रामक बयानबाजी से जोड़ा जाता है। इन ग्रहों का प्रभाव सरकार और जनता के बीच बढ़ते अविश्वास, विपक्ष के आक्रामक तेवर और सोशल मीडिया से उठने वाले विवादों के रूप में सामने आ सकता है।
शनि के वक्री होते ही मिलेंगे कई बड़े संकेत
ज्योतिष गणना की बात करें, तो अब जब शनि वक्री होने जा रहे हैं, तो उसी समय देश में एक नए तरह का आंदोलन देखा जा रहा है। शनि लोकतंत्र के कारक ग्रह हैं इसलिए देवगुरु बृहस्पति की अतिचारी गति और शनि के वक्रत्व के समय लोकतंत्र के विपरित जो भी स्थितियां बनेंगी उनको अंततः परास्त होना ही पड़ेगा।
वर्तमान में चल रहे छात्र आंदोलन की पृष्ठभूमि में शनि की अहम भूमिका है, जिसमें खास बात यह भी है कि वर्तमान समय में न्याय के कारक शनि धर्म के कारक बृहस्पति की राशि में गोचर कर रहे हैं और अब उनका वक्री होना उनको और भी बलशाली बना रहा है। शनि सिर्फ लोकतंत्र के कारक ही नहीं है, वह इस लोकतंत्र के अन्तर्गत आने वाले हर उस व्यक्ति के कारक हैं, जिन्होंने इसको बनाने में अपने महत्वपूर्ण मत की हिस्सेदारी दी है।
वर्तमान में बन रही ग्रहों की यह स्थिति इस बात का संकेत देती है कि, यदि कोई भी आंदोलन संविधानसम्मत, शांतिपूर्ण और जनहितकारी मूल्यों पर आधारित है, तो यह किसी व्यक्ति या दल की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना, संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रवाद की विजय का प्रतीक है, क्योंकि इतिहास बार-बार यही संदेश देता है कि तख़्त और ताज स्थायी नहीं होते, परंतु जागृत जनचेतना और संविधान के आदर्श अमर रहते हैं और आने वाले समय में बृहस्पति और शनि की गोचर की स्थिति यह प्रमाणित करेगी।