दुनिया भर में इलेक्ट्रिक वाहनों का क्रेज बढ़ता जा रहा है। जानकारों का कहना है कि 2050 तक सड़कों पर इलेक्ट्रिक वाहनों का बोलबाला होगा। भारत में भी कई कार निर्माता कंपनियां इलेक्ट्रिक कारें लॉन्च कर रही हैं। वहीं इलेक्ट्रिक वाहनों की दुनिया पूरी तरह बदलने जा रही है। इलेक्ट्रिक कार निर्माता कंपनी टेस्ला ऐसी बैटरी पेश करने जा रही है। जिसकी क्षमता करीब 17 लाख किलोमीटर तक होगी। यानी इसे कई बार रिचार्ज कर इतनी दूरी तक इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। इसे मिलियन माइल बैटरी कहा जा रहा है। इसकी कीमत भी काफी कम होगी।
आने वाली हैं मिलियन माइल बैटरियां, 17 लाख किलोमीटर तक दौड़ेंगी इलेक्ट्रिक कारें!
बैटरी डे सम्मेलन सम्मेलन में होगी घोषणा
वहीं टेस्ला इस बैटरी का निर्माण चीन की दिग्गज कंपनी कैटल्स के साथ मिलकर कर रही है। उम्मीद की जा रही है कि कंपनी के मालिक एलन मस्क इसकी घोषणा इस महीने के अंत में होने वाले बैटरी डे सम्मेलन में कर सकते हैं। वहीं कई इलेक्ट्रिक वाहनों के सफलतापूर्वक लॉन्च होने के बाद अब कई और इलेक्ट्रिक व्हीकल लॉन्च होने जा रहे हैं। इनमें से कुछ ऐसे वाहन हैं जो इसी साल यानी 2020 में ही लॉन्च होने वाले हैं। इस बैटरी को मिलियन माइल बैटरी कहा जा रहा है।
भविष्य में इलेक्ट्रिक कार चलाना बेहतर
दुनियाभर में पेट्रोल कारों के मुकाबले इलेक्ट्रिक वाहन कम कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन करते हैं। एक शोध के मुताबिक भले ही इलेक्ट्रिक वाहनों में जीवाश्म ईंधन की पर्याप्त मात्रा शामिल हो।
नीदरलैंड की रेडबाउड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पाया कि मौजूदा परिस्थिति में दुनिया में 95 फीसदी पेट्रोल कारों की तुलना में जलवायु के लिए इलेक्ट्रिक कार चलाना बेहतर है। शोधकर्ताओं ने कहा कि दुनियाभर में एक मात्र अपवाद पोलैंड जैसी जगहें हैं, जहां बिजली उत्पादन अभी भी ज्यादातर कोयले पर आधारित है।
पेट्रोल की तुलना में इलेक्ट्रिक वाहन ज्यादा किफायती
वहीं स्वीडन और फ्रांस में इलेक्ट्रिक कारों का उत्सर्जन औसतन पेट्रोल कारों की तुलना में 70 फीसदी कम है। ब्रिटेन में लगभग यह आकड़ा 30 फीसदी कम है। कुछ वर्षों में इलेक्ट्रॉनिक कारें अधिकांश देशों में पेट्रोल कारों की तुलना में कम उत्सर्जन करेंगी।
2050 तक हर दूसरी कार होगी इलेक्ट्रिक
शोधकर्ताओं के मुताबिक 2050 में सड़कों पर हर दूसरी कार इलेक्ट्रिक हो सकती है। क्योंकि वैश्विक CO2 उत्सर्जन में प्रतिवर्ष 1.5 गीगाबाइट की दर से कमी आएगी जो वर्तमान में रूस से उत्सर्जित CO2 के बराबर है।